किसान की बात,सूत्र के साथ

जलवायु सहने वाली धान की सात नई किस्में, पांच से सात टन उपज क्षमता, ICAR का दावा- कम नमी में भी टिकेंगी

newz@gmail.com | Oct 20, 2026, 15:41 IST

आईसीएआर के नागालैंड केंद्र ने धान की सात नई किस्में तैयार की हैं। ये 115 से 120 दिन में पकती हैं और इनकी उपज क्षमता 5 से 7 टन प्रति हेक्टेयर है।

धान की किस्में

नागालैंड के किसानों के लिए धान की सात नई किस्में तैयार की गई हैं। ये किस्में जलवायु बदलाव को सहने में सक्षम बताई गई हैं। इन्हें आईसीएआर (Indian Council of Agricultural Research) के नागालैंड केंद्र ने विकसित किया है। ये किस्में करीब 115 से 120 दिन में पक जाती हैं। इनकी उपज क्षमता 5 से 7 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। इन्हें राज्य की कृषि जलवायु के हिसाब से बनाया गया है।

कहां और किसने तैयार कीं किस्में

आईसीएआर के पूर्वोत्तर क्षेत्र अनुसंधान परिसर के नागालैंड केंद्र ने इन्हें विकसित किया। केंद्र ने सातों किस्मों का प्रदर्शन भी किया। इसका मकसद नागालैंड में धान की खेती को ज्यादा उपजाऊ बनाना है। साथ ही उसे जलवायु के अनुकूल भी बनाना है। इन किस्मों को नागालैंड की जलवायु परिस्थितियों के लिए तैयार किया गया है। दूसरे राज्यों के लिए इनकी सिफारिश की बात खबर में नहीं है।

नई किस्मों की खास बातें

इन किस्मों की पहली खूबी जल्दी पकना है। ये 115 से 120 दिन में तैयार हो जाती हैं। दूसरी खूबी रोगों को सहने की क्षमता है। तीसरी खूबी प्रतिकूल मौसम में फसल को बेहतर संभालना है। उपज क्षमता 5 से 7 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। यह क्षमता का आंकड़ा है। खेत की असली उपज इससे अलग भी हो सकती है।

ब्लास्ट रोग और नमी की कमी

ये किस्में ब्लास्ट रोग को सहने वाली बताई गई हैं। खबर के मुताबिक यह रोग नागालैंड की धान खेती की एक चुनौती है। नई किस्में इस मामले में राहत दे सकती हैं।

ये किस्में मध्यम स्तर की नमी की कमी भी झेल सकती हैं। यानी पानी थोड़ा कम होने पर भी फसल टिक सकती है। जलवायु बदलाव के दौर में यह खूबी अहम मानी जा रही है।

किन समस्याओं का हल

नागालैंड में धान की खेती में कई चुनौतियां हैं। इनमें फसल का लंबा समय शामिल है। नमी की कमी भी एक बड़ी समस्या है। साथ ही रोग और कीट भी परेशान करते हैं। नई किस्में इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। इसी वजह से इनकी जल्दी पकने और रोग सहने की खूबी पर जोर है।

नौ साल से ज्यादा की मेहनत

इन किस्मों को तैयार करने में नौ साल से ज्यादा का शोध लगा। वैज्ञानिकों ने करीब 990 प्रजनन लाइनों को परखा। इनमें से अच्छी उपज और जल्दी पकने वाली किस्में चुनी गईं। यह लंबी वैज्ञानिक प्रक्रिया रही है। अब असली चुनौती इन्हें किसानों तक पहुंचाना है।

किसान दिवस पर 56 लोग जुड़े

आईसीएआर के नागालैंड केंद्र में किसान दिवस हुआ था। इसमें 56 लोग शामिल हुए। इनमें सोविमा, हैवनली, चुमौकेदिमा, धनसिरीपार और सिंगारीजान इलाकों के किसान थे।

कार्यक्रम में कृषि विभाग के अधिकारी भी मौजूद रहे। आईसीएआर के वैज्ञानिक और कर्मचारी भी शामिल हुए। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के अधिकारी भी पहुंचे। कुछ किसानों ने पहले ही इनमें से कुछ किस्में उगाई थीं। उन्होंने अपना अनुभव दूसरे किसानों के साथ साझा किया।

अधिकारियों ने क्या कहा

नागालैंड कृषि विभाग के संयुक्त सचिव लिमानेनला ने किसानों से अपील की। उन्होंने किस्में अपनाने को कहा। उन्होंने कहा कि किसान इनकी जानकारी दूसरों तक भी पहुंचाएं।

आईसीएआर क्षेत्रीय केंद्र के प्रमुख डॉ. एच. कलिता ने शोध के नतीजे किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की भी बात कही।

चुमौकेदिमा के जिला कृषि अधिकारी मोइनला पोंगेन ने इन किस्मों की तारीफ की। कृषि उप निदेशक डेविड अवोमी ने इन्हें उपयोगी बताया। उनके मुताबिक ये उत्पादन, आय और आजीविका के लिए अहम हैं। उन्होंने इन्हें अच्छी उपज और तनाव सहने वाली किस्में बताया।

कृषि सलाहकार एम. हथुंग यंथन ने वैज्ञानिकों की मेहनत की सराहना की। उन्होंने विभागों के बीच तालमेल की भी जरूरत बताई। उनका कहना था कि इससे किस्में किसानों तक पहुंच सकेंगी।

किस्मों को मिली मंजूरी

सातों किस्मों की रिलीज को मंजूरी मिल चुकी है। यह मंजूरी 21 अप्रैल 2026 को मिली थी। राज्य बीज उप समिति की बैठक मेडजिफेमा में आईसीएआर नागालैंड केंद्र में हुई थी। मंजूरी लिमानेनला और यंथन ने दी।

किसानों के लिए क्या मायने

जल्दी पकने वाली और रोग सहने वाली किस्में किसानों का जोखिम घटा सकती हैं। कम नमी में टिकने की क्षमता भी फायदेमंद हो सकती है। अगर खेत में 5 से 7 टन उपज मिली, तो आय बढ़ सकती है।

हालांकि असली नतीजे खेतों में ही दिखेंगे। बीज की उपलब्धता और किसानों तक पहुंच इस पर असर डालेगी। आने वाले मौसमों में इनका प्रदर्शन तय करेगा कि कोशिश कितनी कामयाब रही।

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