राजस्थान में मानसून सीजन में कम बारिश का असर रबी खेती पर पड़ सकता है। राज्य के जलाशयों का गिरता जलस्तर भी किसानों की चिंता बढ़ा रहा है। ऐसे में सिंचाई पानी की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है। कृषि विभाग ने किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह दी है। गेहूं के साथ कम पानी वाली फसलें लगाने का सुझाव है। जलवायु अनुकूल किस्मों के चयन पर भी जोर दिया गया है। इससे सिंचाई पानी पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। खेती की लागत घटाने में भी यह तरीका उपयोगी हो सकता है।
चना-सरसों अपनाने की सलाह
कृषि विस्तार संयुक्त निदेशक डॉ. सतीश शर्मा ने किसानों को सलाह दी। उन्होंने सीमित सिंचाई को ध्यान में रखकर फसल चयन करने को कहा। किसान सरसों, चना और जौ की उपयुक्त किस्में चुन सकते हैं। हालांकि हर खेत के लिए एक ही किस्म सही नहीं होगी। किस्म चुनते समय स्थानीय मिट्टी की स्थिति देखना जरूरी है। बुवाई का समय भी चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उपलब्ध सिंचाई सुविधा को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
सरसों की कौन सी किस्म चुनें
कृषि विभाग ने सरसों की कई किस्मों के विकल्प बताए हैं। इनका चयन खेत और बुवाई समय के अनुसार होगा। समय पर बुवाई वाले भारी खेतों में आरएच-1975 लगाई जा सकती है। ऐसे खेतों के लिए आरएच-1706 भी सुझाई गई है। सेम प्रभावित खेतों के लिए तीन किस्मों का विकल्प दिया गया है। इनमें सीएस-58, सीएस-60 और सीएस-62 शामिल हैं।
रेतीली और टिब्बा जमीन के लिए अलग किस्में सुझाई गई हैं। किसान आरएच-1424, आरएच-725 और आरएच-761 का चयन कर सकते हैं। बुवाई में देरी होने पर आरजीएन-236 का विकल्प दिया गया है। किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किस्म चुनने की सलाह है।
चने में सिंचाई का रखें ध्यान
चना बोने से पहले सिंचाई सुविधा देखना भी जरूरी है। समय पर बुवाई वाले सिंचित खेतों में जीएनजी-2171 विकल्प है। इस किस्म को मीरा नाम से भी जाना जाता है। पछेती बुवाई के लिए जीएनजी-2261 किस्म सुझाई गई है। इसे केशव किस्म के नाम से भी जाना जाता है।
असिंचित खेतों के लिए जीएनजी-2461 का विकल्प दिया गया है। इस किस्म को मूमल नाम से जाना जाता है। इस तरह चने में एक ही किस्म पर निर्भरता जरूरी नहीं है। खेत की स्थिति के अनुसार किस्म का चुनाव किया जा सकता है।
जौ में कम पानी का विकल्प
कृषि विभाग ने छिलका रहित जौ का विकल्प भी बताया है। इसके लिए डीडब्ल्यूआरबी-223 किस्म को उपयोगी बताया गया है। यह किस्म भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान ने विकसित की है। संस्थान करनाल में स्थित है।
विभाग के अनुसार इसके दानों से कई खाद्य उत्पाद बन सकते हैं। इनमें रोटी, दलिया और बिस्किट जैसे उत्पाद शामिल हैं। गेहूं की तुलना में इसमें कम संसाधनों की जरूरत बताई गई है। विभाग के मुताबिक पानी की जरूरत 30 से 40 प्रतिशत कम है। उर्वरक की जरूरत भी गेहूं की तुलना में कम बताई गई है। इस किस्म को लवणीय जमीन में भी उगाया जा सकता है। क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती का विकल्प बताया गया है। इसकी औसत उपज करीब 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है।
पोषण में भी जौ उपयोगी
डीडब्ल्यूआरबी-223 को पोषण के लिहाज से भी उपयोगी बताया गया है। विभाग के अनुसार इसमें ग्लूटेन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम बताया गया है। इसमें घुलनशील फाइबर की मात्रा अधिक होने की जानकारी दी गई है।
इस जौ में प्रोटीन सहित कई पोषक तत्व मिलते हैं। इनमें लोहा, जस्ता और कैल्शियम भी शामिल हैं। विभाग इसे संसाधन बचाने वाला विकल्प भी मानता है। इससे उत्पादन और पोषण के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।
कम पानी में गेहूं का विकल्प
विभाग ने गेहूं की खेती बंद करने की सलाह नहीं दी है। इसके बजाय सिंचाई के अनुसार किस्म चुनने पर जोर है। सीमित सिंचाई में डब्ल्यूएच-1402 को उपयोगी बताया गया है। डब्ल्यूएच-1142 भी सुझाई गई किस्मों में शामिल है।
डीबीडब्ल्यू-296 को भी किसानों के लिए विकल्प बताया गया है। बदलते तापमान के बीच ऐसी किस्में मददगार हो सकती हैं। मौसम की अनिश्चितता भी किस्म चयन को महत्वपूर्ण बनाती है।
WH-1402 में दो सिंचाई
डब्ल्यूएच-1402 में दो सिंचाई की योजना अपनाई जा सकती है। पहली सिंचाई बुवाई के करीब 25 दिन बाद की जा सकती है। दूसरी सिंचाई 70 से 80 दिन के बीच सुझाई गई है। यह किस्म करीब 147 दिन में तैयार होती है। इसकी औसत उपज 12 क्विंटल प्रति बीघा बताई गई है। अनुकूल परिस्थितियों में यह 17 क्विंटल प्रति बीघा तक हो सकती है।
DBW-296 में 2-3 सिंचाई
डीबीडब्ल्यू-296 को करण ऐश्वर्या नाम से भी जाना जाता है। इसे सीमित पानी वाले किसानों के लिए विकल्प बताया गया है। इस किस्म में दो से तीन सिंचाई की जरूरत बताई गई है। इसकी औसत उपज करीब 14 क्विंटल प्रति बीघा बताई गई है। अनुकूल परिस्थितियों में उत्पादन 20 क्विंटल प्रति बीघा तक बताया गया है। विभाग ने इसे सूखा सहने में सक्षम किस्म बताया है।
यह अधिक तापमान की स्थिति भी सहन कर सकती है। इसके आटे से रोटी और बिस्किट बनाए जा सकते हैं। इससे ब्रेड और नान भी तैयार किए जा सकते हैं। डब्ल्यूएच-1402 और डीबीडब्ल्यू-296 में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बताई गई है। इनमें पीला, काला और भूरा रतुआ शामिल हैं। करनाल बंट के प्रति भी प्रतिरोधक क्षमता बताई गई है। किसानों के लिए मुख्य बात उपलब्ध पानी का सही आकलन करना है। उसी आधार पर फसल और किस्म का चयन किया जाना चाहिए।
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