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राजस्थान में खाद संकट: स्टॉक के बाद भी डीएपी को तरसे किसान, अब 744 निरीक्षक रोकेंगे कालाबाजारी

newz@gmail.com | Oct 7, 2026, 15:24 IST

राजस्थान में रबी बुआई से पहले डीएपी की मांग बढ़ गई है। किसानों को कई जिलों में खाद नहीं मिल रही। सरकार के पास यूरिया और डीएपी का 4.77 लाख टन स्टॉक है। वितरण सुधारने और कालाबाजारी रोकने के लिए 744 निरीक्षक लगाए गए हैं।

खाद संकट

राजस्थान में रबी बुआई से पहले खाद वितरण पर दबाव बढ़ गया है। कई जिलों से डीएपी की किल्लत की शिकायतें सामने आई हैं। जयपुर, कोटपूतली, बारां और धौलपुर में किसानों की परेशानी बढ़ी है। बूंदी, झालावाड़ और टोंक में भी ऐसी शिकायतें मिल रही हैं। किसान सुबह से वितरण केंद्रों पर कतारों में पहुंच रहे हैं। कई किसानों को खाली हाथ घर लौटना पड़ रहा है।

खेतों में अभी पर्याप्त नमी बनी हुई है। किसान इसी नमी में रबी फसलों की बुआई करना चाहते हैं। डीएपी नहीं मिलने से उनकी तैयारी रुक गई है। किसानों के सामने समय की सबसे बड़ी चुनौती है। खेत की नमी लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रहती। देरी होने पर दोबारा सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है। इससे खेती की लागत बढ़ने का खतरा रहेगा।

स्टॉक का असली हिसाब

राज्य सरकार ने खाद के उपलब्ध स्टॉक की जानकारी दी है। सरकारी आंकड़ों में फिलहाल 3.73 लाख टन यूरिया उपलब्ध है। डीएपी (Diammonium Phosphate) का स्टॉक 1.04 लाख टन बताया गया है। दोनों खाद का संयुक्त स्टॉक 4.77 लाख टन है, इसलिए 4.77 लाख टन केवल यूरिया नहीं है।

सभी प्रमुख खादों का कुल स्टॉक 7.81 लाख टन है। इसमें यूरिया, डीएपी, एनपीके और एसएसपी शामिल हैं। एनपीके (Nitrogen, Phosphorus and Potassium) का भंडार 95 हजार टन है। एसएसपी (Single Super Phosphate) का स्टॉक 2.09 लाख टन है।

सरकारी आंकड़े प्रदेश स्तर का कुल भंडार बताते हैं। हर जिले में इसकी उपलब्धता समान होना जरूरी नहीं है। किसी जिले में मांग उपलब्ध स्टॉक से ज्यादा हो सकती है। परिवहन और वितरण में देरी भी संकट बढ़ा सकती है।

डीएपी की मांग क्यों

रबी फसलों की शुरुआती बुआई में डीएपी की ज्यादा मांग रहती है। किसान इसे फास्फोरस की जरूरत पूरी करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। सरसों, चना और दलहन की बुआई का समय नजदीक है। इसलिए किसान अभी डीएपी खरीदने के लिए केंद्रों पर पहुंच रहे हैं। यूरिया की जरूरत फसल बढ़ने के बाद ज्यादा पड़ती है।

यही कारण है कि यूरिया का बड़ा स्टॉक राहत नहीं दे रहा। किसानों की मौजूदा जरूरत डीएपी से जुड़ी हुई है। प्रदेश में डीएपी का स्टॉक केवल 1.04 लाख टन है।

कृषि विभाग ने दूसरे खाद विकल्पों की उपलब्धता भी बताई है। किसी विकल्प का उपयोग मिट्टी जांच और सलाह से होना चाहिए। बिना सलाह खाद बदलने से फसल और मिट्टी प्रभावित हो सकती है।

