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Fish Farming Policy: मध्यप्रदेश में दोगुना होगा मछली उत्पादन, सीएम बोले- मत्स्य पालन से 50 हजार रोजगार का लक्ष्य

newz@gmail.com | Oct 23, 2026, 20:13 IST

मध्यप्रदेश सरकार ने मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के लिए एकीकृत मत्स्य उद्योग नीति 2026 लागू की है। अगले तीन वर्षों में उत्पादन 10 लाख टन करने का लक्ष्य है। सरकार निवेश, निर्यात, फूड प्रोसेसिंग और केज कल्चर को बढ़ावा देकर 50 हजार रोजगार के अवसर तैयार करना चाहती है।

मध्यप्रदेश में नई नीली क्रांति

मध्यप्रदेश में मछली पालन को बड़े उद्योग के रूप में विकसित करने की तैयारी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मत्स्य उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। सरकार का कहना है कि नई एकीकृत मत्स्य उद्योग नीति 2026 से किसानों और मछली पालकों को लाभ मिलेगा। इसके लिए जल संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जाएगा।

23 अक्टूबर को उज्जैन में नेशनल फिशरीज इन्वेस्टर्स एंड एक्सपोर्टर्स कॉन्क्लेव 2026 आयोजित हुआ। इसमें देश-विदेश के निवेशक, निर्यातक, खरीदार और विक्रेता शामिल हुए। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में राज्य की मत्स्य पालन योजनाओं और निवेश की संभावनाओं पर बात की।

मुख्यमंत्री के अनुसार, राज्य में मछली उत्पादन जल्द दोगुना करने की योजना है। सरकार जलाशयों को कई कामों के लिए उपयोगी बनाना चाहती है। इन जलस्रोतों से सिंचाई, पेयजल, पशुओं के लिए पानी और मछली उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। जल पर्यटन और जलीय जीवों का संरक्षण भी इसके उद्देश्य हैं।

तीन साल में 10 लाख टन लक्ष्य

मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने बताया कि मध्यप्रदेश में वर्तमान मत्स्य उत्पादन 4.45 लाख टन है। राज्य ने अगले तीन वर्षों में इसे 10 लाख टन तक पहुंचाने का संकल्प लिया है। यह लक्ष्य उत्पादन में बड़ी बढ़ोतरी की मांग करता है। इसे हासिल करने के लिए उत्पादन क्षमता और बाजार व्यवस्था दोनों मजबूत करनी होंगी।

मुख्यमंत्री ने नई नीति के तहत एक लाख नए केज कल्चर स्थापित करने का लक्ष्य भी बताया। केज कल्चर में जलाशयों के भीतर जाल से बने पिंजरों में मछलियां पाली जाती हैं। इससे उपलब्ध जल क्षेत्र का योजनाबद्ध तरीके से उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, इसकी सफलता पानी की गुणवत्ता, मछलियों की प्रजाति और प्रबंधन पर निर्भर करेगी।

राज्य सरकार बड़े जलाशयों के साथ छोटे जलस्रोतों को भी मत्स्य पालन से जोड़ना चाहती है। इसके लिए उपयुक्त स्थानों पर सुविधाएं विकसित करने की योजना है। मुख्य सचिव के अनुसार, मध्यप्रदेश के 49 जलाशयों में मत्स्य पालन सुविधाओं के विकास के लिए राशि स्वीकृत की जा रही है। इससे स्थानीय मछली पालकों और निवेशकों को अवसर मिल सकते हैं।

बारना जलाशय में 500 केज शुरू

रायसेन जिले के बारना जलाशय में एक नई पहल शुरू की गई। यहां सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership, PPP) के तहत 500 केज कल्चर का शुभारंभ हुआ। यह मध्यप्रदेश में इस तरह की पहली पहल बताई गई है। इससे मत्स्य पालन में निजी निवेश की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने भी भाग लिया। दोनों ने जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास की योजना की प्रशासनिक मंजूरी हस्तांतरित की। इसका उद्देश्य जल संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है। योजना के तहत मत्स्य पालन को भी विकास गतिविधियों से जोड़ने की तैयारी है।

सरकार का मानना है कि जलाशयों का सही प्रबंधन कई क्षेत्रों को लाभ पहुंचा सकता है। इससे सिंचाई और पशुपालन के लिए पानी उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। साथ ही, मत्स्य उत्पादन और जल पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। इसके लिए स्थानीय जरूरतों और पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखना जरूरी होगा।

फूड प्रोसेसिंग से बढ़ेगी कमाई

सरकार मत्स्य पालन को फूड प्रोसेसिंग उद्योग से जोड़ने की तैयारी कर रही है। इसका मकसद मछली उत्पादन के बाद होने वाले कामों को बढ़ावा देना है। इनमें प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग और मार्केटिंग शामिल हैं। इससे मछली उत्पादकों को बिक्री के नए विकल्प मिल सकते हैं।

