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कपास कीट प्रबंधन: राजस्थान के किसानों ने सीखी IPM तकनीकें

newz@gmail.com | Oct 19, 2026, 17:12 IST

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में कपास कीट प्रबंधन पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित हुआ। कार्यक्रम में किसानों, कृषि पर्यवेक्षकों और एफपीओ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रशिक्षण में कीटों की निगरानी, आर्थिक क्षति स्तर, जैविक नियंत्रण और ट्राइकोग्रामा के उपयोग की जानकारी दी गई।

कपास

कपास कीट प्रबंधन पर हनुमानगढ़ जिले में विशेष प्रशिक्षण आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य किसानों तक फसल सुरक्षा से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाना था। कार्यक्रम में खरीफ फसलों पर विशेष ध्यान दिया गया। कपास की फसल इसके प्रमुख विषयों में शामिल रही। यह पांच दिवसीय कार्यक्रम 12 से 16 अक्टूबर 2026 तक चला। इसका आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र संगरिया में किया गया। टिड्डी दल-सह-एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र, श्रीगंगानगर ने इसकी जिम्मेदारी संभाली। कार्यक्रम में खेती के दौरान कीटों से होने वाले नुकसान को समझने पर जोर दिया गया।

इस प्रशिक्षण में कृषि पर्यवेक्षकों, किसान उत्पादक संगठनों के प्रतिनिधियों और किसानों ने हिस्सा लिया। इन्हें कीटों की पहचान और प्रबंधन से जुड़ी जानकारी दी गई। कार्यक्रम में सैद्धांतिक जानकारी के साथ व्यावहारिक पहलुओं को भी शामिल किया गया। कपास उत्पादक किसानों के लिए कीट प्रबंधन एक अहम विषय है। फसल में कीटों की मौजूदगी और उनके नुकसान को समय पर समझना जरूरी होता है। सही जानकारी मिलने से किसान फसल की स्थिति के अनुसार निर्णय ले सकते हैं। इससे अनावश्यक कीटनाशक इस्तेमाल से बचने में भी मदद मिल सकती है।

अधिकारियों ने किया शुभारंभ

प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ उप निदेशक डॉ. आरके शर्मा ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में हनुमानगढ़ कृषि विभाग की संयुक्त निदेशक यशवंती चौधरी शामिल हुईं। कृषि विज्ञान केंद्र संगरिया के प्रभारी अधिकारी और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनूप कुमार विशिष्ट अतिथि रहे।

कार्यक्रम में कृषि विभाग और कृषि विज्ञान से जुड़े लोगों की भागीदारी रही। इसमें किसानों के साथ कृषि पर्यवेक्षकों और किसान उत्पादक संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अलग-अलग स्तर पर काम करने वाले लोगों के बीच जानकारी साझा करने का अवसर मिलता है।

किसानों को खेतों में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कीटों का प्रकोप इनमें से एक प्रमुख समस्या है। हर कीट फसल को एक समान नुकसान नहीं पहुंचाता। इसलिए कीट की पहचान, उसकी संख्या और फसल पर उसके असर को समझना जरूरी है।

IPM तकनीकों की दी जानकारी

प्रशिक्षण का मुख्य विषय समेकित नाशीजीव प्रबंधन था। इसे अंग्रेजी में इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (Integrated Pest Management) या आईपीएम (IPM) कहा जाता है। यह फसल में कीटों को नियंत्रित करने का एक समन्वित तरीका है।

इसमें कीटों की निगरानी, उनके नुकसान का आकलन और उचित नियंत्रण उपायों पर ध्यान दिया जाता है। इसका उद्देश्य फसल को नुकसान से बचाते हुए कीट प्रबंधन के अलग-अलग तरीकों का संतुलित इस्तेमाल करना है। जरूरत के अनुसार जैविक और अन्य नियंत्रण उपायों पर विचार किया जा सकता है।

कार्यक्रम में कपास में कीटों की निगरानी के बारे में जानकारी दी गई। किसानों के लिए निगरानी का महत्व इसलिए है, क्योंकि इससे खेत में कीटों की स्थिति समझने में मदद मिलती है। समय पर निरीक्षण करने से समस्या की पहचान जल्दी हो सकती है।

प्रशिक्षण में आर्थिक क्षति स्तर से जुड़ा विषय भी शामिल था। आर्थिक क्षति स्तर का मतलब उस स्थिति से है, जहां कीटों के कारण होने वाला नुकसान आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होने लगता है। इस अवधारणा को समझना कीट नियंत्रण के फैसले लेने में उपयोगी होता है।

हर खेत में कीटों की संख्या और नुकसान की स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए केवल कीट दिखाई देने के आधार पर कीटनाशक का इस्तेमाल करना हमेशा उचित नहीं होता। फसल की अवस्था, कीटों की संख्या और नुकसान की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

