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अरहर की खेती से कमाई: भीमा किस्म ने किसान की आमदनी बढ़ाई, 36 हजार लागत, 1.31 लाख का लाभ

newz@gmail.com | Sep 29, 2026, 15:23 IST

मध्य प्रदेश के आगर मालवा में किसान रोहित शर्मा ने अरहर की भीमा किस्म उगाई। एक एकड़ में 10 क्विंटल दाना मिला। दाल बनाकर 240 रुपए किलो बेची। खेती और मूल्य संवर्धन के बाद 1,31,900 रुपए शुद्ध लाभ हुआ।

अरहर की खेती

मध्य प्रदेश के आगर मालवा से खेती की अच्छी मिसाल सामने आई है। किसान रोहित शर्मा ने अरहर से बेहतर आमदनी हासिल की। उन्होंने एक एकड़ में भीमा किस्म की अरहर उगाई। यह खेती खरीफ वर्ष 2025-26 में की गई थी।

रोहित आगर विकासखंड के आखाखेड़ी गांव के किसान हैं। यह गांव सोनचिड़ी ग्राम पंचायत में आता है। कृषि विभाग से उन्हें अनुदान पर बीज मिला था। अधिकारियों ने खेती के दौरान उन्हें जरूरी मार्गदर्शन दिया।

भीमा किस्म के बीज से शुरुआत

रोहित शर्मा को अरहर की भीमा किस्म का बीज मिला था। उन्होंने एक एकड़ में छह किलोग्राम बीज इस्तेमाल किया। बुवाई से पहले बीज का उपचार किया गया था। इसके बाद फसल की नियमित देखभाल की गई।

किसान ने समय-समय पर जैविक औषधियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने जैविक खाद का भी उपयोग किया। नियमित निगरानी से फसल में कीट और रोग नहीं दिखे। पौधों में फलियों की संख्या भी अच्छी रही।

150 दिन में तैयार हुई फसल

अरहर की फसल करीब 150 से 160 दिन में तैयार हुई। एक एकड़ से 10 क्विंटल दाने का उत्पादन मिला। इसके बाद किसान ने दानों को अच्छी तरह सुखाया।

फिर दानों से दाल तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्र की पारंपरिक धोब विधि अपनाई गई। इस तरीके से दाल तैयार करने पर मूल्य बढ़ा।

100 किलो दाने से मिली 70 किलो दाल

रिपोर्ट के अनुसार 100 किलो दाने से 70 किलो दाल मिली। इस तरह 10 क्विंटल दाने से सात क्विंटल दाल तैयार हुई। तैयार दाल को आगर के जैविक हाट में बेचा गया।

दाल की बिक्री 240 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से हुई। सात क्विंटल दाल की कुल बिक्री 1,68,000 रुपए रही। यही बिक्री किसान की कुल आय का आधार बनी।

खेती की लागत कितनी रही?

एक एकड़ में खेती की कुल लागत 23,900 रुपए रही। इसमें फसल तैयार करने से जुड़ी लागत शामिल थी। दाल बनाने में 12,200 रुपए अतिरिक्त खर्च हुए।

इस खर्च को मूल्य संवर्धन लागत बताया गया है। खेती और दाल बनाने की कुल लागत 36,100 रुपए रही। इस तरह किसान ने तैयार उत्पाद बेचकर ज्यादा मूल्य पाया।

1.31 लाख रुपए का शुद्ध लाभ

किसान ने सात क्विंटल दाल बेचकर 1,68,000 रुपए हासिल किए। कुल लागत 36,100 रुपए रही। बिक्री से लागत घटाने पर 1,31,900 रुपए बचते हैं।

यही राशि इस खेती से मिला शुद्ध लाभ बताया गया है। इसमें खेती और मूल्य संवर्धन दोनों की लागत शामिल है। इसलिए यह सिर्फ फसल बेचने की कमाई नहीं है।

दाल बनाकर बढ़ाया उत्पाद का मूल्य

इस मामले में किसान ने केवल अरहर के दाने नहीं बेचे। उन्होंने दाने से दाल तैयार करके बाजार में बिक्री की। इससे उत्पाद का मूल्य बढ़ा और बिक्री मूल्य मिला।

रिपोर्ट में धोब विधि से बनी दाल को अधिक पौष्टिक बताया गया है। इसे पारंपरिक और स्थानीय प्रक्रिया के रूप में बताया गया। हालांकि पोषण संबंधी दावे को सामान्य तथ्य नहीं मानना चाहिए।

कृषि विभाग की मदद से मिली राह

रोहित शर्मा ने अपनी सफलता का श्रेय कृषि विभाग को दिया। उन्होंने अधिकारियों के मार्गदर्शन को उपयोगी बताया। अनुदान पर मिला बीज भी खेती में मददगार रहा।

इस उदाहरण में तीन बातें खास नजर आती हैं। पहली बात, उन्नत किस्म का इस्तेमाल हुआ। दूसरी बात, फसल की लगातार निगरानी की गई। तीसरी बात, उत्पाद का मूल्य बढ़ाकर बिक्री की गई।

हर किसान को इतना लाभ मिलेगा?

इस उदाहरण से हर किसान की समान कमाई तय नहीं होती। उत्पादन मौसम और मिट्टी के अनुसार बदल सकता है। बीज, मजदूरी और खेती की लागत भी अलग हो सकती है।

दाल की बिक्री कीमत भी बाजार के अनुसार बदल सकती है। इसलिए 1,31,900 रुपए का लाभ इस किसान का आंकड़ा है। इसे सभी किसानों के लिए तय आय नहीं माना जा सकता।

अरहर की खेती में क्या सीख है?

इस मामले में फसल उत्पादन के साथ मूल्य संवर्धन अहम रहा। किसान ने दाने बेचने की जगह दाल तैयार की। इससे तैयार उत्पाद का बिक्री मूल्य बढ़ा।

वैज्ञानिक खेती और नियमित निगरानी से भी फसल को फायदा मिला। कृषि विभाग से मिला बीज और मार्गदर्शन भी उपयोगी रहा। किसानों के लिए यह एक स्थानीय खेती मॉडल है।

हालांकि खेती शुरू करने से पहले स्थानीय सलाह जरूरी है। मिट्टी और मौसम के अनुसार किस्म चुनना चाहिए। लागत और बाजार भाव का हिसाब भी पहले करना चाहिए।

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