मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में पशुपालन से जुड़ी एक अच्छी खबर सामने आई है। अमरवाड़ा विकासखंड के जमुनिया भूरा गांव के भगवानदास सूर्यवंशी ने डेयरी कारोबार बढ़ाया है। सरकारी योजना की मदद से उनका पशुपालन अब व्यवस्थित व्यवसाय बन गया है। इससे उनकी आमदनी बढ़ी है और दूसरे लोगों को भी रोजगार मिला है।
भगवानदास की उम्र 34 वर्ष है। उन्होंने माध्यमिक स्तर तक पढ़ाई की है। पहले वह सामान्य नस्ल के पशुओं का पालन करते थे। पशुओं की दूध देने की क्षमता कम थी। इसलिए उनके यहां रोज केवल 20 से 25 लीटर दूध निकलता था। इतनी कम मात्रा में बड़े स्तर पर कारोबार करना मुश्किल था।
भगवानदास डेयरी व्यवसाय को बढ़ाना चाहते थे। लेकिन उनके पास जरूरी पूंजी नहीं थी। पशुओं की संख्या बढ़ाने और बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए पैसे चाहिए थे। ऐसे में उन्हें सरकारी योजना की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने कारोबार को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की।
ऐसे मिली योजना की मदद
भगवानदास को डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना की जानकारी मिली। पशु चिकित्सालय अमरवाड़ा के विकासखंड अधिकारी डॉ. मयंक परवारी ने उन्हें योजना के बारे में बताया। इसके बाद उन्होंने आवेदन की शुरुआती प्रक्रिया पूरी की।
पशुपालन एवं डेयरी विभाग, छिंदवाड़ा के उप संचालक के मार्गदर्शन में उनका प्रस्ताव तैयार हुआ। इसके बाद मध्यप्रदेश ग्रामीण बैंक की अमरवाड़ा शाखा से ऋण स्वीकृत हुआ। बैंक ने 24 मार्च 2026 को 33.60 लाख रुपए का ऋण स्वीकृति पत्र जारी किया।
उन्हें पहली किस्त में 8.80 लाख रुपए मिले। इसके बाद आगे 9 लाख रुपए की राशि भी जारी हुई। उनकी परियोजना की कुल लागत 42 लाख रुपए तय की गई थी। यह रकम डेयरी कारोबार की स्थापना और विस्तार के लिए थी।
यहां ध्यान देना जरूरी है कि ऋण स्वीकृति और अनुदान एक जैसी चीजें नहीं हैं। योजना के तहत वित्तीय सहायता में ऋण शामिल है। इसलिए लाभार्थियों को आवेदन से पहले शर्तें और भुगतान व्यवस्था समझनी चाहिए।
17 भैंसों से बढ़ा कारोबार
वित्तीय सहायता मिलने के बाद भगवानदास ने पशुओं के लिए शेड बनवाया। यह शेड लगभग 2,500 वर्ग फुट क्षेत्र में तैयार किया गया। उन्होंने इसके बाद 17 दुधारू भैंसें खरीदीं। इससे उनके डेयरी कारोबार का आकार पहले से बड़ा हो गया।
उन्होंने पशुपालन में वैज्ञानिक तरीकों को भी अपनाया। केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना ही उनका लक्ष्य नहीं था। पशुओं की देखभाल, पोषण और स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी था। इन पहलुओं को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने प्रशिक्षण लिया।
पशुपालन विभाग के सहयोग से उन्हें जबलपुर के पशु चिकित्सा महाविद्यालय में प्रशिक्षण दिया गया। वहां उन्हें पशुओं की देखभाल और पोषण से जुड़ी जानकारी मिली। उन्हें स्वास्थ्य प्रबंधन और दूध उत्पादन बेहतर करने के तरीके भी बताए गए। इस जानकारी से कारोबार को व्यवस्थित करने में मदद मिली।
डेयरी व्यवसाय में पशुओं की देखभाल का सीधा संबंध उत्पादन से होता है। सही आहार, साफ पानी और समय पर इलाज जरूरी हैं। साफ-सुथरा पशु शेड भी पशुओं के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए पशुपालन में प्रशिक्षण और नियमित निगरानी की अहम भूमिका रहती है।
रोज 280 लीटर तक दूध उत्पादन
भगवानदास के कारोबार में सबसे बड़ा बदलाव दूध उत्पादन में दिखा। पहले रोज करीब 20 से 25 लीटर दूध मिलता था। अब उत्पादन बढ़कर लगभग 250 से 280 लीटर प्रतिदिन हो गया है। इससे दूध बेचने के लिए उपलब्ध मात्रा में बड़ा इजाफा हुआ।
