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एपीडा की बैठक में मध्य प्रदेश बासमती को GI टैग दिलाने की मांग, किसानों को निर्यात से जोड़ने का प्रस्ताव

newz@gmail.com | Oct 12, 2026, 17:18 IST

एपीडा (कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) की 113वीं बैठक में सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने मध्य प्रदेश की बासमती को जीआई टैग दिलाने की मांग रखी। उन्होंने किसान उत्पादक संगठनों को निर्यातकों से जोड़ने, प्रायोगिक निर्यात शुरू करने और मूंग, तुअर, चावल सहित क्षेत्रीय उत्पादों के लिए बाजार बढ़ाने का सुझाव दिया।

बासमती जीआई टैग

मध्य प्रदेश के कृषि उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने की पहल तेज करने की मांग उठी है। होशंगाबाद-नरसिंहपुर के सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने यह मुद्दा उठाया। वे कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority) यानी एपीडा के सदस्य भी हैं। उन्होंने प्राधिकरण की 113वीं बैठक में कई प्रस्ताव रखे।

सांसद ने मध्य प्रदेश की बासमती धान को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) यानी जीआई पहचान दिलाने की मांग की। उन्होंने इस प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उनका कहना है कि प्रदेश के कृषि उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना जरूरी है।

जीआई पहचान किसी उत्पाद को उसके खास भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ती है। यह पहचान उस क्षेत्र की विशेष गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य खासियतों पर आधारित होती है। कृषि उत्पादों के लिए ऐसी पहचान उनकी अलग पहचान बनाने में मदद कर सकती है। हालांकि, जीआई टैग मिलने से बेहतर कीमत या निर्यात की गारंटी अपने आप नहीं मिलती।

मध्य प्रदेश की बासमती को जीआई पहचान दिलाने के लिए तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया जरूरी होगी। सांसद ने संभावित उत्पादक क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने का सुझाव दिया। उन्होंने उत्पादन क्षेत्रों का नक्शा तैयार करने की जरूरत भी बताई। साथ ही, गुणवत्ता जांच और जरूरी तकनीकी दस्तावेज तैयार करने पर जोर दिया।

उन्होंने उपज की पहचान और उसकी निगरानी की व्यवस्था बनाने का भी प्रस्ताव रखा। इससे उत्पाद की गुणवत्ता और स्रोत से जुड़ी जानकारी दर्ज करने में मदद मिल सकती है। पैकेजिंग और निर्यातकों से संपर्क को भी इस प्रक्रिया से जोड़ने का सुझाव दिया गया। इसके साथ प्रायोगिक निर्यात शुरू करने की बात भी रखी गई।

बासमती के लिए क्या करना होगा?

बासमती को जीआई पहचान दिलाने के लिए केवल मांग उठाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए उत्पादन क्षेत्र, धान की विशेषताओं और ऐतिहासिक प्रमाणों से जुड़े दस्तावेज जरूरी होंगे। वैज्ञानिक सर्वेक्षण से संभावित उत्पादक क्षेत्रों की जानकारी जुटाई जा सकती है। गुणवत्ता जांच से उपज की विशेषताओं का आकलन करने में मदद मिलेगी।

सांसद ने सुझाव दिया कि इन कामों के लिए जरूरी तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाए। किसानों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ने की जरूरत बताई गई। उपज की पहचान, गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी पर विशेष ध्यान देने का प्रस्ताव है।

इसका एक उद्देश्य किसानों को निर्यात की प्रक्रिया समझाना भी है। निर्यात के लिए केवल अच्छी फसल उगाना पर्याप्त नहीं होता। खरीदारों की जरूरत, गुणवत्ता मानक और पैकेजिंग भी महत्वपूर्ण होते हैं। बाजार तक पहुंचने के लिए उत्पादकों को निर्यातकों से संपर्क बनाना पड़ता है।

सांसद ने इन सभी पहलुओं को साथ लेकर चलने का सुझाव दिया। हालांकि, बैठक में मांग रखे जाने का अर्थ यह नहीं है कि बासमती को जीआई टैग मिल गया है। इसके लिए संबंधित प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होगा।

