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एमपी के कटनी की रीता ने बायोफ्लॉक से बदली मछली पालन की तस्वीर, 5 टन उत्पादन से कमाया बड़ा मुनाफा

newz@gmail.com | Sep 17, 2026, 16:15 IST

कटनी की रीता श्रीवास्तव ने बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन शुरू किया। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की मदद से इकाई बनी। करीब 5 से 6 महीने में 5 टन मछली उत्पादन मिला। खर्च घटाने के बाद एक फसल में करीब 2.10 लाख रुपए लाभ मिला।

मछली उत्पादन

मध्य प्रदेश के कटनी जिले की रीता श्रीवास्तव चर्चा में हैं। उन्होंने मछली पालन को नए तरीके से अपनाया है। रीता रीठी तहसील के करहिया गांव की रहने वाली हैं। उन्होंने आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक से मछली उत्पादन शुरू किया।

रीता ने वर्ष 2025-26 में अपनी इकाई स्थापित की। इसके लिए उन्हें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मदद मिली। योजना की सहायता से पॉण्ड बायोफ्लॉक इकाई तैयार हुई। इसमें कम जगह में वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन होता है।

बायोफ्लॉक तकनीक में पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जाता है। इसमें मछलियों के लिए पानी की गुणवत्ता अहम रहती है। ऑक्सीजन स्तर की लगातार निगरानी भी जरूरी होती है। इससे मछलियों की वृद्धि बेहतर रखने में मदद मिलती है।

10 हजार मछली बीज से शुरुआत

रीता की इकाई में करीब 10 हजार मछली बीज डाले गए। इसमें जीआईएफटी (Genetically Improved Farmed Tilapia) तिलापिया का इस्तेमाल हुआ। मछलियों को संतुलित और गुणवत्तापूर्ण फ्लोटिंग फीड दिया गया।

इकाई में पानी की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखी जाती है। ऑक्सीजन स्तर और दूसरे जरूरी मानक भी देखे जाते हैं। इस वैज्ञानिक प्रबंधन से मछलियों की वृद्धि बेहतर हुई। लगातार देखभाल का असर उत्पादन पर भी दिखा।

रीता को करीब 5 से 6 महीने में एक फसल मिलती है। इस अवधि में करीब 5 मीट्रिक टन मछली पैदा होती है। यानी एक फसल में लगभग 5 हजार किलोग्राम उत्पादन होता है।

5 टन उत्पादन से 2.10 लाख लाभ

मछली बिक्री से रीता को अच्छी आमदनी मिल रही है। बिक्री से मिली रकम में उत्पादन खर्च घटाया जाता है। इसके बाद करीब 2.10 लाख रुपए शुद्ध लाभ बचता है। यह लाभ एक फसल से प्राप्त होता है।

अगर साल में दो फसल ली जाएं, तो आय बढ़ सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वार्षिक लाभ 4.20 लाख रुपए तक पहुंच सकता है। यह अनुमान दो फसलों के मौजूदा लाभ पर आधारित है। वास्तविक आय बाजार और लागत के अनुसार बदल सकती है।

तकनीक के साथ प्रबंधन भी जरूरी

बायोफ्लॉक तकनीक अकेले सफलता की गारंटी नहीं देती। इसके लिए लगातार निगरानी और सही प्रबंधन जरूरी है। रीता की इकाई में यही तरीका अपनाया जा रहा है।

गुणवत्तापूर्ण मछली बीज उत्पादन की पहली जरूरी कड़ी है। इसके बाद संतुलित आहार देना भी महत्वपूर्ण है। पानी की गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी है। ऑक्सीजन स्तर में बदलाव पर भी नजर रखनी होती है।

रीता ने इन सभी पहलुओं पर ध्यान दिया। इसी वजह से उनकी इकाई में अच्छा उत्पादन मिला। तकनीक और नियमित देखभाल ने कारोबार को बेहतर बनाया।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मदद

रीता के लिए सरकारी योजना महत्वपूर्ण सहारा बनी। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत उन्हें सहायता मिली। इससे आधुनिक मत्स्य इकाई स्थापित करने का अवसर मिला।

उन्होंने इस सहायता का इस्तेमाल बायोफ्लॉक इकाई बनाने में किया। इसके बाद तकनीकी तरीके से मछली पालन शुरू किया। इससे परंपरागत तरीके से आगे बढ़ने का रास्ता मिला।

योजना का उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाना है। साथ ही आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देना भी इसका हिस्सा है। रीता का उदाहरण इस तकनीक की संभावनाएं दिखाता है।

कलेक्टर ने इकाई का किया दौरा

जन विश्वास अभियान के दौरान कलेक्टर आशीष तिवारी ने इकाई देखी। उन्होंने रीता की पॉण्ड बायोफ्लॉक इकाई का अवलोकन किया। कलेक्टर ने उनकी मेहनत और उद्यमशीलता की सराहना की।

दौरे के दौरान आधुनिक मत्स्य पालन की व्यवस्था देखी गई। रीता की इकाई में अपनाई जा रही तकनीक भी समझी गई। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे व्यवसाय की संभावनाएं सामने आती हैं।

रीता ने दिखाया कि सीमित जगह में भी उत्पादन संभव है। इसके लिए सही तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी है। सरकारी सहायता मिलने पर ऐसे मॉडल को आगे बढ़ाया जा सकता है।

महिलाओं और युवाओं के लिए अवसर

रीता की सफलता केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं है। उनका मॉडल गांव की महिलाओं के लिए भी उदाहरण बन सकता है। युवा भी आधुनिक मत्स्य पालन को व्यवसाय बना सकते हैं।

बायोफ्लॉक तकनीक में सीमित जगह का इस्तेमाल होता है। इसलिए छोटे स्तर पर शुरुआत की संभावना रहती है। हालांकि, निवेश और तकनीकी जानकारी की जरूरत बनी रहती है।

सफलता के लिए बाजार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मछली की बिक्री और स्थानीय मांग का असर आय पर पड़ता है। इसलिए उत्पादन के साथ बाजार की योजना जरूरी है।

रीता की कहानी यही संदेश देती है। पारंपरिक काम में तकनीक जोड़कर नई आय बनाई जा सकती है। सही प्रशिक्षण और योजना से ग्रामीण उद्यम मजबूत हो सकते हैं।

सालाना आय बढ़ने की संभावना

रीता की मौजूदा इकाई एक फसल में करीब 5 टन देती है। एक फसल से लगभग 2.10 लाख रुपए शुद्ध लाभ मिलता है। साल में दो फसल लेने पर लाभ बढ़ सकता है। उपलब्ध आंकड़े 4.20 लाख रुपए वार्षिक लाभ का संकेत देते हैं।

रीता का मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे आधुनिक मत्स्य पालन की संभावनाएं समझ आती हैं। बायोफ्लॉक तकनीक रोजगार और आय का जरिया बन सकती है।

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