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पराली जलाने की घटनाएं रोकने के लिए सरकार का बड़ा एक्शन प्लान, MP और राजस्थान में बढ़े मामले

newz@gmail.com | Oct 13, 2026, 20:12 IST

धान कटाई के बीच केंद्र सरकार ने पराली जलाने की घटनाएं रोकने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश दिए हैं। शिवराज सिंह चौहान और भूपेंद्र यादव ने निगरानी, मशीनों की मरम्मत और पराली के उपयोग पर जोर दिया। मध्य प्रदेश और राजस्थान में घटनाएं बढ़ने पर चिंता जताई गई।

पराली

धान की कटाई के साथ पराली प्रबंधन की चुनौती बढ़ गई है। खेतों में बचा फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है। इससे मिट्टी की सेहत और खेती पर भी असर पड़ता है। इसी समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने समीक्षा बैठक की। मंगलवार 13 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के कृषि भवन में यह बैठक हुई। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव इसमें शामिल हुए। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री भी मौजूद रहे। दिल्ली-एनसीआर और संबंधित राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया।

बैठक में राज्यों को पराली जलाने की घटनाएं रोकने के निर्देश दिए गए। मंत्रियों ने कहा कि अब जमीनी स्तर पर तेजी से काम करना होगा। जिला प्रशासन को निगरानी और व्यावहारिक समाधान सुनिश्चित करने को कहा गया। धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के बीच समय कम रहता है। इसलिए किसानों को पराली हटाने के आसान विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है। सरकार ने मशीनों, आर्थिक मदद और वैकल्पिक उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया है।

MP और राजस्थान में बढ़े मामले

बैठक में पेश आंकड़ों ने मध्य प्रदेश और राजस्थान की चिंता बढ़ाई। 15 सितंबर से 12 अक्टूबर 2026 के बीच दोनों राज्यों में घटनाएं बढ़ीं। मध्य प्रदेश में पराली जलाने के मामले 55 से बढ़कर 277 हो गए। यह पिछले साल की तुलना में लगभग 452 प्रतिशत की वृद्धि है।

राजस्थान में मामले 20 से बढ़कर 60 दर्ज किए गए। यह लगभग 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। इन आंकड़ों पर शिवराज ने चिंता जताई। उन्होंने प्रभावित जिलों और गांवों की पहचान करने के निर्देश दिए। मंत्री ने दोनों राज्यों से विशेष कार्ययोजना लागू करने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि धान की कटाई अभी पूरी नहीं हुई है। इसलिए जिन राज्यों में घटनाएं घटी हैं, उन्हें भी सतर्क रहना होगा।

दूसरी ओर, हरियाणा में पिछले साल की तुलना में घटनाएं कम हुईं। 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच वहां 53.3 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई। उत्तर प्रदेश में भी लगभग 32 प्रतिशत की कमी आई। पंजाब में भी कुछ गिरावट दर्ज होने की जानकारी दी गई। इन आंकड़ों से पता चलता है कि राज्यों में स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में सुधार हुआ है, जबकि दूसरे राज्यों में चुनौती बढ़ी है। इसलिए स्थानीय हालात के अनुसार कार्रवाई करना जरूरी है।

पुरानी मशीनें भी हों चालू

पराली प्रबंधन के लिए कृषि मशीनों की उपलब्धता अहम है। केंद्र सरकार अब तक राज्यों को 3.54 लाख से अधिक मशीनें दे चुकी है। वित्त वर्ष 2026-27 में 26,109 नई मशीनें भी उपलब्ध कराई गई हैं। लेकिन केवल नई मशीनें बांटना पर्याप्त नहीं है। केंद्रीय सर्वेक्षण में पुरानी मशीनों की खराब स्थिति भी सामने आई। पंजाब में लगभग 40 प्रतिशत पुरानी मशीनें बंद या खराब मिलीं। हरियाणा में ऐसी मशीनों का आंकड़ा लगभग 48 प्रतिशत था।

