देश की कृषि व्यवस्था इस समय एक गंभीर संकट से गुजर रही है। एक तरफ लोगों की सेहत खतरे में है, दूसरी तरफ विदेशी बाजारों में भारत की साख गिर रही है। साल 2026 में जापान ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी। चीन ने चावल और मिर्च के कई कंसाइनमेंट भी रिजेक्ट कर दिए हैं। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, फल-सब्जियों के हजारों सैंपल में तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक मिले हैं।
क्या कभी आपने सोचा है कि जिस थाली में आप रोज अपने परिवार को खाना परोसते हैं, उसमें अनजाने में जहर भी परोसा जा रहा हो सकता है। आज देश की कृषि व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां लोगों की सेहत पर संकट मंडरा रहा है। साथ ही विदेशी बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की साख भी लगातार कम हो रही है।
साल 2026 में जापान ने भारत के प्रसंस्करण संयंत्रों में खामियां पाते हुए भारतीय आमों के आयात पर पूरी तरह रोक लगा दी। इससे अल्फांसो, केसर और चौसा जैसी किस्में जापानी बाजार से बाहर हो गई हैं। वहीं चीन ने गैर-बासमती चावल के कई कंसाइनमेंट यह कहकर खारिज कर दिए कि उनमें जेनेटिकली मॉडिफाइड यानी GMO अंश मौजूद हैं।
मिर्च में मिला खतरनाक कीटनाशक
मसालों के मामले में भी चीन ने सख्ती दिखाई है। चीन ने भारतीय मिर्च के कंसाइनमेंट में तय मानकों से ज्यादा कीटनाशक मेथामिडोफॉस मिलने का हवाला देकर उन्हें वापस भेजना शुरू कर दिया है। यह सिर्फ व्यापारिक झटका नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि खेत से लेकर बाजार तक पूरी सप्लाई चेन में गड़बड़ी है।
संसद में पेश हुए चौंकाने वाले आंकड़े
केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने हाल ही में संसद में आंकड़े साझा किए। पिछले तीन सालों में देश के 23 राज्यों से लिए गए फल और सब्जियों के 70,652 नमूनों में से 3.1 प्रतिशत सैंपल FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India – भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) द्वारा तय सुरक्षित सीमा से कहीं ज्यादा जहरीले पाए गए। पंजाब जैसे राज्यों में अंधाधुंध केमिकल के इस्तेमाल से कैंसर जैसी बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
मूंग की फसल में भी बड़ी लापरवाही
सेहतमंद समझी जाने वाली अंकुरित मूंग में भी गंभीर लापरवाही सामने आई है। किसान फसल जल्दी सुखाने और कटाई की मुश्किलों से बचने के लिए खड़ी मूंग की फसल पर पैराक्वाट जैसे जानलेवा और प्रतिबंधित रसायन का छिड़काव कर रहे हैं। जब लोग सेहत के लिए मूंग को अंकुरित करके या दाल के रूप में खाते हैं, तो यही जहरीले अवशेष उनके शरीर में पहुंच जाते हैं। इससे फेफड़े, किडनी और लीवर को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है।
आलू और अदरक को आकर्षक दिखाने के लिए भी खतरनाक रंगों का इस्तेमाल हो रहा है। मुनाफे की दौड़ में फलों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड जैसे प्रतिबंधित रसायन का इस्तेमाल भी हो रहा है, जो लोगों में गंभीर बीमारियां पैदा कर सकता है।
विदेशी बाजार में गिर रही साख
इस लापरवाही का असर सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण यानी EFSA (European Food Safety Authority) के आंकड़ों के मुताबिक, दो सालों में भारत के 365 से ज्यादा उत्पाद कीटनाशकों और भारी धातुओं की मात्रा तय सीमा से ज्यादा होने के कारण रिजेक्ट किए गए। इनमें कैंसर पैदा करने वाला तत्व एथिलीन ऑक्साइड भी मिला, जिस पर दुनिया के कई देशों में पहले से प्रतिबंध है।
हैरानी की बात यह है कि इन रसायनों का इस्तेमाल फसल उगाने के लिए नहीं, बल्कि कटाई के बाद उन्हें जल्दी पकाने या सड़ने से बचाने के लिए किया जाता है। जब यही जहरीले अंश विदेशों की जांच में पकड़े जाते हैं, तो भारत के निर्यात पर बड़ा असर पड़ता है।
आखिर जिम्मेदार कौन है
इस स्थिति के लिए सिर्फ किसानों को दोष नहीं दिया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि असली गड़बड़ी पूरे सिस्टम में है। एक तरफ पेस्टिसाइड कंपनियां और डीलर मुनाफे के लिए किसानों को अंधाधुंध केमिकल बेच रहे हैं। दूसरी तरफ व्यापारी उपज को चमकदार दिखाने और लंबे समय तक ताजा रखने के लिए घातक केमिकल मिला रहे हैं।
किसानों को यह सही जानकारी देने वाला कोई नहीं है कि कौन सा केमिकल कब और कितनी मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए। जब बाजार में जहरीले रसायन खुलेआम बिकते हैं और सही सलाह देने वाला कोई नहीं होता, तो किसान इनका इस्तेमाल करते ही हैं।
सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी पर सवाल
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी एजेंसियों और कृषि विभागों की जिम्मेदारी क्या है। जब भी कोई कंसाइनमेंट विदेश से रिजेक्ट होकर वापस आता है, तो विभागों के बीच एक-दूसरे पर आरोप लगाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कोई भी विभाग जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता। न स्टोरेज हाउस की सही निगरानी होती है, न सप्लाई चेन में पारदर्शिता बरती जाती है।
अब सख्त कदम उठाने की जरूरत
अगर इस संकट से बाहर निकलना है, तो अब कड़े कदम उठाने का समय आ गया है। सरकार को सिर्फ कागजों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय जमीन पर उतरकर पेस्टिसाइड कंपनियों और डीलरों पर नकेल कसनी होगी। हाल ही में सरकार ने पैराक्वाट जैसे जानलेवा खरपतवारनाशी पर प्रतिबंध लगाने का कदम उठाया है, जिससे देशभर में लगातार मौतें हो रही थीं।
खेती से लेकर कोल्ड स्टोरेज और पैकेजिंग तक हर स्तर पर आधुनिक टेस्टिंग लैब्स और पारदर्शी सिस्टम बनाना जरूरी है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और किसानों को सही वैज्ञानिक तरीके नहीं सिखाए जाएंगे, तब तक न लोगों की सेहत सुरक्षित रहेगी, न ही देश का कृषि निर्यात।