FPO को निर्यातकों से जोड़ने का प्रस्ताव

सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने किसान उत्पादक संगठनों को निर्यात कारोबार से जोड़ने पर जोर दिया। किसान उत्पादक संगठन (Farmer Producer Organization) यानी एफपीओ किसानों का ऐसा समूह होता है। इसके जरिए किसान सामूहिक रूप से उत्पादन और बिक्री से जुड़े काम कर सकते हैं। इससे बाजार तक पहुंच बनाने के प्रयासों को संगठित करना आसान हो सकता है।

सांसद ने एफपीओ और सहकारी समितियों को सीधे निर्यातकों से जोड़ने का सुझाव दिया। उन्होंने एपीडा से तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराने का आग्रह किया। इसका उद्देश्य किसानों को निर्यात कारोबार की व्यावहारिक जानकारी देना है। साथ ही, उन्हें संभावित खरीदारों तक पहुंचाने में मदद करना है।

उन्होंने कम से कम एक या दो कृषि उत्पादों की प्रायोगिक निर्यात खेप भेजने का प्रस्ताव रखा। इससे उत्पादकों को निर्यात की वास्तविक प्रक्रिया समझने का अवसर मिल सकता है। उन्हें गुणवत्ता, पैकेजिंग और परिवहन से जुड़ी जरूरतों का अनुभव भी मिलेगा। इससे आगे बड़े स्तर पर निर्यात की तैयारी करने में मदद मिल सकती है।

प्रायोगिक निर्यात का मतलब सीमित मात्रा में उत्पाद को बाजार तक भेजकर प्रक्रिया समझना है। इससे संभावित खरीदारों की मांग और उत्पाद की स्वीकार्यता का आकलन किया जा सकता है। हालांकि, इसका लाभ उत्पाद की गुणवत्ता और बाजार की शर्तों पर निर्भर करेगा।

एफपीओ के लिए यह व्यवस्था खास महत्व रख सकती है। छोटे किसान अकेले बड़े खरीदारों तक पहुंचने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। सामूहिक रूप से काम करने पर उत्पाद की उपलब्ध मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इससे खरीदारों के साथ बातचीत और आपूर्ति की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।

मूंग और तुअर के निर्यात पर जोर

बैठक में केवल बासमती पर चर्चा नहीं हुई। सांसद ने मध्य प्रदेश के दूसरे कृषि उत्पादों के निर्यात की योजना बनाने का भी सुझाव दिया। इनमें मूंग, चावल, मोटे अनाज और तुअर शामिल हैं। उन्होंने अन्य संभावित कृषि उत्पादों को भी इस पहल में शामिल करने की बात कही।

नर्मदापुरम में पहले आयोजित क्षमता निर्माण कार्यक्रम को आधार बनाने का सुझाव दिया गया। इसके आधार पर अलग-अलग कृषि उत्पादों के लिए कार्ययोजना बनाई जा सकती है। हर उत्पाद की गुणवत्ता, बाजार और आपूर्ति से जुड़ी जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए सभी फसलों के लिए एक जैसी योजना पर्याप्त नहीं होगी।

मूंग और तुअर जैसी दलहन फसलों के लिए गुणवत्ता और प्रसंस्करण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। चावल और बासमती के लिए किस्म की पहचान तथा गुणवत्ता मानक अहम हैं। मोटे अनाज के लिए भी बाजार की मांग के अनुरूप तैयारी करनी होगी। सांसद ने इन उत्पादों के निर्यात के लिए अलग-अलग योजनाएं बनाने का प्रस्ताव रखा।

एपीडा से तकनीकी मदद मिलने पर एफपीओ और सहकारी समितियों को निर्यात संबंधी जानकारी मिल सकती है। इससे उन्हें खरीदारों से संपर्क बनाने में भी मदद मिल सकती है। प्रायोगिक खेप के जरिए निर्यात प्रक्रिया की चुनौतियों को समझा जा सकता है। आगे की योजना इन अनुभवों के आधार पर बनाई जा सकती है।

