सूखे इलाकों की खेती का भविष्य क्या होगा, इस पर मंथन हुआ। मौका था नई दिल्ली में में आयोजित ड्राईलैंड कांग्रेस 2026 का। इस दौरान ICAR और ICRISAT की 50 साल की साझेदारी का जश्न मना।
दोनों संस्थानों के पूर्व और मौजूदा प्रमुख एक मंच पर आए। उन्होंने पांच दशक की उपलब्धियों पर बात की। साथ ही विकसित भारत 2047 के लिए खेती में बदलाव का रोडमैप रखा गया। ड्राईलैंड यानी कम बारिश वाली सूखी जमीन।
50 साल की साझेदारी
विशेष सत्र की सह-अध्यक्षता दो पूर्व महानिदेशकों ने की। एक थे ICAR के पूर्व महानिदेशक डॉ. आर. एस. पारोदा। दूसरे थे ICRISAT के पूर्व महानिदेशक डॉ. विलियम डी. डार। सत्र में और भी कई पूर्व शीर्ष अधिकारी शामिल हुए। इनमें डॉ. पंजाब सिंह, डॉ. सी. एल. एल. गौड़ा और डॉ. टी. आर. शर्मा रहे। डॉ. स्वप्न दत्ता ने भी साझेदारी के विकास पर विचार रखे।
कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. एम. एल. जाट ने रणनीति बताई। इस विभाग को DARE (Department of Agricultural Research and Education) कहते हैं। वे ICAR के महानिदेशक भी हैं। उन्होंने नई चुनौतियों के लिए दोनों संस्थानों की पूरक क्षमताएं इस्तेमाल करने को कहा।
विकसित भारत 2047 का रोडमैप
फसल विज्ञान के उप महानिदेशक डॉ. डी. के. यादव ने रोडमैप पेश किया। उनके साथ ICRISAT के डॉ. रमन बाबू भी थे। डॉ. रमन बाबू ICRISAT के ग्लोबल रिसर्च प्रोग्राम डायरेक्टर (एक्सेलेरेटेड क्रॉप इम्प्रूवमेंट) हैं। रोडमैप में वैज्ञानिक क्षमताओं के बेहतर इस्तेमाल पर जोर रहा। शोध का असर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की बात भी हुई।
ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने भी अपनी बात रखी। उनके मुताबिक ICAR और ICRISAT के सहयोग से शोध का ठोस असर दिखा है। उन्होंने भारत और दूसरे देशों के सूखे इलाकों में बदलाव तेज करने को कहा। इसके लिए नवाचार, साउथ-साउथ सहयोग और सामूहिक कार्रवाई मजबूत करने पर जोर दिया। साउथ-साउथ सहयोग का मतलब विकासशील देशों का आपसी सहयोग है।
सूखे इलाकों में मजबूत खेती
दूसरे दिन तीन बड़े विषयों पर पैनल चर्चाएं हुईं। पहला विषय था सूखे इलाकों में मजबूत खेती के तरीके नए सिरे से बनाना। दूसरा विषय था ग्लोबल साउथ में बीज प्रणालियों में बदलाव। ग्लोबल साउथ का मतलब आम तौर पर विकासशील देशों का समूह है। तीसरा विषय था महिलाओं और युवाओं पर केंद्रित बदलाव।
इन चर्चाओं में छोटे किसानों के लिए जलवायु-अनुकूल तरीकों पर बात हुई। एशिया और अफ्रीका में बीज बांटने की प्रणालियों पर भी विचार हुआ। सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मजबूत करने की जरूरत भी बताई गई। सूखी जमीन की खेती में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी पर भी चर्चा रही। इसके लिए समावेशी नीतियों और नेतृत्व की बात कही गई। तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने मुश्किल हालात में भी सफल तकनीकों पर विचार रखे।
145 से ज्यादा पोस्टर
