नागौर जिले में फसल बीमा योजना को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। पुलिस के मुताबिक जिले के थानों में अब तक 37 प्रकरण दर्ज हुए हैं। इनमें अब तक 11 गिरफ्तारियां भी हुई हैं। मामले की जांच के लिए एसआईटी (Special Investigation Team) बनाई गई है। पुलिस के अनुसार यह मामला प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से जुड़ा है। आरोप है कि फर्जी बटाईदार दस्तावेज बनाकर बीमा क्लेम लिए गए। दोष सिद्ध होना अभी बाकी है।
पांचौड़ी थाने से शुरुआत
पुलिस के मुताबिक यह मामला सबसे पहले पांचौड़ी थाने में दर्ज हुआ। इसके बाद जांच आगे बढ़ी। धीरे-धीरे जिले के अलग-अलग थानों से मिलते-जुलते मामलों की शिकायतें आने लगीं।
पुलिस के अनुसार अब तक 37 से ज्यादा प्रकरण दर्ज हो चुके हैं। जांच एजेंसी अब पूरी कड़ी जोड़ने में जुटी है। फर्जी दस्तावेज से लेकर क्लेम की रकम तक कौन शामिल था, यह देखा जा रहा है।

अब तक 11 गिरफ्तार
जांच अधिकारी सुरेश कुमार कस्वा के मुताबिक अब तक 11 आरोपी गिरफ्तार हुए हैं। इनमें सात आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं। चार आरोपियों की गिरफ्तारी हाल में हुई है।
पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार लोगों में बीमा कंपनी के कर्मचारी भी शामिल हैं। कथित दलाल भी इसमें नामजद हैं। पुलिस के मुताबिक यह गिरोह साल 2026 में हुए फसल बीमा से जुड़ा है।
पुलिस के अनुसार इस गिरोह में सीएससी आईडी (Common Service Centre) धारक भी बताए गए हैं। ई-मित्र संचालक भी इसमें शामिल बताए गए हैं। अन्य कथित बिचौलियों की भूमिका की भी जांच हो रही है।
एक स्टांप पेपर, कई किसान
एसआईटी अधिकारी के मुताबिक जांच में एक खास तरीका सामने आया है। आरोप है कि एक किसान की जमीन के दस्तावेज से किसी और को बटाईदार दिखाया गया। इसी बटाईदार के नाम पर फसल बीमा करा दिया गया।
पुलिस के अनुसार एक स्टांप पेपर कई किसानों से जोड़ने का आरोप भी है। इसी आधार पर कथित तौर पर कई बीमा क्लेम लिए गए। पुलिस के मुताबिक इससे करोड़ों रुपए के संदिग्ध क्लेम का मामला बन सकता है।
एसआईटी अधिकारी के मुताबिक शुरुआती जांच में एक पैटर्न मिला है। किसानों की ऑनलाइन जमाबंदी निकालकर कथित तौर पर फर्जी बटाईदार दस्तावेज बनाए गए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर बीमा पॉलिसी बनवाई गई।
बीमा कर्मचारी भी गिरफ्त में
मामले में बीमा कंपनी के कर्मचारियों की गिरफ्तारी भी हुई है। इससे जांच का दायरा सिर्फ कथित दलालों तक सीमित नहीं रहा। अब बीमा प्रक्रिया के हर स्तर पर भूमिका की भी जांच हो रही है।
स्थानीय स्तर पर कुछ लोग एक आरोप और लगा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकारी कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जाए। इसमें राजस्व विभाग और कृषि विभाग के कर्मचारी शामिल हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
दो अधिकारी भी नामजद
रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में जिला कलेक्टर के राजकीय अधिवक्ता के खिलाफ भी नामजद प्रकरण दर्ज हुआ है। उनकी बहन के खिलाफ भी मामला दर्ज होने की बात कही गई है। बताया गया है कि वे राजकीय शिक्षिका हैं।
फिलहाल यह सिर्फ आरोप है। जांच एजेंसी के सामने चुनौती है। उसे दस्तावेजी सबूतों से हर आरोपी की असली भूमिका तय करनी है। दोष सिद्ध होना अभी बाकी है।
पूर्व विधायक बेनीवाल का दावा
फसल बीमा के इस मामले पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हुई है। खींवसर के पूर्व विधायक नारायण बेनीवाल का दावा है। उनके मुताबिक उनकी पार्टी करीब छह साल से यह मुद्दा उठाती रही है। यह उनका अपना दावा है।
बेनीवाल के मुताबिक जांच का केंद्र कथित दस्तावेजी फर्जीवाड़ा और बिचौलिया नेटवर्क होना चाहिए। उनके अनुसार बीमा कंपनियों के कर्मचारियों की भूमिका भी जांच में आनी चाहिए। राजस्व और कृषि विभाग की भूमिका भी देखी जानी चाहिए। उन्होंने एक अहम बात भी कही। उनके मुताबिक किसी की किसी नेता के साथ फोटो या बातचीत अपराध नहीं है। उनका कहना है कि जांच दस्तावेजी सबूतों के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए।
सांसद के पत्र का जिक्र
नारायण बेनीवाल ने यह भी दावा किया कि नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने केंद्रीय कृषि मंत्री को दो बार पत्र लिखा था। उनके मुताबिक सांसद ने पोर्टल खोलने की मांग उठाई थी। नारायण बेनीवाल के अनुसार पोर्टल खुलकर दोबारा बंद होने से किसानों को परेशानी हुई। उनका कहना है कि इससे किसानों को जानकारी जुटाने में दिक्कत आई।
ऊपर तक जांच की मांग
पूर्व विधायक बेनीवाल ने मांग की कि जांच सिर्फ छोटे आरोपियों तक सीमित न रहे। उनका कहना है कि सबूत मिलें तो जांच ऊपर तक पहुंचाई जाए। उन्होंने कुछ सुझाव भी दिए। उनके मुताबिक गिरदावरी, जमाबंदी और बैंक खाते को ठीक से जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही क्लेम पाने वाले किसानों की सूची सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई। उनका कहना है कि इससे किसानों को अपने गांव के क्लेम की जानकारी मिलेगी।
अभी क्या साफ नहीं है
पूरे मामले में अब भी कई सवाल बाकी हैं। फर्जी दस्तावेज किसने बनाए, यह अभी साफ नहीं है। बटाईदार के दस्तावेज किस स्तर पर सत्यापित हुए, इसकी भी जांच चल रही है।
बीमा पॉलिसी किस प्रक्रिया से जारी हुई, यह भी देखा जा रहा है। क्लेम की रकम आखिर किन खातों तक पहुंची, इसका पता लगाना भी बाकी है। एसआईटी इन्हीं कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। पुलिस के मुताबिक ताजा आरोपियों की भूमिका अलग बताई जा रही है। पहले पकड़े गए गिरोह से यह अलग है। यानी यह मामला एक से ज्यादा नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है।
किसानों के लिए सीख
37 प्रकरण और 11 गिरफ्तारियों के बाद यह मामला सिर्फ कुछ फर्जी पॉलिसियों तक सीमित नहीं दिखता। असली चुनौती पूरे नेटवर्क की पहचान करना है। हर आरोपी की भूमिका दस्तावेजी सबूतों से साबित करनी होगी।
जिन किसानों के नाम या जमीन का गलत इस्तेमाल हुआ हो, वे रिकॉर्ड जांचें। यह जांच कृषि विभाग या बीमा कंपनी से कराई जा सकती है। जमाबंदी और बटाईदार के दस्तावेज खुद भी जांच लेना बेहतर रहेगा।
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