किसान की बात,सूत्र के साथ

एमपी में बिजली कटौती और खाद संकट पर भारतीय किसान संघ सख्त, दशहरे तक समस्याएं हल नहीं हुईं तो आंदोलन

newz@gmail.com | Oct 13, 2026, 20:08 IST

मध्यप्रदेश में बिजली कटौती, खाद-बीज की कमी और सिंचाई संकट पर भारतीय किसान संघ ने दशहरे तक का अल्टीमेटम दिया है। प्रदेशाध्यक्ष कमल सिंह आंजना ने कहा कि समाधान नहीं हुआ, तो बड़ा आंदोलन होगा।

मध्यप्रदेश में किसानों की समस्याओं को लेकर भारतीय किसान संघ ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है। संघ ने दशहरे तक समाधान करने का समय तय किया है। इसके बाद बड़े आंदोलन की चेतावनी दी गई है। संघ के प्रदेशाध्यक्ष कमल सिंह आंजना ने मंगलवार 13 अक्टूबर को भोपाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने बिजली कटौती, खाद-बीज की कमी और सूखे जैसे हालात का मुद्दा उठाया। उन्होंने फसलों की खरीदी व्यवस्था पर भी सवाल किए।

आंजना ने कहा कि संघ बातचीत के जरिए समस्याओं का समाधान चाहता है। उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री से चर्चा के लिए लगातार संपर्क किया गया। लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सरकार चर्चा के लिए बुला सकती है। संघ का कहना है कि किसानों की मांगों पर जल्द फैसला होना चाहिए। समाधान नहीं हुआ, तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।

बिजली कटौती से गांवों में परेशानी

संघ ने ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली कटौती को बड़ा मुद्दा बताया है। आंजना के मुताबिक, गांवों में अघोषित बिजली कटौती हो रही है। इससे घरेलू कामकाज और खेती, दोनों प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई जगह रात 10:30 बजे बिजली काट दी जाती है। यह ऐसा समय है, जब परिवार सोने की तैयारी करते हैं। इससे बुजुर्गों और ग्रामीण परिवारों को परेशानी होती है।

आंजना ने बताया कि मेंटेनेंस के नाम पर भी बिजली दो से चार घंटे बंद रहती है। इससे लोगों को पहले से बिजली बंद रहने की जानकारी नहीं मिल पाती। किसानों के लिए यह समस्या सिंचाई के समय और गंभीर हो जाती है। उन्होंने कहा कि बिजली कटौती का मुद्दा कैबिनेट में भी उठाया जा चुका है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति सुधरने की जरूरत है। संघ ने घरेलू और कृषि, दोनों तरह की बिजली आपूर्ति नियमित करने की मांग की है।

घोषित MSP पर खरीदी की मांग

संघ ने फसलों की खरीदी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर भी सवाल उठाए। आंजना ने कहा कि जिन फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित है, उनकी खरीदी उसी दर पर होनी चाहिए। उन्होंने पूछा कि जब सरकार समर्थन मूल्य घोषित करती है, तो भावांतर योजना की जरूरत क्यों पड़ती है। उनके अनुसार, भावांतर की व्यवस्था उन फसलों के लिए होनी चाहिए। जिनका समर्थन मूल्य घोषित नहीं है।

आंजना ने सोयाबीन और धान की खरीदी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार भावांतर देने की बात कर रही है। लेकिन किसानों को इसका लाभ कैसे मिलेगा, यह स्पष्ट होना चाहिए। धान के लिए यह व्यवस्था कैसे लागू होगी, इस पर भी सवाल हैं। संघ ने मंडियों की कार्यप्रणाली पर भी चिंता जताई। आंजना के मुताबिक, कई जिलों और तहसीलों में मंडियां ठीक से संचालित नहीं हो रही हैं। कुछ जगह मंडियां बनी हैं, लेकिन वहां नीलामी नहीं होती।

उनका कहना है कि शहरों में ही नीलामी होने से किसानों को परेशानी होती है। ऐसे में किसानों को उपज बेचने के लिए दूर जाना पड़ सकता है। संघ ने खरीदी व्यवस्था सुधारने और किसानों को उचित दाम दिलाने की मांग की है।

20 से 22 जिलों में सूखे जैसे हालात

आंजना ने दावा किया कि मध्यप्रदेश के 20 से 22 जिलों में सूखे जैसी स्थिति है। उनके मुताबिक, कई क्षेत्रों में नदी-नालों में पानी कम हो गया है। इससे खेती और आने वाले दिनों में पेयजल की चिंता बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि कुछ किसानों के पास फसलों की सिंचाई के लिए केवल 10 से 15 दिन का पानी बचा है। ऐसे क्षेत्रों में समय पर बिजली और पानी मिलना बेहद जरूरी है। दोनों सुविधाओं की कमी से फसल को नुकसान होने की आशंका है।

आंजना ने सवाल किया कि सिंचाई के लिए बिजली और पानी नहीं मिलेगा, तो किसान फसल कैसे उगाएगा। उन्होंने सरकार से प्रभावित क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था सुधारने की मांग की। साथ ही नर्मदा का पानी नहरों और नदियों के जरिए खेतों तक पहुंचाने की बात कही। संघ ने कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को बढ़ावा देने की मांग भी की। इसके लिए किसानों को उपयुक्त बीज उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया। हालांकि, कौन-सी फसल सही रहेगी, यह स्थानीय मिट्टी और पानी की स्थिति पर निर्भर करेगा।