इस स्थिति पर शिवराज ने चिंता जताई। उन्होंने पुरानी मशीनों की तत्काल मरम्मत कराने के निर्देश दिए। मशीनें खराब रहने से किसानों के सामने विकल्पों की कमी हो सकती है। इससे पराली हटाने में देरी होने का खतरा भी रहता है। सरकार ने कस्टम हायरिंग सेंटर (Custom Hiring Centre) सक्रिय करने पर जोर दिया। इन केंद्रों से किसान किराये पर कृषि मशीनें ले सकते हैं। इससे छोटे और सीमांत किसानों को मदद मिल सकती है। सरकार चाहती है कि किसानों को उचित दरों पर मशीनें मिलें।

किसानों के लिए मशीनों की समय पर उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। धान कटने के बाद अगली फसल की बुवाई जल्दी करनी होती है। इसलिए मशीनों की मरम्मत और बुकिंग पहले से करना उपयोगी रहेगा।

पराली से बन सकती है कमाई

केंद्र सरकार पराली को केवल कचरा नहीं मान रही है। इसे किसानों की अतिरिक्त आय का साधन बनाने पर जोर दिया गया है। शिवराज ने बैठक में इसी बात पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि केवल पराली नहीं जलाने की अपील पर्याप्त नहीं होगी। किसानों को आसान, सस्ते और व्यावहारिक विकल्प देने होंगे। पराली खेत में मिलाने से जैविक खाद बनाने में मदद मिल सकती है। इससे मिट्टी की सेहत सुधारने की संभावना रहती है।

खेत से बाहर निकाली गई पराली का उपयोग भी किया जा सकता है। इससे बायो-सीएनजी (Compressed Bio Gas) बनाई जा सकती है। इसके अलावा बायो-इथेनॉल और बिजली उत्पादन में भी इसका उपयोग संभव है। कुछ क्षेत्रों में पराली पशुओं के चारे के काम आ सकती है।

इस तरह पराली किसानों और उद्योगों के बीच नई कड़ी बन सकती है। लेकिन इसके लिए संग्रह, परिवहन और खरीद की व्यवस्था जरूरी है। किसान को यह पता होना चाहिए कि पराली कहां बेचनी है। साथ ही कीमत और भुगतान की शर्तें भी स्पष्ट होनी चाहिए।

सरकार ने पराली से कार्बन क्रेडिट मिलने की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। हालांकि, इसका लाभ लेने के लिए निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन जरूरी होगा। इसे किसानों की निश्चित कमाई नहीं माना जा सकता।

पराली प्रबंधन के लिए बजट

बैठक में फसल अवशेष प्रबंधन योजना के बजट की जानकारी भी दी गई। वर्ष 2018-19 से 2025-26 के दौरान केंद्र ने राज्यों को 4,266.47 करोड़ रुपए जारी किए। इसमें पंजाब को 2,056.50 करोड़ रुपए मिले। हरियाणा को 1,171.71 करोड़ रुपए दिए गए।

उत्तर प्रदेश को इस अवधि में 868.67 करोड़ रुपए जारी हुए। मध्य प्रदेश के लिए जारी राशि 59 करोड़ रुपए बताई गई। ये आंकड़े पराली प्रबंधन के लिए केंद्र की वित्तीय सहायता दिखाते हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 592.57 करोड़ रुपए का आवंटन तय किया गया। इसमें से 430.87 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं। बैठक में राशि के उपयोग की धीमी गति पर भी चिंता जताई गई।

शिवराज ने राज्यों से उपलब्ध धन का समय पर इस्तेमाल करने को कहा। पंजाब सरकार से पहले जारी राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र मांगा गया। इसे केंद्र को जल्द भेजने का आग्रह किया गया। इससे योजना की अगली किस्त जारी करने में मदद मिल सकती है।

सरकारी सहायता का लाभ तभी मिलेगा, जब उसका इस्तेमाल समय पर हो। मशीनों की खरीद, मरम्मत और किसानों तक पहुंच पर ध्यान देना होगा। प्रशासन को खर्च के साथ जमीनी नतीजों की भी समीक्षा करनी होगी।

पराली से चारा और ऊर्जा

केंद्र ने सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में पराली के उपयोग पर भी जोर दिया। ऐसे इलाकों में इसे सुरक्षित तरीके से इकट्ठा किया जा सकता है। इसके बाद पशुओं के चारे के रूप में उपयोग की संभावना देखी जा सकती है। हालांकि, चारे के लिए पराली की गुणवत्ता और सुरक्षा जांचना जरूरी है।

