किसान की बात,सूत्र के साथ

खेत में फसल, हाथ में कर्ज और सामने मौत, देश का पेट भरने वाले किसान खुद क्यों है बेहाल?

Suraj | Aug 14, 2026, 12:12 IST

BHOPAL देश में अनाज का उत्पादन लगातार रिकॉर्ड बना रहा है। चावल और गेहूं की पैदावार बढ़ रही है। भारत दुनिया के दूसरे देशों को भी अनाज निर्यात कर रहा है। आंकड़े देश की कृषि ताकत की तस्वीर दिखाते हैं, लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू परेशान करने वाला है।

जिस किसान की मेहनत से देश का अन्न भंडार भरता है, उसी किसान की जेब खाली है। उसकी जमीन लगातार छोटी हो रही है। खेती की लागत बढ़ रही है।

कर्ज का बोझ बढ़ रहा है और बाजार में अपनी उपज की कीमत तय करने की ताकत उसके हाथ में नहीं है। हालात ऐसे हैं कि हजारों किसान और कृषि मजदूर हर साल जान देने को मजबूर हैं।

‘किसान सूत्र’ की इस खास रिपोर्ट में आंकड़ों के जरिए समझिए कि देश के अन्नदाता की हालत आखिर इतनी कमजोर क्यों होती जा रही है।

42.3% आबादी की आजीविका, GDP में 18.2% हिस्सा

कृषि और संबद्ध क्षेत्र देश की करीब 42.3 प्रतिशत आबादी को आजीविका देता है। मौजूदा कीमतों पर GDP में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 18.2 प्रतिशत है। पिछले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर 4.18 प्रतिशत रही है। वहीं 2023-24 में इसकी वृद्धि दर 1.4 प्रतिशत रहने का अनुमान दर्ज किया गया था।

आजादी के शुरुआती वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि और संबद्ध गतिविधियों का योगदान करीब आधे के आसपास था। समय के साथ उद्योग और सेवा क्षेत्र तेजी से बढ़े और GDP में कृषि की हिस्सेदारी घटती गई है। इसके बावजूद खेती पर निर्भर आबादी आज भी बहुत बड़ी है।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि कृषि और संबद्ध क्षेत्र में सिर्फ खेती शामिल नहीं है। इसमें पशुपालन, डेयरी, मत्स्य और वानिकी जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं।

समझिए किसान की पूरी कहानी

फसल उत्पादन के मोर्चे पर भारत लगातार मजबूत हो रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार पिछले 10 वर्षों में देश के फसल उत्पादन में 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के वर्ष 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमानों में भी उत्पादन की तस्वीर मजबूत दिखाई देती है।

अनुमानों के मुताबिक, खरीफ खाद्यान्न उत्पादन 1741.44 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। रबी खाद्यान्न उत्पादन 1745.13 लाख मीट्रिक टन अनुमानित है। पिछले वर्ष खरीफ खाद्यान्न उत्पादन 1694.60 लाख मीट्रिक टन था।

पिछले वर्ष रबी खाद्यान्न उत्पादन 1691.66 लाख मीट्रिक टन था। यानी खरीफ में करीब 46 लाख मीट्रिक टन यानी 2.8% और रबी में करीब 53 लाख मीट्रिक टन यानी 3.2% की बढ़ोतरी का अनुमान है।

चावल और गेहूं की तस्वीर भी उत्पादन में बढ़ोतरी दिखाती है। खरीफ चावल का उत्पादन रिकॉर्ड 1239.28 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। 2024-25 में यह 1227.72 लाख मीट्रिक टन था। यानी करीब 11.56 लाख मीट्रिक टन की बढ़ोतरी।

रबी चावल का उत्पादन 167.20 लाख मीट्रिक टन अनुमानित है। गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 1202.10 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। पिछले वर्ष यह 1179.45 लाख मीट्रिक टन था।

यानी करीब 22.65 लाख मीट्रिक टन अधिक। इस तरह फसल बढ़ रही है, उत्पादन बढ़ रहा है, रिकॉर्ड बन रहे हैं। फिर किसान की आमदनी उसी रफ्तार से क्यों नहीं बढ़ रही है?

रिकॉर्ड उत्पादन, फिर किसान की जेब खाली क्यों?

किसान की कुल आमदनी में खेती का हिस्सा ही कितना?

एक सर्वे के अनुसार, देश में एक कृषि परिवार की कुल मासिक आय में खेती से होने वाली आय का हिस्सा करीब एक-तिहाई ही है। बाकी आय नौकरी, मजदूरी और दूसरे गैर-कृषि स्रोतों से आती है। जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से अधिक जमीन है, वे छोटी जोत वाले किसानों की तुलना में करीब दोगुना कमाते हैं। यानी देश में बड़ी संख्या छोटे और सीमांत किसानों की है, लेकिन खेती से ही पूरे परिवार का गुजारा चलाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।

MSP में कागज पर सुरक्षा, खेत में सवाल

सरकार करीब 23 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP घोषित करती है, लेकिन वास्तविक सरकारी खरीद का बड़ा हिस्सा गेहूं और धान तक सीमित रहता है। बाकी फसलों के मामले में किसान खुले बाजार और बिचौलियों पर निर्भर रहता है। कई बार बाजार भाव लागत से भी नीचे चला जाता है। तब किसान के सामने दो ही रास्ते बचते हैं कि या सस्ता बेचो या उपज घर वापस ले जाओ।

मौसम बदल रहा है, जोखिम बढ़ रहा है

देश के बड़े हिस्से की खेती आज भी मानसून पर निर्भर है। असमय बारिश, सूखा, ओलावृष्टि और बदलते मौसम के पैटर्न से फसल बर्बाद होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। फसल खराब होती है तो किसान की पूरी आर्थिक व्यवस्था हिल जाती है। फसल बीमा और मुआवजा तंत्र से राहत की उम्मीद रहती है, लेकिन यह व्यवस्था अब भी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानी जाती। एक मौसम किसान की महीनों की मेहनत मिटा सकता है।

खेत से बाजार तक किसान कहां है?