टोकन के बाद भी खाद की परेशानी

किसान संघ ने खाद वितरण व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। आंजना ने कहा कि टोकन व्यवस्था के बावजूद किसानों को खाद नहीं मिल पा रही है। इससे खेती के जरूरी काम प्रभावित हो सकते हैं। उनके मुताबिक, अधिकारी और कर्मचारी व्यवस्था सुधारने में लगे हैं। फिर भी किसानों को खाद के लिए परेशान होना पड़ रहा है। किसान फोन और धरना-प्रदर्शन के जरिए अपनी शिकायतें सामने रख रहे हैं।

खेती के अहम समय पर खाद की कमी से फसल की बढ़त प्रभावित हो सकती है। इससे किसानों की लागत और संभावित नुकसान की चिंता बढ़ती है। संघ ने सरकार से खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की है। आंजना ने कहा कि केवल टोकन जारी करने से समस्या हल नहीं होगी। खाद की समय पर उपलब्धता और वितरण जरूरी है। किसानों को बिना अनावश्यक परेशानी के खाद मिलनी चाहिए।

कम पानी वाली फसलों के बीज दें

संघ ने प्रभावित क्षेत्रों में बीज की कमी का मुद्दा भी उठाया। आंजना के मुताबिक, सूखे जैसे हालात वाले जिलों में कम पानी में तैयार होने वाली फसलों के बीज उपलब्ध नहीं हैं। इससे किसानों के सामने फसल चुनने के विकल्प सीमित हो सकते हैं।

उन्होंने सरकार और कृषि विभाग से तत्काल कदम उठाने की मांग की। उनके अनुसार, जरूरत के मुताबिक बीज प्रभावित जिलों तक पहुंचाए जाने चाहिए। कृषि विभाग को किसानों की जरूरत के अनुसार काम करना चाहिए।

कम पानी में तैयार होने वाली फसलें कुछ क्षेत्रों में उपयोगी विकल्प बन सकती हैं। लेकिन इनके चयन में स्थानीय कृषि परिस्थितियों का ध्यान रखना जरूरी है। समय पर बीज नहीं मिलने से बोवनी प्रभावित हो सकती है। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

जमीन अधिग्रहण में मुआवजे की मांग

प्रेस कॉन्फ्रेंस में जमीन अधिग्रहण और विकास परियोजनाओं का मुद्दा भी उठा। आंजना से पूछा गया कि किसान संगठनों की मांगों पर सरकार ध्यान क्यों नहीं दे रही। जवाब में उन्होंने बढ़ती विकास जरूरतों और जमीन की उपलब्धता पर बात की।

उन्होंने उज्जैन में लैंड पूलिंग का उदाहरण दिया। आंजना के मुताबिक, पहले वहां करीब एक लाख श्रद्धालु आते थे। अब यह संख्या बढ़कर 18 लाख तक पहुंचने का दावा किया गया। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों पर बढ़ती भीड़ से सुविधाओं की जरूरत भी बढ़ रही है।

उनके अनुसार, सड़कों को चौड़ा करने और बड़े मार्ग बनाने के लिए जमीन चाहिए। रेलवे परियोजनाओं के लिए भी जमीन की जरूरत पड़ती है। ऐसी परियोजनाओं के चलते कुछ जगह जमीन अधिग्रहण और तोड़फोड़ की स्थिति बनती है।

आंजना ने कहा कि विकास कार्यों में किसानों के हितों का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि पहले जमीन अधिग्रहण पर दो गुना मुआवजा मिलता था। अब किसान संघ की मांग के अनुसार चार गुना मुआवजे की व्यवस्था होने की बात कही। उन्होंने इसे अच्छा कदम बताया।

उपजाऊ जमीन पर उद्योग न लगें

आंजना ने उद्योगों के लिए जमीन चुनने पर भी सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि उपजाऊ जमीन पर कारखाने लगाने से खेती प्रभावित हो सकती है। इसलिए उद्योगों के लिए पथरीली और कम उपजाऊ जमीन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उनके अनुसार, इससे औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध हो सकती है। साथ ही खेती योग्य भूमि को बचाने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं में किसानों की आजीविका को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

जमीन अधिग्रहण का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहता। इससे किसान परिवारों की आमदनी और खेती की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए मुआवजे और वैकल्पिक व्यवस्था पर स्पष्ट जानकारी जरूरी है।

फसल घटने से महंगाई का खतरा

किसान संघ ने चेतावनी दी कि फसल उत्पादन घटने का असर बाजार पर भी पड़ सकता है। आंजना के मुताबिक, सब्जियों और दूसरी कृषि उपज की उपलब्धता कम हुई, तो महंगाई बढ़ सकती है।

कम उत्पादन का असर किसानों की कमाई पर भी पड़ सकता है। वहीं, बाजार में आपूर्ति कम होने पर आम उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, महंगाई का वास्तविक असर उत्पादन, मांग और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

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