सरकार ने उद्योगों के साथ सीधी आपूर्ति व्यवस्था बनाने को भी कहा। ताप बिजली संयंत्रों में पराली से बने पेलेट इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसके लिए को-फायरिंग (Co-firing) तकनीक का उपयोग होता है। इसमें कोयले के साथ जैव ईंधन भी जलाया जाता है।

बायो-सीएनजी और दूसरी पीढ़ी के बायो-इथेनॉल संयंत्रों से भी आपूर्ति जोड़ी जा सकती है। इससे पराली की नियमित मांग बनने की संभावना है। लेकिन इसके लिए संग्रह केंद्र और परिवहन व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

सरकार ने राज्यों को स्वीकृत परियोजनाएं जल्दी शुरू करने के निर्देश दिए। ऐसी परियोजनाओं से किसानों को पराली बेचने का विकल्प मिल सकता है। इससे खेतों में अवशेष जलाने की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है।

कम अवधि वाली धान किस्में

पराली प्रबंधन के लिए फसल की किस्म भी महत्वपूर्ण है। धान की कुछ किस्में पकने में अधिक समय लेती हैं। इससे कटाई और अगली फसल की बुवाई के बीच समय कम बचता है।

बैठक में पूसा-44 जैसी लंबी अवधि वाली किस्मों का विकल्प अपनाने पर जोर दिया गया। कम अवधि वाली किस्मों में पूसा 2090 और पीआर 126 के नाम सामने आए। इन किस्मों से खेत जल्दी खाली करने में मदद मिल सकती है। हालांकि किसानों को किस्म चुनने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए। मिट्टी, पानी और क्षेत्र की जलवायु के अनुसार उपयुक्त किस्म चुनना जरूरी है। केवल जल्दी पकने के आधार पर फैसला करना सही नहीं होगा।

फसल की पैदावार, गुणवत्ता और बाजार की मांग भी ध्यान में रखनी चाहिए। सही किस्म चुनने से खेती की योजना बेहतर बन सकती है। इससे पराली प्रबंधन के लिए अतिरिक्त समय मिलने की संभावना रहती है।

निगरानी होगी और सख्त

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने राज्यों के बीच तालमेल पर जोर दिया। उन्होंने निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाने की जरूरत बताई। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस काम में जुड़े हैं।

बैठक में उपग्रह निगरानी की सीमाओं पर भी चर्चा हुई। अधिकारियों को दोपहर तीन बजे के बाद विशेष निगरानी रखने को कहा गया। इस समय उपग्रह से निगरानी में अंतराल आ सकता है। इसलिए जमीनी गश्त और फ्लाइंग स्क्वॉड की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इन टीमों को खेतों में पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखनी होगी। स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल से कार्रवाई तेज की जा सकती है। निगरानी के साथ किसानों को विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी रहेगा।

पराली जलाने की समस्या केवल कार्रवाई से पूरी तरह हल नहीं होगी। किसानों को समय पर मशीनें और सस्ती सेवाएं मिलनी चाहिए। पराली खरीदने वाले उद्योगों से संपर्क भी आसान होना चाहिए। जागरूकता और व्यावहारिक सहायता साथ चलेंगी, तभी बेहतर नतीजे मिल सकते हैं।

किसानों के लिए क्या मायने हैं?

इस बैठक का सीधा असर पराली प्रबंधन की सरकारी तैयारियों पर पड़ सकता है। राज्यों को अपने संवेदनशील जिलों में काम तेज करना होगा। किसानों के लिए मशीनों की उपलब्धता और किराये की दरें महत्वपूर्ण रहेंगी।

जिन किसानों के पास मशीनें नहीं हैं, वे कस्टम हायरिंग सेंटर से जानकारी ले सकते हैं। उन्हें पराली बेचने और उसके वैकल्पिक उपयोग की जानकारी भी जुटानी चाहिए। उपलब्ध योजनाओं का लाभ लेने के लिए स्थानीय कृषि विभाग से संपर्क करना उपयोगी रहेगा।

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