Har Chath Vrat 2026: भारतीय संस्कृति में संतान की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र के लिए कई व्रत रखे जाते हैं। इन्हीं में से एक बेहद खास और कठिन व्रत है हरछठ। इसे हलषष्ठी और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है।
यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्मोत्सव होता है।

बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल है। इसलिए इस दिन हल और कृषि यंत्रों का सम्मान किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, द्वापर युग में माता यशोदा और रोहिणी ने भी यह व्रत किया था।
मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में इस पर्व का बहुत बड़ा महत्व है। महिलाएं साल भर पहले से इस व्रत की तैयारी शुरू कर देती हैं। इस दिन महिलाएं किसी भी ऐसी चीज का सेवन नहीं करतीं जो हल से जोती गई जमीन पर उगी हो।
वे केवल वही चीजें खाती हैं जो अपने आप जंगलों में उगती हैं। इस साल 2026 में हरछठ का व्रत बेहद खास माना जा रहा है। इस बार पूरे 36 साल बाद ध्रुव योग और अमृत सिद्धि योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। आइए जानें इस व्रत की पूजा विधि और नियम।
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कब मनाया जाएगा Har Chath Vrat 2026
इस साल हरछठ व्रत का पर्व 2 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। यह त्योहार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को आता है। पंडितों के मुताबिक, इस बार का व्रत बहुत ही फलदायी होने वाला है। इस दिन महिलाएं दिनभर कठिन निर्जला व्रत का पालन करती हैं। शाम को पूजा-पाठ के बाद ही विशेष प्रसाद ग्रहण किया जाता है। बलराम जयंती
36 साल बाद बन रहा है दुर्लभ संयोग
ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, इस बार 36 साल बाद बड़ा योग बना है। हरछठ पर ध्रुव योग और अमृत सिद्धि योग की छाया रहने वाली है। ध्रुव योग का अर्थ है कि मन का संकल्प जरूर पूरा होगा। अमृत सिद्धि योग में की गई पूजा का अक्षय फल प्राप्त होता है।
जो महिलाएं पहली बार व्रत रख रही हैं, उनके लिए दिन शुभ है। इस शुभ समय में पूजा करने से संतान को सफलता मिलती है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले जोड़ों के लिए भी यह खास है।
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बलराम जी के जन्मोत्सव का पर्व
हरछठ का दिन शेषनाग के अवतार बलराम जी का जन्मदिन है। बलराम जी को हलधर भी कहा जाता है क्योंकि उनका शस्त्र हल है। उनकी कृपा से ही धरती पर अच्छी फसल और समृद्धि आती है।
द्वापर युग में भी इस व्रत का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। यह व्रत परिवार में सुख और शांति लाने वाला माना गया है। संतान के ऊपर आने वाले सभी कष्ट इस व्रत से टलते हैं। संतान की लंबी आयु के लिए यह सबसे बड़ा व्रत है।
घर के आंगन में बनती है छोटी पोखरी
दोपहर के बाद घर के आंगन में छोटा सा गड्ढा बनाया जाता है। इसे एक सुंदर पोखरी या तालाब का रूप दिया जाता है। इस पोखरी में स्वच्छ जल और थोड़ा दूध भरा जाता है। किनारे पर आम, बेर और महुआ की छोटी टहनियां लगाई जाती हैं।
कांस के फूल भी चारों तरफ सजाकर रखे जाते हैं। मिट्टी के हाथी और घोड़ों की मूर्तियां भी वहां रखते हैं। महिलाएं मिलकर भगवान बलराम और माता षष्ठी की पूजा करती हैं।
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केवल भैंस के दूध का होता है उपयोग
हरछठ के व्रत में गाय के दूध का उपयोग बिल्कुल वर्जित है। इस दिन केवल भैंस के दूध, दही और घी का प्रयोग होता है। इसमें भी एक बहुत ही विशेष धार्मिक नियम छुपा हुआ होता है। उसी भैंस का दूध लिया जाता है, जिसका बच्चा जीवित होता है।
महुआ के पत्तल पर रखकर ही भोजन ग्रहण करने की परंपरा है। महुआ दातून का उपयोग मुंह साफ करने के लिए किया जाता है। महिलाएं इन सभी नियमों का बड़े नियम से पालन करती हैं।
सात प्रकार के अनूठे अन्न की पूजा
हरछठ की पूजा में सात विशेष अन्न का उपयोग किया जाता है। इनमें धान, गेहूं, मक्का, चना, मूंग, सेमी और अरहर शामिल हैं। इन्हें मिट्टी के छोटे बर्तनों में भरकर पूजा में रखा जाता है।
पूजा के बाद कथा सुनी जाती है और संतान के लिए प्रार्थना करते हैं। कांस की घास में दो गांठ लगाकर संतान सुख मांगा जाता है। मान्यता है कि इससे निसंतान महिलाओं को जल्द खुशी मिलती है। पूजा खत्म होने के बाद सभी महिलाएं मिलकर प्रसाद बांटती हैं।
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जहां चला हल वहां नहीं जातीं महिलाएं
इस व्रत का सबसे कठिन नियम हल से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्याता है कि, जिस जमीन पर हल चला हो, वहां महिलाएं पांव नहीं रखती हैं। वे खेत में उगे किसी भी अनाज या फल का सेवन नहीं करतीं।
बलराम जी का शस्त्र हल होने के कारण ऐसा नियम बनाया गया है। केवल जंगलों या बिना जुताई वाली जगह की चीजें खाई जाती हैं। पसही का चावल यानी तिन्नी का चावल इस दिन खाया जाता है। पडोरा की सब्जी और महुआ का पत्ता प्रसाद में काम आता है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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