खाद और बीज के समय किसानों को पैसे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। बिहार सरकार कर्ज के लिए लंबा इंतजार खत्म करने की तैयारी में है। इसका रास्ता पैक्स से निकाला जा रहा है। पैक्स (Primary Agricultural Credit Societies) यानी प्राथमिक कृषि ऋण समितियां। सहकारिता विभाग इन्हें सक्रिय करने में जुटा है।
पैक्स से मिलेगी बैंकिंग सेवा
बिहार सरकार चाहती है कि पैक्स गांव स्तर पर बैंकिंग सेवा दें। इन समितियों के जरिए फसल सहायता और खेती का कर्ज भी पहुंचाया जाएगा। यानी किसान को हर काम के लिए शहर की शाखा नहीं जाना पड़ेगा।
इसके लिए सहकारी संस्थाओं को बैंक मित्र (बैंकिंग एजेंट) बनाया जा रहा है। खाते से जुड़ी सेवाएं माइक्रो एटीएम के जरिए दी जा रही हैं। माइक्रो एटीएम एक छोटी मशीन है। इससे गांव में ही पैसे का लेन-देन हो सकता है।
विभाग की योजना सिर्फ पैक्स तक सीमित नहीं है। दुग्ध सहकारी समितियों को भी इस व्यवस्था से जोड़ने की बात है। सब्जी उत्पादक समितियां भी इसमें शामिल की जाएंगी।
केसीसी लोन में तेजी की तैयारी
जानकारी के मुताबिक सहकारिता मंत्री रामकृपाल यादव का जोर केसीसी लोन पर है। केसीसी (Kisan Credit Card) के लोन बांटने में पैक्स की भूमिका बढ़ेगी। जिला केंद्रीय सहकारी बैंक भी इसमें शामिल रहेंगे। लक्ष्य साफ है। किसानों को बीज और खाद के लिए इंतजार न करना पड़े।
केसीसी योजना की जानकारी के मुताबिक फसल लोन की सीमा पांच लाख रुपए है। यह सीमा 2025-26 के लिए बढ़ाई गई है। तीन लाख रुपए तक के फसल लोन पर सात फीसदी ब्याज लगता है। इस पर तीन फीसदी की छूट मिलती है। यानी असल ब्याज चार फीसदी रह जाता है।
यह रिवॉल्विंग क्रेडिट है। किसान जरूरत के हिसाब से पैसा निकाल सकता है। किराए पर खेती करने वाले और बटाईदार भी इसके दायरे में आते हैं। ये आंकड़े राष्ट्रीय योजना के हैं। बिहार में पैक्स के स्तर पर लागू नियम अलग हो सकते हैं।
मुंगेर और पूर्णिया के आंकड़े
समीक्षा बैठक में माइक्रो एटीएम का काम भी देखा गया। मुंगेर प्रमंडल में 146 माइक्रो एटीएम काम कर रहे हैं। इनसे 9,298 खातों को सेवा मिली। इन खातों में जमा राशि 1,134.78 लाख रुपए रही।
पूर्णिया प्रमंडल की तस्वीर अलग है। यहां 74 माइक्रो एटीएम से 3,702 खातों को सेवा मिली। जमा राशि 83.79 लाख रुपए रही। दोनों प्रमंडलों के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखता है। विभाग का लक्ष्य इस नेटवर्क को आगे बढ़ाना है।
फसल सहायता के लंबित मामले
बिहार राज्य फसल सहायता योजना के कई मामले लंबित बताए गए हैं। किसानों के आवेदन पर खेत की जांच और सत्यापन जरूरी है। इसी प्रक्रिया में देरी से पात्र किसानों तक मदद देर से पहुंचती है।
विभाग ने जिला और प्रखंड के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। उन्हें लंबित मामलों की पहचान करनी है। इसके बाद सत्यापन का काम जल्द पूरा करना है। मकसद है कि पात्र किसानों को सहायता जल्दी मिले।
धान खरीद का हाल
बैठक में पिछले खरीफ विपणन सीजन की धान खरीद का हिसाब भी रखा गया। मुंगेर प्रमंडल में धान खरीद लक्ष्य का 99.92 फीसदी पूरी हुई। यहां चावल की आपूर्ति 99.56 फीसदी तक पहुंची।
पूर्णिया प्रमंडल में धान खरीद का आंकड़ा 99.72 फीसदी रहा। चावल की आपूर्ति 97.62 फीसदी हुई। यानी खरीद लगभग लक्ष्य के बराबर रही। चावल आपूर्ति में पूर्णिया थोड़ा पीछे रहा।
गोदाम और कंप्यूटरीकरण पर जोर
सूत्रों के मुताबिक निर्माणाधीन गोदाम समय पर पूरे करने की बात कही गई है। पैक्स का कंप्यूटरीकरण भी प्राथमिकता में है। गोदाम बनने से किसानों को उपज रखने की जगह मिल सकती है।
मजबूत पैक्स का फायदा तीन स्तर पर बताया गया है। पहला, किसान बैंकिंग सेवा तक आसानी से पहुंचेंगे। दूसरा, खेती का कर्ज सहकारी ढांचे से मिलेगा। तीसरा, उपज का भंडारण भी सहकारी व्यवस्था में हो सकेगा।
किसान क्या ध्यान रखें
अभी योजना का पूरा खाका सामने नहीं आया है। इसलिए किसान अपने नजदीकी पैक्स या प्रखंड के सहकारिता कार्यालय से जानकारी लें। केसीसी का आवेदन करते समय पात्रता और जरूरी कागज की जानकारी पहले ले लें।
फसल सहायता के आवेदन की स्थिति भी पूछते रहें। सत्यापन में खेत की जांच होती है। इसलिए पूछताछ में देरी न करें। किसी बिचौलिए को पैसा न दें।
अभी क्या साफ नहीं है
बिहार में कुल कितने पैक्स इस व्यवस्था से जुड़ेंगे, यह नहीं बताया गया है। केसीसी की सीमा और ब्याज दर में बदलाव की कोई घोषणा भी नहीं है। योजना की समयसीमा भी सामने नहीं आई है। इन बातों पर आधिकारिक जानकारी आने का इंतजार करना होगा। तब तक अफवाहों पर भरोसा न करें।
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