पैक हाउस और प्रसंस्करण इकाई

कृषि उत्पादों को बाजार के लिए तैयार करने में पैक हाउस की अहम भूमिका होती है। सांसद ने क्षेत्र में एकीकृत पैक हाउस स्थापित करने की संभावनाओं पर जोर दिया। इसके साथ दलहन की ग्रेडिंग, प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाई बनाने का सुझाव भी रखा।

ग्रेडिंग में उत्पादों को उनकी गुणवत्ता, आकार या अन्य मानकों के आधार पर अलग किया जाता है। इससे खरीदारों की जरूरत के मुताबिक उपज तैयार करने में मदद मिलती है। प्रसंस्करण से उत्पाद को बाजार के अनुकूल रूप दिया जा सकता है। बेहतर पैकेजिंग से परिवहन और भंडारण के दौरान उत्पाद को संभालने में मदद मिल सकती है।

सांसद ने एपीडा के भोपाल स्थित क्षेत्रीय कार्यालय से तकनीकी मार्गदर्शन देने का आग्रह किया। यह मदद क्षेत्र के एफपीओ और सहकारी समितियों को परियोजना प्रस्ताव तैयार करने में मिल सकती है। उन्होंने पात्र योजनाओं के तहत प्रस्ताव बनाने में सहयोग मांगा।

ऐसी इकाइयों की स्थापना से किसानों और संगठनों को अपनी उपज तैयार करने की सुविधा मिल सकती है। लेकिन इसके लिए सही स्थान, निवेश और नियमित संचालन की योजना जरूरी होगी। बाजार की मांग के अनुसार इकाई की क्षमता तय करना भी महत्वपूर्ण है।

प्रसंस्करण और पैकेजिंग की सुविधाएं निर्यात की तैयारी में सहायक हो सकती हैं। फिर भी केवल इकाई स्थापित करने से निर्यात सुनिश्चित नहीं होता। उत्पाद की गुणवत्ता, खरीदारों की मांग और आपूर्ति की नियमितता भी जरूरी हैं।

गुड़ और बैंगन की ब्रांडिंग

सांसद ने नरसिंहपुर के जीआई पहचान प्राप्त गुड़ और बरमान घाट बैंगन को लेकर भी सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि इन उत्पादों को केवल प्रमाणन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इनके लिए गुणवत्ता मानकीकरण, ब्रांडिंग और निर्यात के अनुकूल पैकेजिंग पर काम होना चाहिए।

इन उत्पादों को संभावित खरीदारों से जोड़ने की कार्ययोजना बनाने का प्रस्ताव रखा गया। प्रायोगिक निर्यात के जरिए बाजार की संभावनाएं भी परखी जा सकती हैं। इससे उत्पादों की पहचान को व्यावसायिक अवसरों में बदलने में मदद मिल सकती है।

जीआई पहचान किसी उत्पाद को अलग पहचान दिलाने का आधार बन सकती है। लेकिन बाजार में जगह बनाने के लिए लगातार अच्छी गुणवत्ता जरूरी है। खरीदारों की जरूरतों के अनुसार पैकेजिंग और आपूर्ति भी महत्वपूर्ण हैं। प्रचार और ब्रांडिंग से संभावित ग्राहकों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।

सांसद ने गाडरवारा की तुअर दाल के जीआई आवेदन की स्थिति की समीक्षा का सुझाव भी दिया। उन्होंने लंबित तकनीकी और दस्तावेजी प्रक्रियाएं पूरी कराने में सहयोग मांगा। साथ ही, जीआई आवेदन की प्रक्रिया के समानांतर संभावित निर्यात बाजार की तैयारी करने पर जोर दिया।

इस प्रस्ताव में दो पहलुओं पर एक साथ काम करने की बात है। पहला, उत्पाद की भौगोलिक पहचान से जुड़ी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना। दूसरा, संभावित खरीदारों और बाजार की जरूरतों को समझना। इससे भविष्य में बाजार से जुड़ने की तैयारी पहले से की जा सकती है।

गुणवत्ता जांच की सुविधा जरूरी

निर्यात के लिए कृषि उत्पादों की गुणवत्ता जांच महत्वपूर्ण होती है। सांसद ने नर्मदापुरम और नरसिंहपुर में स्थानीय स्तर पर नमूना संग्रह की सुविधा मांगी। उन्होंने किसानों और एफपीओ के लिए गुणवत्ता जांच की व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया।