रबी बुआई पर खतरा

दिए गए आंकड़ों के अनुसार पिछले सीजन में बड़ा रबी रकबा रहा। करीब 114 लाख हेक्टेयर में विभिन्न रबी फसलें बोई गईं। सरसों का रकबा लगभग 34 लाख हेक्टेयर बताया गया है। चने की खेती भी बड़े क्षेत्र में हुई थी। अंतिम सरकारी अनुमान में चने का रकबा करीब 16.55 लाख हेक्टेयर रहा।

राजस्थान देश के प्रमुख सरसों उत्पादक राज्यों में शामिल है। चना उत्पादन में भी प्रदेश की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रहती है। इसलिए बुआई की देरी का असर व्यापक हो सकता है।

खाद समय पर नहीं मिली तो बुआई का समय निकल सकता है। देर से बोई फसल की उत्पादकता प्रभावित होने की आशंका रहती है। इससे किसान की लागत और जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं। उत्पादन घटने पर बाजार की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। इसका असर खाद्य तेल और दालों की कीमतों तक पहुंचेगा।

राज्य सरकार ने क्या कहा

राज्य स्तरीय टास्क फोर्स की बैठक मंगलवार को जयपुर में हुई। बैठक की अध्यक्षता मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने की। मुख्य सचिव ने पारदर्शी और सुचारू वितरण के निर्देश दिए। उन्होंने रबी बुआई के दौरान कमी नहीं होने देने को कहा। जिलों में मांग और उपलब्धता की लगातार निगरानी भी होगी।

प्रमुख कृषि सचिव मंजू राजपाल ने बैठक में स्टॉक की जानकारी दी। उनके अनुसार प्रदेश में उर्वरकों की आपूर्ति लगातार जारी है। केंद्र सरकार राज्यों को माहवार और कंपनीवार खाद आवंटित करती है। राज्य सरकार इसके बाद जिलेवार आपूर्ति योजना बनाती है। यह योजना स्थानीय मांग और उपलब्ध आवंटन पर आधारित रहती है।

वितरण केंद्रों पर कृषि कर्मचारियों की मौजूदगी भी सुनिश्चित की जाएगी। इसका उद्देश्य वास्तविक किसानों तक खाद पहुंचाना है।

744 निरीक्षकों की जिम्मेदारी

सरकार ने प्रदेशभर में 744 उर्वरक निरीक्षक तैनात किए हैं। ये निरीक्षक जमाखोरी और कालाबाजारी की जांच करेंगे। टैगिंग की शिकायतों पर भी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। टैगिंग में खाद के साथ दूसरा उत्पाद जबरन बेचा जाता है। अवैध भंडारण की जांच भी निरीक्षकों की जिम्मेदारी होगी।

निरीक्षकों को दुकानों और गोदामों का स्टॉक जांचना होगा। उन्हें बिक्री रिकॉर्ड और उपलब्ध मात्रा का मिलान भी करना होगा। गड़बड़ी मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। ‘धरती माता बचाओ अभियान’ की समितियां भी निगरानी कर रही हैं। ये समितियां खाद की उपलब्धता और वितरण की समीक्षा करेंगी।

जिलों तक वितरण चुनौती

सरकार के आंकड़ों में प्रदेश स्तर पर पर्याप्त भंडार दिखाई देता है। किसानों की शिकायतें स्थानीय वितरण में समस्या का संकेत देती हैं। अब सरकार की असली परीक्षा जिलेवार आपूर्ति में होगी। खाद गोदाम में रहना किसानों के लिए उपयोगी नहीं है। उसे सही समय पर वितरण केंद्र तक पहुंचना जरूरी है।

किसानों को उपलब्धता की स्पष्ट जानकारी भी मिलनी चाहिए। इससे अनावश्यक कतारें और बार-बार यात्रा कम होगी। वितरण में किसान की पहचान और वास्तविक जरूरत देखी जा सकती है।

छोटे किसानों को प्राथमिकता और समान अवसर मिलना जरूरी है। प्रशासन को शिकायतों का समयबद्ध समाधान भी सुनिश्चित करना होगा। रबी बुआई के लिए आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। डीएपी वितरण तेज होने पर बुआई समय से पूरी हो सकेगी। देरी जारी रही तो खेती की लागत बढ़ सकती है।

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