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नौकरी छोड़ खेती में उतरे चंद्रशेखर, रंगीन गोभी और काले धान से उत्तराखंड के पहाड़ों में खेती को लाभकारी बना रहे

newz@gmail.com | Oct 13, 2026, 13:22 IST

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के चंद्रशेखर पांडेय ने मुंबई में करीब 22 साल नौकरी की। गांव लौटने के बाद उन्होंने पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की। अब वे गुलाबी और पीली गोभी, काला धान, काला गेहूं, फल, दालें और औषधीय पौधे उगा रहे हैं। लगभग 150 नाली जमीन पर उनकी विविध खेती पहाड़ी कृषि के लिए नई संभावनाएं दिखाती है।

पहाड़ में खेती

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में खेती करना आसान नहीं है। यहां खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे हैं। कई जगह पानी की उपलब्धता भी सीमित रहती है। इसके बावजूद कुछ किसान नई सोच के साथ खेती को आगे बढ़ा रहे हैं। बागेश्वर जिले के चौरसों गांव के चंद्रशेखर पांडेय ऐसी ही मिसाल पेश कर रहे हैं।

चंद्रशेखर ने मुंबई में करीब 22 साल नौकरी की। इसके बाद उन्होंने गांव लौटकर खेती करने का फैसला किया। उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की। यह जमीन लंबे समय से खाली पड़ी थी। उन्होंने परंपरागत फसलों तक खुद को सीमित नहीं रखा। इसके बजाय अलग-अलग फसलों को उगाने के प्रयोग शुरू किए।

आज चंद्रशेखर लगभग 150 नाली जमीन पर खेती कर रहे हैं। उनके खेत में फल, सब्जियां, दालें और औषधीय पौधे उगाए जाते हैं। वे काला धान और काला गेहूं जैसी विशेष फसलें भी उगा रहे हैं। उनका उद्देश्य पहाड़ी जमीन का बेहतर इस्तेमाल करना है। उनकी खेती की खास बात फसलों की विविधता है। इससे वे अलग-अलग कृषि उत्पादों के जरिए आमदनी के अवसर तलाश रहे हैं। हालांकि, उनकी कुल कमाई और प्रत्येक फसल से होने वाली आय के आंकड़े सामने नहीं आए हैं।

गुलाबी गोभी से मिली नई राह

चंद्रशेखर की खेती में रंगीन गोभी ने खास पहचान बनाई है। उन्होंने पिछले साल प्रयोग के तौर पर गुलाबी गोभी उगाई थी। इस प्रयोग के नतीजे उत्साहजनक रहे। फसल की उपज और बाजार की प्रतिक्रिया ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया।

आमतौर पर किसान सफेद गोभी की खेती करते हैं। बाजार में इसकी कीमत कई बार काफी नीचे चली जाती है। ऐसे में रंगीन गोभी किसानों के लिए एक अलग विकल्प बन सकती है। इसकी खेती से पहले स्थानीय मांग और बिक्री की संभावनाएं समझना जरूरी है।

गुलाबी गोभी के प्रयोग के बाद चंद्रशेखर ने इस साल पीली गोभी भी लगाई। इस तरह वे नई किस्मों के जरिए अपने खेत में विविधता बढ़ा रहे हैं। उनका मानना है कि पहाड़ की खेती को आधुनिक और लाभकारी बनाया जा सकता है।

चंद्रशेखर के अनुसार, पहाड़ का ठंडा मौसम और उपजाऊ मिट्टी रंगीन गोभी के लिए अनुकूल हैं। हालांकि, हर इलाके में फसल का प्रदर्शन अलग हो सकता है। इसलिए दूसरे किसानों को अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।

काले धान और गेहूं की खेती

चंद्रशेखर ने रंगीन सब्जियों के साथ विशेष अनाज की खेती भी अपनाई है। उनके खेत में काला धान और काला गेहूं उगाया जा रहा है। ये फसलें उन्हें पारंपरिक खेती से अलग विकल्प देती हैं।

काले धान को ब्लैक राइस (Black Rice) भी कहा जाता है। इसकी पहचान इसके गहरे रंग के दानों से होती है। बाजार में इस तरह के विशेष अनाज को लेकर उपभोक्ताओं की रुचि देखी जा रही है। कुछ खरीदार इनके लिए सामान्य अनाज से अलग कीमत देने को तैयार रहते हैं।

हालांकि, किसी विशेष फसल की ऊंची कीमत मिलने की गारंटी नहीं होती। किसानों को उत्पादन लागत, खरीदारों की संख्या और बिक्री के साधनों का आकलन करना चाहिए। चंद्रशेखर के खेत में काले धान की खेती अभी शुरुआती दौर में है। इसकी उपज और बिक्री से होने वाली आमदनी का ठोस आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

काला गेहूं भी उनकी नई फसलों में शामिल है। इसके अलावा वे दालों और औषधीय पौधों की खेती करते हैं। अलग-अलग फसलें अपनाने से खेती में नए प्रयोग करने का अवसर मिलता है। इससे किसी एक फसल पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।

उद्यान विभाग से मिली मदद

नई फसलों को अपनाने में चंद्रशेखर को स्थानीय उद्यान विभाग से मदद मिली। विभाग ने उन्हें उन्नत बीज उपलब्ध कराने में सहयोग किया। इससे उन्हें रंगीन सब्जियों की खेती के प्रयोग आगे बढ़ाने का अवसर मिला।

किसानों के लिए गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। सही किस्म का चुनाव फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर असर डाल सकता है। लेकिन बीज चुनते समय स्थानीय मौसम और खेती की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है।