इसका उद्देश्य किसानों को जांच के लिए दूर जाने की परेशानी से राहत देना है। स्थानीय सुविधा मिलने पर उत्पादों के नमूने जमा करना आसान हो सकता है। इससे गुणवत्ता संबंधी जानकारी हासिल करने में भी मदद मिल सकती है।

सांसद ने जैविक और निर्यात के लिए तैयार कृषि उत्पादों की अवशेष जांच पर भी जोर दिया। अवशेष जांच से उत्पादों में कीटनाशकों या दूसरे रसायनों के बचे अंशों का पता लगाया जाता है। निर्यात बाजारों में कई उत्पादों के लिए तय सीमा का पालन करना जरूरी होता है।

उन्होंने गुणवत्ता प्रमाणन और खेत स्तर पर उपज की पहचान की व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया। निगरानी से उत्पाद के स्रोत और उत्पादन से जुड़ी जानकारी दर्ज की जा सकती है। इससे खरीदारों की जरूरतों के अनुसार दस्तावेज तैयार करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, जांच सुविधा का प्रस्ताव और उसका स्थापित होना अलग-अलग बातें हैं। इसके लिए जरूरी संसाधन, तकनीकी व्यवस्था और संचालन की योजना चाहिए। किसानों को यह भी जानकारी मिलनी चाहिए कि जांच कहां और कैसे कराई जा सकती है।

खरीदार-विक्रेता बैठक का सुझाव

सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने नर्मदापुरम या नरसिंहपुर में जिला स्तरीय खरीदार-विक्रेता बैठक कराने का सुझाव दिया। उन्होंने एपीडा से इसके आयोजन में सहयोग मांगा। ऐसी बैठक में कृषि उत्पादक, एफपीओ, सहकारी समितियां और संभावित खरीदार आपस में संपर्क कर सकते हैं।

इस तरह की बैठक से उत्पादकों को बाजार की जरूरत समझने का अवसर मिल सकता है। खरीदार उत्पाद की गुणवत्ता, मात्रा और पैकेजिंग से जुड़ी अपेक्षाएं बता सकते हैं। किसान संगठन भी अपनी उपज और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी साझा कर सकते हैं।

सांसद ने क्षेत्र के कृषि उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में प्रदर्शित करने का सुझाव भी दिया। इसमें जीआई पहचान वाले उत्पादों के साथ दूसरे संभावित निर्यात उत्पाद शामिल हो सकते हैं। ऐसे आयोजनों में भागीदारी से नए खरीदारों तक पहुंचने की संभावना बन सकती है।

लेकिन व्यापार मेलों में हिस्सा लेना ही बिक्री की गारंटी नहीं है। इसके लिए उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत और नियमित आपूर्ति महत्वपूर्ण रहती है। खरीदारों से संपर्क के बाद बातचीत को व्यावसायिक समझौतों तक पहुंचाना भी जरूरी है।

किसानों को क्या फायदा हो सकता है?

बैठक में रखे गए प्रस्तावों का मुख्य उद्देश्य किसानों को बाजार से बेहतर तरीके से जोड़ना है। इसके लिए उत्पादन से लेकर पैकेजिंग और निर्यात तक की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया। एफपीओ और सहकारी समितियों की भागीदारी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा हो सकती है।

बासमती को जीआई पहचान मिलने की दिशा में प्रगति होती है, तो प्रदेश के उत्पादकों को अपनी उपज की क्षेत्रीय पहचान मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, इसके लिए जरूरी तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। पहचान मिलने के बाद भी गुणवत्ता और बाजार की तैयारी महत्वपूर्ण रहेंगी।

मूंग, तुअर, चावल और मोटे अनाज के लिए अलग कार्ययोजनाएं बनाने से फसल आधारित बाजार रणनीति तैयार की जा सकती है। पैक हाउस और प्रसंस्करण इकाइयां उपज को बाजार के अनुरूप तैयार करने में मदद कर सकती हैं। स्थानीय गुणवत्ता जांच की सुविधा से निर्यात की तैयारी आसान हो सकती है।

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