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गाय-भैंस के बछड़ों के दिल पर सीधा असर करती है FMD बीमारी, ऐसे बचाएं अपने पशुओं को, जानें तरीका

newz@gmail.com | Sep 14, 2026, 14:58 IST

FMD बीमारी गाय-भैंस के बछड़ों के दिल को भी प्रभावित करती है, जिससे उनकी मौत तक हो सकती है। समय पर टीकाकरण, शेड की सफाई और सही देखभाल से इसे रोका जा सकता है।

FMD बीमारी

लंपी और FMD बीमारी को लेकर देश में हाई अलर्ट जारी हुआ है। खुरपका-मुंहपका को अंग्रेजी में FMD यानी Foot and Mouth Disease कहते हैं। FMD गाय-भैंस के साथ उनके बछड़ों पर भी असर डालती है। यह बीमारी बछड़ों के दिल को भी प्रभावित कर सकती है। समय पर इलाज न मिलने पर बछड़ों की मौत भी हो सकती है। टीकाकरण, शेड की सफाई और सही देखभाल से इसे रोका जा सकता है।

FMD बीमारी का बछड़ों पर असर

लंपी और खुरपका-मुंहपका बीमारी को लेकर हाई अलर्ट जारी हुआ है। एफएमडी की आशंका है कि इसका असर पूरे देश में देखा जा सकता है। वहीं लंपी बीमारी देश के 220 जिलों में असर दिखा सकती है। दोनों ही बीमारियां एक पशु से दूसरे पशु में तेजी से फैलती हैं। FMD गाय-भैंस के साथ उनके बछड़ों पर भी असर डालती है। बछड़ों के हार्ट पर भी इसका सीधा असर देखा जाता है। बड़े पशुओं की तरह बछड़ों को भी उतनी ही परेशानी उठानी पड़ती है। इसलिए समय रहते सावधानी बरतना बहुत जरूरी हो जाता है।

सर्दियों में बढ़ता है खतरा

पशु विशेषज्ञों का कहना है कि बछड़ों में यह बीमारी कम ही होती है। लेकिन जब होती है तो बड़े पशु जैसी परेशानी बछड़ों को उठानी पड़ती है। सर्दियों में इसकी आशंका ज्यादा बढ़ जाती है। ठंड के मौसम में पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता थोड़ी कमजोर हो जाती है। इसलिए बछड़ों के शेड में ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है। शेड की साफ-सफाई और तापमान का खास ध्यान रखना चाहिए। थोड़ी सी लापरवाही बड़ी परेशानी में बदल सकती है।

ये लक्षण दिखें तो सतर्क रहें

पशु विशेषज्ञों के मुताबिक बछड़ों में FMD होने पर हार्ट भी प्रभावित होता है। ऐसा होने पर बछड़ों की मौत तक हो सकती है। इसलिए जहां भी FMD संक्रमण फैला हो, वहां खास देखभाल जरूरी है। संक्रमण फैलने की आशंका वाले इलाकों में भी सतर्कता बरतनी चाहिए। बछड़ों में लक्षण दिखते ही शेड में दवाई का छिड़काव जरूरी हो जाता है। संक्रमण फैलते ही तेज बुखार के साथ लक्षण दिखने लगते हैं। मुंह और पैर में छाले होना इसका आम लक्षण माना जाता है। ऐसे लक्षण दिखते ही फौरन जरूरी कदम उठाने चाहिए। देरी करने पर बछड़ों की जान को खतरा बढ़ सकता है।

शेड की सफाई सबसे जरूरी

FMD से बचाव के लिए शेड को साफ रखना पहला जरूरी कदम है। शेड को 0.1 फीसद पोटेशियम परमैंगनेट के घोल से धोना चाहिए। इससे शेड में मौजूद कीटाणु काफी हद तक खत्म हो जाते हैं। बछड़ों के पैरों या मुंह में घाव दिखें तो उन पर बोरोग्लिसरीन लगानी चाहिए। इससे घाव जल्दी ठीक होने में मदद मिलती है। पैरों को फिनाइल के घोल से धोना भी जरूरी माना जाता है। इससे पैरों में संक्रमण फैलने का खतरा कम होता है। संक्रमित बछड़े को तुरंत स्वस्थ बछड़ों से अलग कर देना चाहिए। इससे बीमारी दूसरे बछड़ों तक फैलने से रुक सकती है।

टीकाकरण है भरोसेमंद तरीका

टीकाकरण भी FMD से बचाव का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है। बछड़ों का टीकाकरण एक महीने की उम्र में शुरू करना चाहिए। इसके बाद तीन महीने और छह महीने की उम्र में भी टीका जरूरी है। इस तरह तीन चरणों में टीकाकरण पूरा किया जाता है। इसके बाद हर छह महीने पर वैक्सीनेशन कराते रहना चाहिए। नियमित टीकाकरण से बछड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहती है। इससे संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। पशुपालकों को टीकाकरण का पूरा शेड्यूल याद रखना चाहिए।

पेट के कीड़ों से बचाव भी जरूरी

पेट के कीड़ों से बचाव भी बछड़ों की सेहत के लिए जरूरी है। इसके लिए पाइपरजीन दवा दी जानी चाहिए। पेट के कीड़े कमजोर बछड़ों को बीमारियों के प्रति और संवेदनशील बना देते हैं। इसलिए समय पर यह दवा देना फायदेमंद रहता है। पशु शेड को साफ रखने से बाहरी कीड़े अंदर नहीं आ पाते। गंदे शेड में मक्खी-मच्छर पनपने का खतरा ज्यादा रहता है। ये कीड़े भी बीमारी फैलाने में भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए शेड की नियमित सफाई को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

प्राकृतिक उपाय कारगर होगा

कुछ प्राकृतिक उपाय भी शेड में अपनाए जा सकते हैं। लेमनग्रास, तुलसी और निर्गुंडी जैसे पौधे शेड में लटकाए जा सकते हैं। इनकी गंध से कई तरह के कीड़े शेड से दूर रहते हैं। यह तरीका पुराने समय से पशुपालकों के बीच प्रचलित रहा है। इसे अपनाने से शेड का माहौल भी बेहतर बना रहता है। साथ ही यह तरीका पशुओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है। छोटे-छोटे ऐसे उपाय बड़ी बीमारियों से बचाव में मददगार साबित हो सकते हैं।

लक्षणों पर रखें नजर

पशुपालकों के लिए बछड़ों पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी है। बछड़ों के खाने-पीने और व्यवहार में बदलाव पर ध्यान देना चाहिए। भूख कम लगना या सुस्ती दिखना शुरुआती संकेत हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखते ही पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। समय पर इलाज शुरू होने से बछड़ों की जान बचाई जा सकती है। थोड़ी सी सतर्कता और सही देखभाल से यह बीमारी रोकी जा सकती है। पशुपालकों को डॉक्टर की सलाह से ही दवाइयों का इस्तेमाल करना चाहिए। सही जानकारी और समय पर कदम उठाना ही सबसे बड़ा बचाव है। जागरूक पशुपालक ही अपने बछड़ों को इस बीमारी से सुरक्षित रख सकते हैं।

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