केवल मछली उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उसे सुरक्षित तरीके से बाजार तक पहुंचाना भी जरूरी है। प्रसंस्करण और पैकेजिंग की सुविधाएं मिलने से उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे घरेलू बाजार के साथ निर्यात के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

मुख्यमंत्री ने मत्स्य उद्योग को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (Micro, Small and Medium Enterprises, MSME) क्षेत्र से जोड़ने की घोषणा की। इसके तहत प्रोत्साहन और आर्थिक सहायता देने की बात कही गई है। निवेशकों को जमीन आवंटन और तकनीकी मदद जैसी सुविधाएं भी देने की योजना है।

सरकार निवेशकों और मत्स्य उत्पादकों के लिए जरूरी सुविधाएं विकसित करना चाहती है। नई नीति के तहत उद्योग के विस्तार को प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे मछली पालन से जुड़े छोटे कारोबारियों को भी लाभ मिल सकता है। लेकिन योजनाओं का वास्तविक असर मिलने वाली सहायता और उसके सही क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

निवेश से रोजगार की उम्मीद

मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने मत्स्य क्षेत्र में निवेश और रोजगार को लेकर लक्ष्य बताए। उनके अनुसार, हर साल 5 हजार करोड़ रुपए का निवेश बढ़ाने का लक्ष्य है। इससे 50 हजार रोजगार के अवसर पैदा करने की योजना है। ये लक्ष्य हैं, इन्हें हासिल करने के लिए निवेश और परियोजनाओं की प्रगति अहम होगी।

मत्स्य पालन से केवल मछली उत्पादकों को ही काम नहीं मिलता। मछली का परिवहन, भंडारण, पैकेजिंग और बिक्री भी रोजगार पैदा कर सकते हैं। प्रसंस्करण इकाइयों में भी स्थानीय लोगों को काम मिलने की संभावना है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में कमाई के नए रास्ते खुल सकते हैं।

सरकार स्टार्टअप, निवेशक और निर्यातकों को भी इस क्षेत्र में प्रोत्साहित करना चाहती है। इसके लिए निवेश और निर्यात से जुड़ी मार्गदर्शिका जारी की गई। कार्यक्रम में एक्सपोर्ट पोर्टल की मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure, SOP) का भी विमोचन हुआ। इससे कारोबारियों को जरूरी प्रक्रिया समझने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, रोजगार के अवसर तभी टिकाऊ होंगे, जब परियोजनाएं जमीन पर शुरू होंगी। स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देना भी जरूरी होगा। छोटे मछली पालकों की बाजार तक पहुंच बेहतर बनानी होगी। इससे बड़े निवेश के साथ छोटे उत्पादकों को भी लाभ मिल सकता है।

एकीकृत मॉडल से बढ़ेगा कारोबार

मध्यप्रदेश की नई नीति में मछली पालन को दूसरे कामों से जोड़ने की योजना है। इसमें एक्वापोनिक्स, मोती पालन और बतख पालन भी शामिल हैं। एक्वापोनिक्स में मछली पालन और पौधों की खेती को एक साथ जोड़ा जाता है। इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की संभावना बनती है।

मत्स्य पालन विभाग के सचिव स्वतंत्र कुमार सिंह ने इस मॉडल की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नीति के तहत निजी निवेश के रास्ते खोले गए हैं। निवेशकों को एक ही पोर्टल से सुविधाएं देने की योजना है। इसका उद्देश्य निवेश की प्रक्रिया को आसान बनाना है।

सरकार का कहना है कि राज्य में पर्याप्त जल संसाधन मौजूद हैं। इंदिरा सागर जैसे बड़े जलाशय मत्स्य पालन की संभावनाएं बढ़ाते हैं। उपयुक्त जलाशयों में आधुनिक केज कल्चर को प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे उत्पादन बढ़ाने के साथ ग्रामीण कारोबार को भी बढ़ावा मिल सकता है।

केंद्र सरकार का सहयोग

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मध्यप्रदेश की नई नीति की सराहना की। उन्होंने कहा कि राज्य मत्स्य उद्योग में आगे बढ़ने की क्षमता रखता है। उनके अनुसार, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है। देश में मत्स्य उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

