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सोयाबीन की नई किस्में NRC 268 और NRC 270 से बढ़ेगी उपज, खराब मौसम में भी 20 क्विंटल उत्पादन की संभावना

newz@gmail.com | Oct 13, 2026, 21:40 IST

सोयाबीन की नई किस्में NRC 268 और NRC 270 से शुरुआती आंकड़ों में 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज के संकेत मिले हैं। राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान इंदौर में हुए कटाई आकलन के नतीजों का वैज्ञानिक विश्लेषण अभी बाकी है।

सोयाबीन

सोयाबीन की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर सामने आई है। नई किस्में NRC 268 और NRC 270 ने बेहतर उपज के शुरुआती संकेत दिए हैं। ये किस्में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थान में विकसित की गई हैं।

इंदौर स्थित राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान में इनका उपज आकलन किया गया। यह आयोजन सोयाबीन कटाई दिवस के दौरान हुआ। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, दोनों किस्मों से अच्छी पैदावार मिलने की संभावना है। इन किस्मों से करीब 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलने के संकेत मिले हैं। यह आंकड़ा शुरुआती आकलन पर आधारित है। इसलिए इसे अंतिम उपज या हर किसान के लिए पक्की गारंटी नहीं मानना चाहिए।

खास बात यह है कि इस साल मौसम की परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं। इसके बावजूद इन किस्मों का शुरुआती प्रदर्शन उत्साह बढ़ाने वाला बताया गया है। अब वैज्ञानिक आंकड़ों की जांच करके इन नतीजों को बेहतर ढंग से समझेंगे।

कटाई दिवस पर क्या पता चला?

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने नई किस्मों की उपज जानने के लिए विशेष आयोजन किया। इस दौरान NRC 268 और NRC 270 की फसल का आकलन किया गया। दोनों किस्मों के एक-एक एकड़ खेत में कटाई की गई। कटाई के बाद मिले शुरुआती आंकड़ों से उत्पादन का अनुमान लगाया गया। इनके आधार पर करीब 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज की संभावना सामने आई। इससे वैज्ञानिकों को खेतों में इन किस्मों के प्रदर्शन की जानकारी मिलेगी।

इस आकलन का मकसद केवल ज्यादा उत्पादन का आंकड़ा जुटाना नहीं है। वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि मौसम का असर कितना पड़ा। इससे आगे किस्मों के परीक्षण और खेती की तकनीक बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, केवल एक साल के नतीजों से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। अलग-अलग इलाकों में मिट्टी, बारिश और तापमान की स्थिति बदलती रहती है। इसलिए इन किस्मों की असली क्षमता जानने के लिए आगे परीक्षण जरूरी होंगे।

भारत में सोयाबीन की औसत उपज

भारत में सोयाबीन की औसत पैदावार करीब 10 से 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। ऐसे में 20 क्विंटल उपज का शुरुआती संकेत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बेहतर किस्मों और खेती के सही तरीकों से उत्पादन बढ़ाने की संभावना रहती है। संस्थान और अखिल भारतीय समन्वित सोयाबीन अनुसंधान परियोजना के परीक्षण भी अहम हैं। इनके तहत देश के अलग-अलग क्षेत्रों में सोयाबीन पर काम किया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अच्छी किस्मों और सही तकनीकों से 15 से 20 क्विंटल उपज संभव है।

अनुकूल मौसम और बेहतर खेती प्रबंधन में उत्पादन 22 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकता है। लेकिन यह हर खेत में मिलने वाला तय उत्पादन नहीं है। असली उपज कई बातों पर निर्भर करती है।

मिट्टी की स्थिति, बारिश और तापमान का फसल पर सीधा असर पड़ता है। बीज की गुणवत्ता और खाद-पानी का प्रबंधन भी अहम है। समय पर खरपतवार नियंत्रण और फसल की देखभाल से भी नतीजे बदल सकते हैं। इसलिए किसान केवल किसी किस्म के संभावित उत्पादन को देखकर फैसला न लें। अपने क्षेत्र की परिस्थितियों और कृषि विशेषज्ञों की सलाह को भी ध्यान में रखें।

खराब मौसम में भी क्यों अहम हैं नतीजे?

