सोचिए, किसान की पहचान, जमीन और फसल की जानकारी एक जगह जुड़ी हो। तब उसे हर काम के लिए कागज लेकर दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। फार्मर आईडी को इसी दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है। अब तक 10.31 करोड़ से ज्यादा आईडी बनीं। वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचार विशेषज्ञ डॉ. निमिष कपूर बता रहे हैं फार्मर आईडी कैसे बनाई जाती है और इसके क्या फायदे हैं।
क्या है फार्मर आईडी
फार्मर आईडी को किसान की अलग डिजिटल पहचान बनाया जा रहा है। यह किसान की पहचान को उसकी कृषि जानकारी से जोड़ती है। इसमें जमीन का रिकॉर्ड और बोई गई फसल जैसी जानकारी शामिल हो सकती है।
डॉ. कपूर के मुताबिक इसे सिर्फ नया कार्ड या नंबर समझना सही नहीं होगा। आगे यह खेती की असली स्थिति समझने का आधार बन सकती है। इसके तहत पशुधन की जानकारी भी जोड़ी जा सकती है। परिवार से जुड़ा ब्योरा और योजनाओं के लाभ भी जुड़ सकते हैं। इन्हें गतिशील रूप से जोड़ने की बात कही गई है।
एग्रीस्टैक में तीन रजिस्ट्री
फार्मर आईडी के पीछे एग्रीस्टैक है। इसे खेती के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे के रूप में बनाया जा रहा है। इसका मकसद बिखरी हुई डिजिटल जानकारी को आपस में जोड़ना है। इसमें तीन बुनियादी रजिस्ट्री हैं। पहली किसान रजिस्ट्री है। इसमें किसान की पहचान और जरूरी ब्योरे उसकी कृषि भूमि से जोड़े जाते हैं। फार्मर आईडी इसी के तहत बन रही है।
दूसरी रजिस्ट्री भू-संदर्भित ग्राम मानचित्र की है। यह जमीन के डिजिटल रिकॉर्ड को असली भौगोलिक जगह से जोड़ती है। इससे पता चलता है कि रिकॉर्ड वाला खेत असल में कहां है।
तीसरी रजिस्ट्री फसल बुआई की है। यह बताती है कि किस मौसम में किस खेत में कौन सी फसल बोई। इसका अहम जरिया डिजिटल क्रॉप सर्वे है। इसमें मोबाइल से फसल का ब्योरा दर्ज किया जाता है।
रबी 2025-26 में 648 जिलों में डिजिटल क्रॉप सर्वे हुआ। इसमें 31.3 करोड़ से ज्यादा खेत-भूखंडों की फसल जानकारी दर्ज की गई।
बिखरे रिकॉर्ड को जोड़ने की कवायद
डॉ. कपूर के मुताबिक किसान से जुड़ी जानकारी पहले से अलग-अलग सरकारी व्यवस्थाओं में है। लेकिन ये रिकॉर्ड हमेशा आपस में जुड़े नहीं होते। जमीन किसके नाम है, यह भूमि रिकॉर्ड बता सकता है। हालांकि इस मौसम में वहां कौन सी फसल बोई गई, यह अलग जानकारी है। ऋण, बीमा और सरकारी खरीद के लिए भी अलग दस्तावेज देने पड़ सकते हैं। एग्रीस्टैक इसी बिखराव को जोड़ने की कोशिश है।
डिजिटल कृषि मिशन से रफ्तार
केंद्र सरकार ने दो सितंबर 2024 को डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन को मंजूरी दी। इसके लिए 2,817 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इसमें केंद्र की हिस्सेदारी 1,940 करोड़ रुपए है।
मिशन के हिस्सों में एग्रीस्टैक और डिजिटल फसल सर्वेक्षण शामिल हैं। मृदा उर्वरता और प्रोफाइल मैपिंग भी इसका हिस्सा है। इसमें कृषि निर्णय सहायता प्रणाली केडीएसएस (Krishi Decision Support System) भी है।
राज्यों की बड़ी भूमिका
