राजस्थान के अलवर जिले में किसान चंदन की खेती की ओर बढ़ रहे हैं। वे पारंपरिक फसलों के साथ यह प्रयोग कर रहे हैं। चंदन दक्षिण भारत में ज्यादा होता है। अब इसके पौधे अलवर की मिट्टी में भी बढ़ रहे हैं। इस बदलाव की चर्चा अब आसपास के गांवों तक पहुंच चुकी है।
इसी बदलाव का एक चेहरा हैं रामकृष्ण मीणा। वे अलवर की लक्ष्मणगढ़ तहसील के मलावाली गांव के किसान हैं। सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद उन्होंने कुछ अलग करने का फैसला किया। रामकृष्ण की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने सोच-समझकर कदम बढ़ाया। उन्होंने पहले जानकारी जुटाई। फिर मिट्टी की जांच कराई। इसके बाद ही पौधे लगाए।
रिटायरमेंट के बाद नई राह
रामकृष्ण ने बताया कि वे साल 2023 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे। लेकिन चंदन की खेती की तैयारी उन्होंने पहले ही शुरू कर दी थी। उनका कहना है कि मकसद पारंपरिक खेती से अलग विकल्प तलाशना था।
आज उनके खेत में चंदन के करीब 300 पौधे लगे हैं। उनके मुताबिक ये पौधे अब बड़े हो रहे हैं। उनकी ग्रोथ भी अच्छी हो रही है।
खेत की मिट्टी की पहले जांच
चंदन लगाने से पहले रामकृष्ण ने सीधे पौधे नहीं मंगाए। उन्होंने पहले अपने खेत की मिट्टी की जांच कराई। मकसद यह जानना था कि वहां चंदन उग सकता है या नहीं।
उन्होंने बताया कि मिट्टी सबसे पहले जांच के लिए दिल्ली भेजी गई। वहां से रिपोर्ट आने के बाद वही मिट्टी बेंगलुरु भेजी गई। वहां उस मिट्टी में चंदन के पौधे तैयार किए गए। यह पूरी प्रक्रिया कई चरणों में पूरी हुई।
जब पौधे करीब 4 से 5 फीट ऊंचे हुए, तब उन्हें लाया गया। उस समय पौधे अच्छी तरह विकसित होने लगे थे। इसके बाद उन्हें रामकृष्ण के खेत में लगाया गया।
यूट्यूब से सीखी चंदन की खेती
रामकृष्ण ने बताया कि उन्होंने इंटरनेट और सोशल मीडिया का सहारा लिया। उन्होंने यूट्यूब पर चंदन की खेती से जुड़े कई वीडियो देखे। गूगल पर भी जानकारी खंगाली।
इससे उन्हें पौधे लगाने का तरीका समझ आया। पौधों की देखभाल और खेती की तकनीक भी उन्होंने इसी तरह सीखी। इसके बाद ही उन्होंने खेती शुरू की। जानकारी जुटाने में उन्होंने जल्दबाजी नहीं की। कई वीडियो देखे और फिर तकनीक को समझा। उनके मुताबिक सोशल मीडिया से खेती की नई जानकारी भी मिल सकती है। यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है।
पौधे दक्षिण भारत से मंगवाए
रामकृष्ण के पौधे दक्षिण भारत से मंगवाए गए थे। पौधे लगाने से पहले उन्होंने देखभाल और खेती की पूरी जानकारी जुटाई। फिर खेत में पौधे लगाए और नियमित रूप से उनकी देखभाल की।
खेत में बढ़ते पौधे देखकर दूसरे किसान भी दिलचस्पी ले रहे हैं। वे इसके बारे में जानकारी लेने उनके पास पहुंच रहे हैं।
अलवर में 10 हजार पौधे
रामकृष्ण के मुताबिक उन्होंने आसपास के कई किसानों को भी जानकारी दी। उनके सहयोग से अलवर और आसपास 10 हजार से ज्यादा चंदन पौधे लगे हैं। अलवर के राजगढ़, लक्ष्मणगढ़ और मालाखेड़ा क्षेत्र में कई किसान चंदन लगा रहे हैं। बढ़ती दिलचस्पी की वजह से दूसरे गांवों के लोग भी पहुंच रहे हैं। दूर-दराज से आने वाले लोग भी खेती के बारे में पूछताछ करते हैं।
यानी एक किसान की पहल अब पूरे इलाके में चर्चा में है। यही इस कहानी की सबसे खास बात है। रामकृष्ण खुद आसपास के किसानों को जानकारी देते हैं। इसी वजह से चंदन की खेती का दायरा बढ़ रहा है।
किसान क्या सावधानी रखें
चंदन की खेती का बढ़ता चलन खेती में विविधता का एक उदाहरण है। लेकिन कोई भी किसान सिर्फ देखादेखी इसे शुरू न करे। शुरू करने से पहले कुछ बातें जरूर जान लेनी चाहिए।
रिपोर्ट के मुताबिक किसानों को स्थानीय मिट्टी और जलवायु की जानकारी लेनी चाहिए। पौधों की जरूरत भी समझनी चाहिए। साथ ही सरकारी नियमों की जानकारी भी जरूर लेनी चाहिए। रामकृष्ण ने भी खेती से पहले मिट्टी की जांच कराई थी। यही कदम उनकी कहानी को समझदारी भरा बनाता है।
आम किसानों के लिए सीख
रामकृष्ण की कहानी बताती है कि नई खेती में इंटरनेट काम आ सकता है। पर रिपोर्ट के मुताबिक मिट्टी, जलवायु और नियम समझना भी जरूरी है। इसके बाद ही किसान को कदम बढ़ाना चाहिए।
आगे क्या देखना होगा
चंदन के पौधे अभी बढ़ रहे हैं। रामकृष्ण के मुताबिक उनकी ग्रोथ अच्छी है। रिपोर्ट में कमाई या उपज का कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है। इसलिए अभी इसे मुनाफे की गारंटी की तरह नहीं देखना चाहिए। फिलहाल यह एक नई कोशिश है। अलवर के किसान इस पर नजर बनाए हुए हैं।
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