किसान की बात,सूत्र के साथ

मध्यप्रदेश का सोयाबीन देश के साथ विदेशी बाजारों में भी बना रहा पहचान : डॉ. मोहन यादव

newz@gmail.com | Oct 20, 2026, 11:48 IST

मध्यप्रदेश का सोयाबीन अब वैश्विक बाजारों में पहचान बना रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के अनुसार, राज्य में देश के 45% सोयाबीन क्षेत्र में खेती होती है और राष्ट्रीय उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 35% से अधिक है। सरकार भावांतर भुगतान, खाद्य प्रसंस्करण और उद्योगों में निवेश के जरिए किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दे रही है।

सोयाबीन

मध्यप्रदेश का सोयाबीन अब खेतों तक सीमित नहीं है। यह देश और दुनिया के बाजारों में अपनी पहचान बना रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सोयाबीन राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे किसानों की कमाई के साथ उद्योगों को भी बढ़ावा मिल रहा है। मुख्यमंत्री के अनुसार, प्रदेश में सोयाबीन का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। यह फसल किसानों की मेहनत और आमदनी से सीधे जुड़ी है। इससे खाद्य तेल और प्रोटीन आधारित उत्पाद भी तैयार होते हैं। इसलिए सोयाबीन का महत्व खेती से आगे बढ़कर उद्योगों तक पहुंचता है।

राज्य सरकार का कहना है कि किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाना प्राथमिकता है। इसके लिए खेती की बुनियादी सुविधाओं से लेकर बाजार तक काम किया जा रहा है। खाद, बीज, बिजली और पानी की बेहतर व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही, उत्पादों के प्रसंस्करण और बाजार विस्तार को भी महत्व दिया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि दुनिया में पोषण आधारित खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ रही है। ऐसे में मध्यप्रदेश के पास नए अवसर हैं। राज्य में खाद्य उत्पादन और प्रसंस्करण से जुड़ा मजबूत तंत्र मौजूद है। इसका लाभ किसानों और उद्योगों को मिल सकता है।

देश के सोयाबीन उत्पादन में हिस्सा

मध्यप्रदेश सोयाबीन उत्पादन के लिहाज से देश के प्रमुख राज्यों में शामिल है। मुख्यमंत्री के अनुसार, देश में सोयाबीन की कुल खेती का 45 प्रतिशत क्षेत्र मध्यप्रदेश में है। राष्ट्रीय उत्पादन में राज्य की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।

प्रदेश के 50 से अधिक जिलों में सोयाबीन उगाया जाता है। इससे पता चलता है कि यह फसल राज्य के कई कृषि क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। खासकर मालवा क्षेत्र को सोयाबीन उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

सोयाबीन केवल खेत से मिलने वाली उपज नहीं है। इससे खाद्य तेल, प्रोटीन आधारित खाद्य सामग्री और औद्योगिक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। प्रसंस्करण से उपज की उपयोगिता बढ़ती है। इससे कृषि आधारित कारोबार और रोजगार के नए अवसर बन सकते हैं। हालांकि, उत्पादन में बड़ी हिस्सेदारी होने से हर किसान को अपने आप बेहतर कीमत नहीं मिलती।

किसानों की आमदनी बाजार भाव, उत्पादन लागत और उपज की गुणवत्ता पर भी निर्भर करती है। इसलिए उत्पादन के साथ सही मूल्य और बाजार तक पहुंच भी जरूरी है।

भावांतर योजना से किसानों को राहत

सोयाबीन किसानों को उचित कीमत दिलाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने भावांतर योजना शुरू की थी। इसकी शुरुआत अक्टूबर 2025 में हुई थी। इस योजना का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने में मदद करना है। जानकारी के अनुसार, पिछले साल करीब 7 लाख 17 हजार सोयाबीन उत्पादक किसानों के खातों में भावांतर राशि भेजी गई। इसके तहत कुल 1,475 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया। इससे बड़ी संख्या में किसानों को योजना का लाभ मिला।

भावांतर व्यवस्था का महत्व तब बढ़ जाता है, जब मंडी में मिलने वाला भाव निर्धारित स्तर से कम हो। ऐसी स्थिति में योजना के नियमों के अनुसार पात्र किसानों को अंतर की राशि दी जा सकती है। हालांकि, भुगतान योजना की शर्तों और पात्रता पर निर्भर करता है।

राज्य सरकार ने इस वर्ष भी पंजीयन की व्यवस्था करने की बात कही है। किसानों को इसके लिए आधिकारिक निर्देशों पर ध्यान देना चाहिए। पंजीयन, उपज बिक्री और जरूरी दस्तावेजों से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी होगा।

वर्ष 2025-26 के लिए सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,328 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह दर है, जिसे सरकार कृषि उपज के लिए घोषित करती है। भावांतर योजना और समर्थन मूल्य की व्यवस्था अलग-अलग हैं। इसलिए किसानों को दोनों के नियमों को समझकर ही लाभ की स्थिति देखनी चाहिए।

खाद्य प्रसंस्करण से बढ़ेगी कमाई

मुख्यमंत्री डॉ. यादव का कहना है कि सोयाबीन की असली ताकत उससे बनने वाले उत्पादों में भी है। खेत से निकली उपज जब उद्योगों तक पहुंचती है, तो उसका प्रसंस्करण किया जाता है। इससे खाद्य तेल और प्रोटीन आधारित उत्पाद बनाए जा सकते हैं।