जैविक नियंत्रण पर जोर

प्रशिक्षण में जैविक नियंत्रण के बारे में भी जानकारी दी गई। जैविक नियंत्रण में हानिकारक कीटों को नियंत्रित करने के लिए उनके प्राकृतिक शत्रुओं या उपयोगी जीवों की मदद ली जाती है। इसका उद्देश्य फसल सुरक्षा के लिए उपलब्ध विकल्पों का सही इस्तेमाल करना है।

इस तरह के उपायों की जानकारी कपास उत्पादकों के लिए उपयोगी हो सकती है। खेत में मौजूद सभी जीव नुकसान पहुंचाने वाले नहीं होते। कुछ उपयोगी जीव हानिकारक कीटों की संख्या घटाने में मदद करते हैं। इसलिए खेत की स्थिति समझना और उपयोगी जीवों की भूमिका पहचानना महत्वपूर्ण है।

कार्यक्रम में ट्राइकोग्रामा के उपयोग और वितरण से संबंधित व्यावहारिक जानकारी भी दी गई। ट्राइकोग्रामा एक सूक्ष्म परजीवी ततैया का समूह है। इसकी कुछ प्रजातियां कीटों के अंडों में परजीवी बनकर उनका विकास रोकती हैं। इस कारण फसल सुरक्षा के जैविक उपायों में इसका उपयोग किया जाता है।

हालांकि, ट्राइकोग्रामा का उपयोग हर कीट और हर परिस्थिति में एक जैसा नहीं होता। इसकी उपयोगिता संबंधित कीट, फसल और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसके उपयोग और वितरण के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह महत्वपूर्ण होती है।

किसानों तक पहुंचेगी वैज्ञानिक जानकारी

प्रशिक्षण में राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य प्रबंधन संस्थान के बारे में भी जानकारी दी गई। पौधों का स्वास्थ्य सुरक्षित रखना खेती की गुणवत्ता और उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। फसलों को कीटों और अन्य समस्याओं से बचाने में सही जानकारी की भूमिका रहती है। कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू वैज्ञानिक जानकारी को किसानों तक पहुंचाने पर जोर देना था। कृषि पर्यवेक्षक और किसान उत्पादक संगठनों के प्रतिनिधि इस प्रक्रिया में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। वे प्रशिक्षण में मिली जानकारी को अपने कार्यक्षेत्र में साझा कर सकते हैं।

किसानों को फसल की समस्या के समय सही सलाह मिलना जरूरी है। गलत पहचान या बिना जरूरत किए गए छिड़काव से खेती की लागत बढ़ सकती है। वहीं, समय पर निगरानी और उचित उपाय नुकसान को सीमित करने में मदद कर सकते हैं। यहां यह समझना भी जरूरी है कि आईपीएम का अर्थ केवल कीटनाशकों का इस्तेमाल बंद करना नहीं है। इसका मतलब कीटों की निगरानी और उपलब्ध नियंत्रण उपायों का सोच-समझकर इस्तेमाल करना है। किसी भी उपाय का चयन फसल और कीट की स्थिति के अनुसार होना चाहिए।

कपास की खेती में कीट प्रबंधन का फैसला किसान की लागत और फसल की स्थिति से जुड़ा होता है। इसलिए प्रशिक्षण में मिली जानकारी का उपयोग खेत की परिस्थितियों को समझकर करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से मार्गदर्शन लेना बेहतर रहता है।

समापन पर मिले प्रमाण-पत्र

प्रशिक्षण के समापन पर जिला परिषद, हनुमानगढ़ की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री श्रद्धा गोमे मौजूद रहीं। उन्होंने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण किट और प्रमाण-पत्र वितरित किए। उन्होंने अपने अनुभव और विचार साझा करके प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाया।

उन्होंने किसानों को कपास सहित खरीफ फसलों में आईपीएम तकनीकें अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने वैज्ञानिक जानकारी को दूसरे किसानों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया। साथ ही, पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ खेती की पद्धतियों को बढ़ावा देने की बात कही।

कार्यक्रम में कृषि विभाग और तकनीकी टीम के अन्य सदस्यों ने भी योगदान दिया। इनमें सहायक निदेशक प्रकाश चंद्र शामिल थे। सहायक पादप संरक्षण अधिकारी जितेंद्र मीणा और अंकित कुमार जांगिड़ ने भी भागीदारी निभाई।

वैज्ञानिक सहायक आरके चौधरी और वर्षा ने भी कार्यक्रम में योगदान दिया। तकनीकी सहायक रिया चावला भी इससे जुड़ी रहीं। उपलब्ध समाचार में इन सभी सदस्यों की अलग-अलग जिम्मेदारियों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।

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