चंद्रशेखर की कहानी में सरकारी विभाग से मिला सहयोग एक महत्वपूर्ण पहलू है। किसानों को नई फसल अपनाने से पहले तकनीकी जानकारी लेनी चाहिए। इसके लिए उद्यान विभाग और कृषि विशेषज्ञों से संपर्क किया जा सकता है। चंद्रशेखर का कहना है, “पहाड़ की खेती भी आधुनिक, विविध और लाभकारी व्यवसाय बन सकती है।”

उनकी सोच खेती को केवल पारंपरिक काम मानने के बजाय व्यवसाय के रूप में देखने पर जोर देती है। इसमें फसल का चुनाव, उत्पादन की योजना और बाजार की समझ अहम भूमिका निभाते हैं।

छोटी जमीन पर विविध खेती

बागेश्वर जैसे पहाड़ी जिलों में बड़े और समतल खेत कम मिलते हैं। यहां जमीन अक्सर छोटे-छोटे हिस्सों में बंटी रहती है। इससे बड़े कृषि यंत्रों का इस्तेमाल करना कठिन हो सकता है। सीमित जमीन पर अधिक विकल्प तलाशना किसानों के लिए जरूरी बन जाता है।

चंद्रशेखर लगभग 150 नाली जमीन पर अलग-अलग फसलें उगा रहे हैं। इससे उनके खेत में सब्जियों, अनाज, दालों और फलों का मिश्रण तैयार हुआ है। ऐसी खेती में फसलों का चुनाव स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से करना पड़ता है।

एक ही फसल पर निर्भर किसान को कीमत गिरने पर नुकसान हो सकता है। अलग-अलग फसलें होने से आमदनी के कई संभावित रास्ते बनते हैं। हालांकि, हर फसल के लिए अलग देखभाल और बाजार की जरूरत हो सकती है।

पानी की सीमित उपलब्धता भी पहाड़ी खेती की बड़ी चुनौती है। इसलिए किसानों को फसल की पानी संबंधी जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए। जमीन की क्षमता के अनुसार खेती करने से संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल संभव हो सकता है।

चंद्रशेखर का उदाहरण दिखाता है कि छोटे खेतों में भी नए प्रयोग किए जा सकते हैं। इसके लिए स्थानीय संसाधनों, सही बीजों और तकनीकी मार्गदर्शन का महत्व बना रहता है।

गांव में रोजगार की संभावना

खेती में विविधता का असर केवल किसान की आमदनी तक सीमित नहीं रहता। इससे बुवाई, देखभाल, कटाई और उपज की बिक्री से जुड़े काम भी बढ़ सकते हैं। चंद्रशेखर के प्रयोगों से गांव में रोजगार के नए अवसर बनने की संभावना सामने आई है।

पहाड़ी क्षेत्रों से रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन लंबे समय से चुनौती रहा है। ऐसे में गांव लौटकर खेती शुरू करने वाले लोगों के अनुभव महत्वपूर्ण हैं। वे स्थानीय जमीन और संसाधनों का उपयोग करके नए रास्ते तलाश सकते हैं।

रंगीन सब्जियों और विशेष अनाज की खेती किसानों को बाजार की नई जरूरतों से जोड़ सकती है। शहरों में कुछ उपभोक्ता अलग किस्मों की सब्जियां और अनाज खरीदना पसंद करते हैं। होटल और रेस्तरां भी कुछ विशेष उत्पादों के खरीदार हो सकते हैं।

हालांकि केवल नई फसल उगाना पर्याप्त नहीं है। किसान को यह भी समझना होता है कि उसकी उपज कौन खरीदेगा। नियमित खरीदार, सही भंडारण और उचित परिवहन से बिक्री में मदद मिल सकती है।

चंद्रशेखर की कहानी दूसरे किसानों को प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। फिर भी किसी नई फसल को बड़े क्षेत्र में लगाने से पहले छोटे स्तर पर परीक्षण करना समझदारी होगी।

पहाड़ी किसानों के लिए सीख

चंद्रशेखर पांडेय का सफर खेती में बदलाव की संभावनाओं को सामने लाता है। उन्होंने नौकरी के बाद गांव लौटकर खाली पड़ी पुश्तैनी जमीन का इस्तेमाल शुरू किया। अब वे पारंपरिक फसलों के साथ कई नई किस्में भी उगा रहे हैं।

उनका अनुभव बताता है कि फसल विविधीकरण पहाड़ी खेती में उपयोगी विकल्प हो सकता है। गुलाबी और पीली गोभी जैसे प्रयोग किसानों को नई बाजार मांग समझने का अवसर देते हैं। काले धान और काले गेहूं की खेती भी उनके कृषि मॉडल का हिस्सा है।

हालांकि, इस मॉडल को अपनाने से पहले लागत और संभावित बिक्री का हिसाब जरूरी है। बीज, मजदूरी, सिंचाई और परिवहन पर होने वाला खर्च समझना चाहिए। किसानों को स्थानीय खरीदारों से संपर्क करके बाजार की स्थिति भी जाननी चाहिए।

चंद्रशेखर की उपलब्धि का महत्व सिर्फ नई फसलें उगाने में नहीं है। उनका प्रयास पहाड़ी जमीन को उपयोग में लाने और खेती के विकल्प बढ़ाने से जुड़ा है। आने वाले समय में उनकी नई फसलों की पैदावार और बाजार से जुड़े नतीजे भी महत्वपूर्ण होंगे।

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