प्रसंस्करण से उपज का मूल्य बढ़ाने के अवसर मिलते हैं। इससे कृषि उत्पादों को अलग-अलग बाजारों में पहुंचाना भी आसान हो सकता है। राज्य सरकार सोयाबीन से जुड़ी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और संबंधित उद्योगों को प्रोत्साहित कर रही है।

सरकार की ओर से ऐसे उद्योगों को सब्सिडी देने की व्यवस्था भी बताई गई है। इसका उद्देश्य प्रदेश में निवेश बढ़ाना और कृषि आधारित उद्योगों का विस्तार करना है। इससे किसानों के लिए बाजार के विकल्प बढ़ सकते हैं। उद्योगों को कच्चा माल मिलने के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

हालांकि, उद्योगों के विस्तार का लाभ किसानों तक पहुंचना जरूरी है। इसके लिए उपज की खरीद, गुणवत्ता, भुगतान और बाजार की मांग महत्वपूर्ण हैं। प्रसंस्करण इकाइयों की संख्या बढ़ने के साथ किसानों को बेहतर खरीद विकल्प मिल सकते हैं। लेकिन इसका वास्तविक असर स्थानीय परिस्थितियों और कारोबार की जरूरतों पर निर्भर करेगा।

वैश्विक बाजारों तक पहुंच पर जोर

मध्यप्रदेश सरकार सोयाबीन उत्पादों को देश और विदेश के बाजारों तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। इसके लिए उत्पादन, प्रसंस्करण, गुणवत्ता और आधुनिक तकनीक पर ध्यान दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री के अनुसार, इन प्रयासों से किसानों की समृद्धि और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।

विदेशी बाजारों में मांग बढ़ने से कृषि उत्पादों के लिए नए अवसर बन सकते हैं। लेकिन निर्यात के लिए गुणवत्ता के मानकों का पालन करना जरूरी है। उत्पाद की कीमत, उपलब्ध मात्रा और बाजार की जरूरत भी अहम होती है।

सोयाबीन के मामले में खाद्य तेल और प्रोटीन आधारित उत्पाद महत्वपूर्ण हैं। इनका इस्तेमाल खाद्य उद्योग में होता है। बेहतर तकनीक से उत्पादन और प्रसंस्करण की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल सकती है। इससे कारोबार को नए बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिलता है।

राज्य सरकार सोयाबीन से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधान को भी प्रोत्साहित करना चाहती है। आधुनिक तकनीक और निवेश के जरिए उद्योगों को मजबूत बनाने की योजना है। इससे खेती और प्रसंस्करण के बीच बेहतर तालमेल बन सकता है।

फिर भी वैश्विक बाजारों में पहचान बनने का अर्थ यह नहीं है कि हर किसान को तुरंत अधिक कीमत मिलेगी। इसका लाभ उपज की गुणवत्ता, खरीद व्यवस्था और बाजार तक पहुंच पर निर्भर करेगा। किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए इन सभी कड़ियों का मजबूत होना जरूरी है।

किसानों और उद्योगों को लाभ

सोयाबीन की खेती मध्यप्रदेश में लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ी है। इसके साथ खाद्य तेल और अन्य उत्पाद बनाने वाले उद्योग भी जुड़े हैं। इसलिए इस क्षेत्र में सुधार का असर खेती और कारोबार, दोनों पर पड़ सकता है।

यदि प्रसंस्करण इकाइयों को पर्याप्त कच्चा माल मिलता है, तो उनका काम बढ़ सकता है। इससे परिवहन, भंडारण और दूसरे संबंधित कामों में भी अवसर बन सकते हैं। हालांकि, रोजगार में वास्तविक बढ़ोतरी का आकलन करने के लिए आंकड़ों की जरूरत होगी।

किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात उपज का उचित मूल्य है। उत्पादन बढ़ने के साथ खरीद की व्यवस्था भी बेहतर होनी चाहिए। समय पर भुगतान और बाजार की जानकारी किसानों के फैसलों को प्रभावित करती है। भावांतर योजना इसी दिशा में सरकार का एक कदम है।

सरकार का लक्ष्य सोयाबीन को केवल कच्ची कृषि उपज तक सीमित नहीं रखना है। उससे तैयार होने वाले उत्पादों और उद्योगों को भी बढ़ावा देना है। इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका मजबूत हो सकती है।

आने वाले समय में योजना का असर समझने के लिए किसानों को मिले भुगतान, उद्योगों में निवेश और बाजारों में बिक्री के आंकड़े देखना जरूरी होगा। इससे पता चलेगा कि सरकारी प्रयासों का लाभ कितनी दूर तक पहुंच रहा है।

आगे क्या है सरकार की योजना?

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि सरकार किसानों की आय बढ़ाने और कृषि आधारित उद्योगों को मजबूत करने के लिए काम कर रही है। इसके तहत खाद, बीज, बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के प्रयास जारी हैं।

सोयाबीन से जुड़े उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए प्रसंस्करण, तकनीक और निवेश पर जोर है। वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने की भी बात कही गई है। इन प्रयासों का उद्देश्य उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी व्यवस्था को मजबूत करना है।

किसानों के लिए भावांतर योजना और बेहतर बाजार व्यवस्था महत्वपूर्ण रहेंगी। वहीं, उद्योगों के लिए गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी कीमत जरूरी होंगी। इन दोनों पक्षों के बीच तालमेल बनने पर सोयाबीन क्षेत्र को लंबे समय में लाभ मिल सकता है।

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