सोयाबीन की फसल बारिश और तापमान में बदलाव से प्रभावित होती है। ज्यादा बारिश होने पर खेतों में पानी भर सकता है। वहीं कम बारिश से पौधों की बढ़त और दाने बनने पर असर पड़ सकता है। मौसम में अचानक बदलाव भी फसल के विकास को प्रभावित कर सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में नई किस्मों का प्रदर्शन समझना जरूरी है। अगर आगे के परीक्षणों में भी अच्छे नतीजे मिलते हैं, तो इनकी उपयोगिता मजबूत हो सकती है। इससे वैज्ञानिक ऐसी किस्मों की पहचान कर सकेंगे, जो अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन करें।

फिर भी शुरुआती आंकड़ों को अंतिम नतीजा मानना सही नहीं होगा। एक खेत में मिला उत्पादन पूरे क्षेत्र की पैदावार नहीं बताता। इसके लिए कई जगहों और कई वर्षों के आंकड़ों की जरूरत होती है।

ICAR के महानिदेशक ने क्या कहा?

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने शुरुआती नतीजों को सकारात्मक बताया। उनके मुताबिक, देश में सोयाबीन की पैदावार बढ़ाने के लिए उन्नत किस्में और वैज्ञानिक खेती जरूरी हैं। उन्होंने प्रतिकूल मौसम में भी दोनों किस्मों से करीब 20 क्विंटल उपज के संकेतों को उत्साहजनक बताया। उन्होंने यह भी कहा कि आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण आगे की शोध योजनाओं में मदद करेगा।

इसका मतलब है कि अभी इन किस्मों पर अध्ययन का काम आगे बढ़ेगा। वैज्ञानिक नतीजों की जांच करके उनकी उपयोगिता समझने की कोशिश करेंगे। इसके बाद ही अलग-अलग खेती क्षेत्रों के लिए अधिक स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी।

कई साल के परीक्षण क्यों जरूरी?

राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के निदेशक के अनुसार, कटाई दिवस के आंकड़े लंबे समय के अध्ययन में मददगार हैं। केवल एक साल की उपज से किसी किस्म की पूरी क्षमता तय नहीं होती। मौसम और खेती की परिस्थितियां हर साल बदल सकती हैं।

कई वर्षों तक अलग-अलग किस्मों और क्षेत्रों से आंकड़े जुटाना जरूरी है। इससे पता चलेगा कि कौन-सी किस्म किस परिस्थिति में बेहतर उपज देती है। यह भी समझ आएगा कि नई किस्मों से उत्पादन में कितना सुधार हो रहा है।

लंबे समय के परीक्षणों से वैज्ञानिकों को शोध की दिशा तय करने में मदद मिलेगी। इसके आधार पर किसानों तक उपयोगी और भरोसेमंद जानकारी पहुंचाई जा सकेगी। फिलहाल NRC 268 और NRC 270 के शुरुआती नतीजे उम्मीद जरूर जगाते हैं।

किसानों को क्या ध्यान रखना चाहिए?

किसानों के लिए नई किस्म चुनने से पहले स्थानीय सलाह लेना जरूरी है। किसी एक खेत में मिली उपज हर जगह दोहराई जाए, यह जरूरी नहीं। बीज की उपलब्धता, क्षेत्र के अनुकूलता और खेती की लागत भी ध्यान में रखनी चाहिए।

किस्म का चयन करते समय कृषि विज्ञान केंद्र या स्थानीय कृषि विभाग से जानकारी लें। अपने इलाके में किस्म के परीक्षण और अनुशंसाओं की पुष्टि करें। बीज खरीदते समय प्रमाणित स्रोत को प्राथमिकता दें।

खेती में बीज के साथ प्रबंधन भी अहम भूमिका निभाता है। समय पर बुवाई, संतुलित खाद, जरूरत के अनुसार सिंचाई और फसल की निगरानी जरूरी है। कीट या रोग दिखने पर स्थानीय विशेषज्ञ की सलाह से कदम उठाएं।

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