मध्यप्रदेश के धार जिले में आधुनिक खेती का असर दिखा है। फरसपुरा के किसान सुमित भाटिया ने खेती का तरीका बदला। इसके बाद उनकी सालाना कृषि आय में बड़ी बढ़ोतरी हुई। सुमित के पास करीब 1.5 एकड़ कृषि भूमि है। पहले वह पारंपरिक तरीके से खेती करते थे। उनके खेत में मुख्य रूप से मक्का और कपास होती थी। सिंचाई के पर्याप्त साधन उनके पास उपलब्ध नहीं थे।
इस कारण उनकी खेती बारिश पर काफी निर्भर रहती थी। खेत में बाढ़ विधि से भी सिंचाई की जाती थी। इस तरीके में उपलब्ध पानी का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो पाता था। उस समय उनकी सालाना कृषि आय करीब 72 हजार रुपए थी। सीमित जमीन के कारण आमदनी बढ़ाना भी बड़ी चुनौती थी।
जल धारा से बदली खेती
इसके बाद सुमित ‘परियोजना जल धारा’ से जुड़े। परियोजना का उद्देश्य जल-कुशल खेती को बढ़ावा देना है। इसमें छोटे और सीमांत किसानों पर भी ध्यान दिया गया। परियोजना के तहत कृषि विशेषज्ञों ने सुमित के खेत का चयन किया। उन्हें आधुनिक और व्यावसायिक खेती के तरीके समझाए गए। उच्च मूल्य वाली सब्जियों की खेती की जानकारी भी दी गई।
सुमित को टमाटर उत्पादन की तरफ बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया। उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाले एक हजार टमाटर पौधे दिए गए। इसके बाद उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर टमाटर उत्पादन शुरू किया।
ड्रिप से जड़ों तक पानी
टमाटर की खेती में प्रिसिजन ड्रिप सिंचाई तकनीक अपनाई गई। इससे पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचने लगा। उपलब्ध पानी का उपयोग पहले से बेहतर हुआ। यह बदलाव सीमित सिंचाई वाले किसान के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। पानी पूरे खेत में फैलाने की जरूरत कम हुई। पौधों को जरूरत के अनुसार पानी देना भी आसान हुआ।
खेत में प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक भी इस्तेमाल की गई। इससे मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रही। पानी का वाष्पीकरण कम करने में भी मदद मिली। मल्चिंग से खरपतवार नियंत्रित करने में भी सहायता मिली। इससे फसल प्रबंधन पहले के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित हुआ।
ट्रेलिसिंग का भी इस्तेमाल
सुमित ने टमाटर के पौधों के लिए ट्रेलिसिंग तकनीक अपनाई। इसमें पौधों को संरचना के जरिए सहारा दिया जाता है। यह तकनीक लता वाली सब्जियों में भी इस्तेमाल होती है। इससे पौधों को जमीन से ऊपर रखने में मदद मिली। फलों की गुणवत्ता सुधारने में भी तकनीक उपयोगी रही। रोगों का प्रकोप कम करने में भी सहायता मिली।
सुमित को लगातार तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया गया। इसमें कीट और रोग प्रबंधन की जानकारी शामिल थी। संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर भी उन्हें सलाह मिली। समय के अनुसार फसल प्रबंधन की जानकारी भी दी गई। इससे तकनीक केवल उपकरणों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं रही।
72 हजार से 2.5 लाख हुई आय
नई तकनीकों के बाद सुमित की कृषि आय बढ़ी। उनकी सालाना आय करीब दो लाख रुपए तक पहुंची। बेहतर स्थिति में यह करीब 2.5 लाख रुपए तक पहुंची। पहले यही सालाना कृषि आय करीब 72 हजार रुपए थी। 2.5 लाख रुपए के आधार पर बढ़ोतरी करीब 3.5 गुना है। यह आंकड़ा उनकी कुल सालाना कृषि आय से जुड़ा है।
कम जमीन पर बेहतर विकल्प
सुमित का उदाहरण सीमित जमीन वाले किसानों के लिए उपयोगी है। इसमें केवल फसल बदलने से आय नहीं बढ़ी। सिंचाई और फसल प्रबंधन का तरीका भी बदला गया। ड्रिप तकनीक से पानी का बेहतर उपयोग संभव हुआ। मल्चिंग ने मिट्टी में नमी बनाए रखने में सहायता की। ट्रेलिसिंग से टमाटर के पौधों को बेहतर सहारा मिला।
तकनीकी मार्गदर्शन ने भी पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसान को फसल प्रबंधन की लगातार जानकारी दी गई। यह मॉडल बताता है कि तकनीक अकेले समाधान नहीं है। फसल चयन और उपलब्ध संसाधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। बाजार की स्थिति भी किसान की वास्तविक आय प्रभावित करती है।
इसलिए दूसरे किसानों के परिणाम अलग हो सकते हैं। लागत और स्थानीय परिस्थितियों को पहले समझना जरूरी है। पानी और बाजार की उपलब्धता का आकलन भी जरूरी है।
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