एग्रीस्टैक की तीनों रजिस्ट्री राज्य और केंद्रशासित प्रदेश बनाते और संभालते हैं। इसलिए इसे संघीय डिजिटल व्यवस्था कहा गया है। यानी हर राज्य अपने डेटा और सिस्टम पर नियंत्रण रखता है। फिर भी सब एक साझा ढांचे से जुड़े रहते हैं।
फार्मर आईडी बनाने में राज्य के कृषि और राजस्व विभाग अहम हैं। वे भूमि रिकॉर्ड की जांच भी करते हैं। इसी वजह से राज्यों में पंजीकरण, पोर्टल और सत्यापन कुछ अलग हो सकता है।
योजनाओं और ऋण में मदद
डॉ. कपूर के मुताबिक पहचान, जमीन और फसल की जानकारी एक जगह होगी। तब बार-बार दस्तावेज देने की जरूरत घट सकती है। हालांकि असली फायदा राज्य और योजना के नियमों पर निर्भर करेगा।
पीएम-किसान (Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi) में पात्रता जांच आसान हो सकती है। डीबीटी (Direct Benefit Transfer) में भी ऐसा हो सकता है। फसल बीमा के दावों के निपटारे में भी रिकॉर्ड मदद कर सकता है।
सत्यापित जमीन की जानकारी से किसान क्रेडिट कार्ड की प्रक्रिया सरल हो सकती है। कृषि ऋण में भी ऐसा होने की संभावना है। एमएसपी (Minimum Support Price) पर खरीद पारदर्शी बनाने में भी मदद मिल सकती है। यह प्रक्रिया कागजरहित भी हो सकती है।
खेत के हिसाब से मिलेगी सलाह
लेख के मुताबिक फसल, क्षेत्र, मिट्टी और मौसम की जानकारी डिजिटल होगी। तब सलाह स्थानीय जरूरत के हिसाब से दी जा सकती है। असली फसल क्षेत्र पता होने से बीज-खाद की योजना बेहतर बन सकती है। भंडारण और परिवहन की योजना भी सुधर सकती है।
सूखा, बाढ़ या ओलावृष्टि से प्रभावित खेतों की पहचान भी व्यवस्थित हो सकती है। नुकसान का आकलन भी आसान हो सकता है। ये सभी बातें संभावनाओं के रूप में बताई गई हैं।
फार्मर आईडी कैसे बनाएं
किसान अपने राज्य की आधिकारिक फार्मर रजिस्ट्री व्यवस्था से खुद पंजीकरण कर सकते हैं। जरूरत हो तो सीएससी (Common Service Centre) से मदद ली जा सकती है। कृषि या राजस्व विभाग से भी मदद मिल सकती है। आधार और आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर जरूरी है। जमीन की जानकारी भी चाहिए। इसमें जिला, तहसील, गांव, खसरा या गाटा नंबर, रकबा और हिस्सेदारी शामिल है।
आमतौर पर आधार ओटीपी (One Time Password) से पहचान जांची जाती है। इसके बाद लॉगिन करके निजी और जमीन की जानकारी दर्ज होती है। फिर उसकी जांच करनी होती है। संयुक्त खाते में हिस्सेदारी की जानकारी खास सावधानी से जांचें। डिजिटल प्रमाणीकरण या ई-साइन पूरा करके आवेदन जमा किया जा सकता है। बाद में नामांकन स्थिति से आवेदन की हालत देखी जा सकती है। कुछ मामलों में स्थानीय सत्यापन भी जरूरी हो सकता है।
इन बातों का रखें ध्यान
आधार और जमीन की जानकारी सही भरें। ओटीपी और पासवर्ड किसी से साझा न करें। सिर्फ आधिकारिक सरकारी पोर्टल, ऐप या अधिकृत सहायता केंद्र का इस्तेमाल करें।
जमीन की खरीद-बिक्री, विरासत या बंटवारे के बाद रिकॉर्ड बदलता है। तब फार्मर रजिस्ट्री में भी जानकारी अपडेट कराएं। लेख के मुताबिक किसान की सहमति और डेटा सुरक्षा इस व्यवस्था में अहम हैं। परेशानी में किसान कॉल सेंटर के नंबर 1800-180-1551 पर बात करें। यह नंबर लेख में दिया गया है।
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