मंत्री के अनुसार, वर्ष 2014 में भारत का मत्स्य उत्पादन 95.7 लाख टन था। उनके बताए आंकड़ों के मुताबिक, अब यह बढ़कर 198 लाख टन हो गया है। उन्होंने इस अवधि में 106 प्रतिशत वृद्धि का उल्लेख किया। उन्होंने मत्स्य निर्यात का मूल्य 62,408 करोड़ रुपए बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत 130 देशों में मत्स्य उत्पादों का निर्यात कर रहा है। इन आंकड़ों का संबंध देश के कुल मत्स्य क्षेत्र से है। इन्हें मध्यप्रदेश के उत्पादन या निर्यात के आंकड़े नहीं समझना चाहिए। राज्य को राष्ट्रीय स्तर की इस बढ़ोतरी से लाभ लेने के लिए अपनी व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने भी मत्स्य पालन का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि किसान खेती के साथ मछली पालन अपना सकते हैं। पशुपालन, बकरी पालन और मुर्गी पालन भी आय के विकल्प हैं। उनके अनुसार, ऐसे काम किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

जल संरक्षण पर भी जोर

मुख्यमंत्री ने जल संसाधनों के विकास और संरक्षण पर भी बात की। उन्होंने बताया कि प्रदेश में सिंचाई का रकबा 69 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा है। सरकार इसे 100 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना चाहती है। इसके लिए जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन जरूरी होगा।

केन-बेतवा लिंक और पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजनाओं का भी उल्लेख किया गया। सरकार का मानना है कि नदी जोड़ने की योजनाओं से जल उपलब्धता बढ़ सकती है। हालांकि, इन परियोजनाओं का मत्स्य उत्पादन पर असर उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। जलस्रोतों की गुणवत्ता और जलीय जीवों का संरक्षण भी जरूरी रहेगा।

मुख्यमंत्री ने जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत किए गए कामों की जानकारी दी। उनके अनुसार, जल संरक्षण के लिए 10 हजार करोड़ रुपए के कार्य किए गए हैं। पुराने जलस्रोतों के जीर्णोद्धार और नए जलाशयों के निर्माण पर भी जोर दिया गया। सरकार आरक्षित वन क्षेत्रों में भी बड़े जलस्रोत विकसित करने की योजना बना रही है।

ऐसे जलस्रोत वन्य जीवों के लिए पानी उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं। इनसे भूजल स्तर में सुधार की संभावना भी रहती है। लेकिन जलाशय विकसित करते समय पर्यावरणीय जरूरतों का आकलन जरूरी है। मत्स्य पालन और प्राकृतिक जीवन के बीच संतुलन बनाए रखना अहम होगा।

किसानों और मछुआरों को लाभ

मत्स्य पालन को बढ़ावा देने का एक बड़ा उद्देश्य ग्रामीण आय के अवसर बढ़ाना है। किसान अपनी जमीन और उपलब्ध जलस्रोतों के अनुसार विकल्प चुन सकते हैं। मछली पालन के साथ प्रसंस्करण और बिक्री में भी काम मिल सकता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिलने की संभावना है।

मत्स्य पालन सचिव के अनुसार, देश में करीब 6 करोड़ लोगों की आजीविका इस क्षेत्र से जुड़ी है। यह क्षेत्र खाद्य और पोषण सुरक्षा में भी योगदान देता है। इसलिए उत्पादन बढ़ाने के साथ गुणवत्ता और सुरक्षित प्रसंस्करण पर ध्यान देना जरूरी है। निर्यात बढ़ाने के लिए भी इन पहलुओं का महत्व है।

नई नीति से छोटे मछली पालकों को कितना लाभ मिलेगा, यह आगे स्पष्ट होगा। इसके लिए उन्हें तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार की जानकारी चाहिए। योजनाओं तक आसान पहुंच और समय पर सहायता भी जरूरी है। तभी निवेश और उत्पादन बढ़ने का लाभ स्थानीय परिवारों तक पहुंच सकेगा।

आगे क्या रहेगा अहम?

मध्यप्रदेश सरकार ने मत्स्य उत्पादन, निवेश और रोजगार बढ़ाने के लिए बड़े लक्ष्य रखे हैं। अगले तीन वर्षों में 10 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ एक लाख केज कल्चर स्थापित करने की योजना भी है। इन लक्ष्यों की प्रगति पर लगातार नजर रखनी होगी।

बारना जलाशय में शुरू हुई 500 केज कल्चर परियोजना इस दिशा में शुरुआती कदम है। अब दूसरी जगहों पर सुविधाएं विकसित करना और निवेश आकर्षित करना महत्वपूर्ण होगा। फूड प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और निर्यात की व्यवस्था भी साथ-साथ बढ़ानी होगी। इससे उत्पादन को बाजार की मांग से जोड़ने में मदद मिलेगी।

कुल मिलाकर, नई नीति मध्यप्रदेश में मत्स्य पालन को बड़े आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने की कोशिश है। सरकार जलस्रोतों को उत्पादन, निवेश और रोजगार से जोड़ना चाहती है। अब इस योजना की सफलता उसके जमीन पर लागू होने से तय होगी। किसानों, मछुआरों और निवेशकों तक लाभ पहुंचना सबसे अहम होगा।

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