किसान की परेशानी खेत पर खत्म नहीं होती। असली संघर्ष कई बार फसल तैयार होने के बाद शुरू होता है। भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था का अभाव किसान के संकट को बढ़ाता है। कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण उद्योग की कमी से भारी मात्रा में उपज बर्बाद होती है। सीधे बाजार तक पहुंच नहीं होने पर किसान को बिचौलियों के माध्यम से अपनी उपज बेचनी पड़ती है और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कई बार बंपर उत्पादन ही बाजार में कीमत गिरने का कारण बन जाता है।

आखिर खेती लाभ का धंधा क्यों नहीं बन पा रही?

  1. छोटी और बिखरी जोत : छोटी जमीन बड़े पैमाने की खेती और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल में बाधा बनती है।
  2. बढ़ती लागत : बीज, खाद, डीजल और मजदूरी महंगी होती जा रही है, जबकि उपज की कीमत बाजार पर निर्भर है।
  3. मूल्य श्रृंखला पर किसान का नियंत्रण नहीं : खेत से उपभोक्ता तक पहुंचने के बीच कई स्तरों पर मुनाफा बनता है, लेकिन सबसे ज्यादा मेहनत करने वाले किसान की आय सीमित रह जाती है।
  4. बढ़ता जलवायु जोखिम : बारिश, सूखा और बाढ़ सीधे उत्पादन और किसान की आय को प्रभावित करते हैं।
  5. भंडारण और प्रसंस्करण की कमी : रिकॉर्ड उत्पादन का पूरा लाभ किसान तक नहीं पहुंच पाता। उचित भंडारण और प्रसंस्करण की कमी से उपज खराब होती है और बाजार में आपूर्ति बढ़ने पर भाव भी गिर सकते हैं।

और फिर आता है सबसे दर्दनाक आंकड़ा…

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की ‘भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024’ रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। यह देश में दर्ज कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत है। इनमें 5,913 कृषि मजदूर थे।

यानी कृषि क्षेत्र से जुड़ी आत्महत्याओं में कृषि मजदूरों की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत रही। यह पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक है। दिन के हिसाब से देखें तो औसतन करीब 28 किसान और कृषि मजदूर हर दिन आत्महत्या कर रहे हैं।

घंटों में बांटें तो तस्वीर और भयावह हो जाती है। यानी औसतन हर घंटे एक किसान या कृषि मजदूर अपनी जिंदगी खत्म कर रहा है। 2023 में कृषि क्षेत्र से जुड़े आत्महत्याओं की संख्या 10,786 थी। 2024 में यह संख्या थोड़ी घटकर 10,546 रही। 2022 में यह आंकड़ा 11,290 था, जो कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं का सबसे ऊंचा स्तर दर्ज किया गया था।

सबसे ज्यादा मौतें कृषि मजदूरों की

2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े आत्महत्या करने वालों में 5,913 कृषि मजदूर थे। कुल कृषि क्षेत्र की आत्महत्याओं में उनकी हिस्सेदारी 56 प्रतिशत रही। 2020 में कृषि क्षेत्र की कुल आत्महत्याओं में कृषि मजदूरों की हिस्सेदारी 47.75 प्रतिशत थी। यानी यह चिंताजनक आंकड़ा लगातार बढ़ा है।

यह तस्वीर इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि औसत कृषि परिवार की आय में खेती से होने वाली आय अपेक्षाकृत कम होती जा रही है और मजदूरी तथा गैर-कृषि आय पर निर्भरता बढ़ रही है।

महाराष्ट्र आगे, मध्य प्रदेश भी गंभीर

कृषि क्षेत्र में आत्महत्या के सबसे अधिक मामले महाराष्ट्र में 3,824 दर्ज किए गए हैं। यह देश में कृषि क्षेत्र की कुल आत्महत्याओं का 36.26 प्रतिशत है। NCRB रिपोर्ट इन आत्महत्याओं के कारणों का उल्लेख नहीं करती।

हालांकि, 2024 में महाराष्ट्र में बाढ़ सहित चरम मौसमीय घटनाओं से कम-से-कम 20,37,651 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ था। देशभर में चरम मौसमीय घटनाओं से प्रभावित 40,72,523 हेक्टेयर फसल क्षेत्र में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत थी।

महाराष्ट्र के बाद…

कर्नाटक: 2,971 मामले
मध्य प्रदेश: 835 मामले
आंध्र प्रदेश: 780 मामले
तमिलनाडु: 503 मामले
छत्तीसगढ़: 486 मामले

कर्नाटक में 2023 की तुलना में कृषि क्षेत्र से जुड़ी आत्महत्याओं में 22.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। राजस्थान में 14 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 7.46 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई। वहीं आंध्र प्रदेश में 2023 की तुलना में आत्महत्याओं में 15.67 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

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