कांग्रेस में पोस्टर प्रेजेंटेशन भी शुरू हुए। इसमें छात्रों और शोधार्थियों ने अपना वैज्ञानिक शोध रखा। सर्वश्रेष्ठ पोस्टर पुरस्कार के लिए 145 से ज्यादा पोस्टर्स का मूल्यांकन हो रहा है। इससे युवा शोधार्थियों को देश-विदेश के विशेषज्ञों से मिलने का मौका मिल रहा है।
कृषि जैव विविधता पर जोर
दिन की बड़ी चर्चा डॉ. आरएस पारोदा की रही। उनका विषय था सूखे इलाकों में लचीलापन बढ़ाने के लिए कृषि जैवविविधता। जैवविविधता यानी खेती में अलग-अलग फसलों और किस्मों की मौजूदगी। डॉ. पारोदा ने इसके संरक्षण और सही इस्तेमाल पर जोर दिया। उनके मुताबिक इससे सूखे इलाकों की खेती मजबूत और टिकाऊ बन सकती है।
पारोदा ने कहा कि 50 साल पूरे होना केवल उपलब्धियां गिनने का मौका नहीं। यह भविष्य की दिशा तय करने का भी अवसर है। उनके अनुसार संसाधन, विशेषज्ञता और विजन साथ आएं तो बदलाव तेज होगा।
खोजें किसानों तक पहुंचें
डॉ. पंजाब सिंह ने पांच दशक की साझेदारी के अहम नतीजों पर जोर दिया। उनका कहना है कि सफल मॉडल बड़े स्तर पर लागू होने चाहिए। साथ ही नई खोजें ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचनी चाहिए।
डॉ. विलियम डी. डार ने भी अपनी बात रखी। उनके मुताबिक सूखी जमीन की खेती का भविष्य मजबूत साझेदारी पर टिका है। इसमें नवाचार और वैज्ञानिक क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल भी शामिल है। डार ने किसानों की आय और पोषण सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने को कहा। उन्होंने कृषक समुदायों की मुश्किलों से निपटने की क्षमता भी अहम बताई।
महिलाओं और युवाओं की भूमिका
ICRISAT बोर्ड के सदस्य प्रोफेसर याये गसामा ने महिलाओं और युवाओं को जरूरी बताया। उनके मुताबिक सूखे क्षेत्रों के समाधान बनाने में इनकी ज्यादा भागीदारी चाहिए। नेतृत्व, नवाचार और उद्यम से इनकी भूमिका बढ़ाई जा सकती है।
नाबार्ड यानी National Bank for Agriculture and Rural Development। इसके मुख्य महाप्रबंधक डॉ. ए. वी. भवानी शंकर ने अपनी बात रखी। उन्होंने ऐसे नवाचारों की जरूरत बताई जो बड़े स्तर पर लागू हो सकें। उनका कहना है कि सिर्फ व्यक्तिगत स्तर के कदम काफी नहीं हैं। नवाचारों को सिस्टम और बड़े स्तर तक ले जाना होगा।
आगे क्या होगा
ड्राईलैंड कांग्रेस का दूसरा दिन कई बातों पर केंद्रित रहा। इनमें संस्थागत साझेदारी और वैज्ञानिक नवाचार को गति देना शामिल है। मजबूत खेती और बीज प्रणालियां विकसित करना भी एजेंडे में रहा। सूखी जमीन की कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी पर भी जोर रहा। कांग्रेस में आगे वैज्ञानिक ज्ञान को बड़े समाधानों में बदलने पर चर्चा होगी।
किसानों के लिए क्या मायने
सूखे इलाकों के किसान मौसम और कम बारिश की मार सबसे पहले झेलते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों के बड़े हिस्से में खेती बारिश पर निर्भर है। इसलिए सूखी जमीन की खेती पर होने वाली रिसर्च सीधे किसानों से जुड़ती है। पर रिसर्च तभी काम आती है जब वह खेत तक पहुंचे। इसी वजह से वक्ताओं का जोर नई खोजों को किसानों तक पहुंचाने पर रहा।
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