समाचार के मुताबिक, उन्हें दूध बेचकर रोज 18 से 20 हजार रुपए मिलते हैं। यह दूध की बिक्री से मिलने वाली आमदनी है। इसे शुद्ध मुनाफा नहीं समझना चाहिए। पशुओं के चारे, इलाज, मजदूरी और दूसरे खर्च भी होते हैं। वास्तविक बचत जानने के लिए इन खर्चों का हिसाब जरूरी है।
फिर भी उत्पादन में हुई बढ़ोतरी उनके कारोबार के विस्तार को दिखाती है। ज्यादा दूध मिलने से बिक्री की संभावनाएं बढ़ती हैं। लेकिन नियमित खरीदार और समय पर भुगतान भी डेयरी कारोबार के लिए अहम हैं। पशुपालकों को बाजार और खर्च का हिसाब साथ-साथ रखना चाहिए।
परिवार के साथ दूसरों को रोजगार
डेयरी व्यवसाय का फायदा भगवानदास के परिवार तक सीमित नहीं रहा। उनके परिवार के सदस्यों को भी इससे रोजगार मिला है। इसके अलावा, उन्होंने दो अन्य लोगों को काम दिया है। इससे गांव में रोजगार के अवसर बढ़ाने में मदद मिली है।
ग्रामीण इलाकों में पशुपालन अतिरिक्त आमदनी का साधन बन सकता है। हालांकि, बड़े स्तर पर डेयरी शुरू करने के लिए योजना बनाना जरूरी है। पशुओं की खरीद, शेड, चारा और इलाज का खर्च पहले समझना चाहिए। दूध बेचने की व्यवस्था भी कारोबार शुरू करने से पहले देखनी चाहिए।
भगवानदास का अनुभव बताता है कि वित्तीय सहायता के साथ प्रशिक्षण भी जरूरी है। केवल ऋण मिलना सफल कारोबार की गारंटी नहीं देता। पशुओं की सही देखभाल और बाजार तक पहुंच भी मायने रखती है। नियमित खर्च और आमदनी का हिसाब रखना भी जरूरी है।
अब दूध से उत्पाद बनाने की तैयारी
भगवानदास अब अपने कारोबार को और आगे बढ़ाना चाहते हैं। उनकी योजना भविष्य में दूध प्रसंस्करण इकाई लगाने की है। इससे दूध से दूसरे उत्पाद तैयार करने के अवसर मिल सकते हैं। ऐसे उत्पादों में दही, पनीर और घी जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं।
हालांकि, समाचार में इन उत्पादों का उत्पादन शुरू होने की पुष्टि नहीं है। फिलहाल यह उनकी भविष्य की योजना है। ऐसी इकाई लगाने से पहले मशीनों, जगह, बिजली और बाजार की जरूरत समझनी होगी। खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन भी जरूरी होगा।
दूध को सीधे बेचने और उससे उत्पाद बनाने के कारोबार में अंतर है। प्रसंस्करण से संभावित कमाई बढ़ सकती है, लेकिन खर्च भी बढ़ते हैं। इसलिए मांग, लागत और बिक्री की संभावनाओं का आकलन जरूरी है। सही तैयारी से कारोबार को लंबे समय तक चलाने में मदद मिल सकती है।
क्या है कामधेनु योजना?
डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना मध्य प्रदेश सरकार की डेयरी योजना है। इसका उद्देश्य दुग्ध उत्पादन बढ़ाना और पशुपालकों को कारोबार का अवसर देना है। योजना के तहत पशु शेड, दुधारू पशुओं की खरीद और बीमा जैसे खर्च शामिल हैं। पशुओं को लाने के परिवहन खर्च के लिए भी प्रावधान है।
राज्य की आधिकारिक योजना जानकारी के अनुसार, एक इकाई में 25 दुधारू पशु होते हैं। इसमें गाय या भैंस की निर्धारित श्रेणी के पशु शामिल किए जा सकते हैं। एक इकाई में अलग-अलग श्रेणियों के पशु मिलाने की अनुमति नहीं है। योजना के तहत पात्रता और वित्तीय सहायता की शर्तें लागू होती हैं।
आधिकारिक जानकारी में एक इकाई के लिए देशी नस्ल के पशुओं पर 36 लाख रुपए तक का ऋण बताया गया है। संकर गायों या भैंसों की इकाई के लिए यह राशि 42 लाख रुपए तक है। वास्तविक स्वीकृति आवेदक की पात्रता और बैंक की प्रक्रिया पर निर्भर करती है। इच्छुक पशुपालकों को आवेदन से पहले विभागीय नियम जांचने चाहिए।
भगवानदास की कहानी योजना के संभावित लाभों का एक उदाहरण है। हर पशुपालक को समान उत्पादन या आमदनी मिले, यह जरूरी नहीं है। परिणाम पशुओं की नस्ल, देखभाल, खर्च और बाजार पर निर्भर करते हैं। इसलिए योजना अपनाने से पहले अपनी आर्थिक स्थिति और कारोबारी जरूरतों का आकलन करना चाहिए।
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