BHOPAL. मध्य प्रदेश के किसानों हर साल मानक खाद, सर्टिफाइड बीज और असरदार कीटनाशक दवाओं के नाम पर ठगा जा रहा है। किसानों को “गुणवत्तापूर्ण खाद” और “सर्टिफाइड या फाउंडेशन बीज” के नाम पर नकली सामान थमा दिया जाता है। जबकि उनसे बदले में असली खाद, बीज और कीटनाशक की कीमत वसूली जाती है। मध्य प्रदेश में खाद और बीज का सालाना कारोबार 13 से 14 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा है। वहीं अमानक खाद- बीज और कीटनाशकों की वजह से किसान की फसलें प्रभावित होती हैं। नतीजा हर साल किसानों के हाथ मुनाफे की जगह घाटा ही आता है।
मध्य प्रदेश में कृषि विभाग हर साल औसत कीमत निर्धारित तो करता है लेकिन उसका असर बाजार पर नहीं दिखता। प्रदेश में सर्टिफाइड, फाउंडेशन और सामान्य बीज का कारोबार करीब 3 हजार करोड़ का है। 65 लाख हैक्टेयर यानी 160 एकड़ में खेती होती है। जिसके लिए हर साल रबी और खरीफ सीजन में करीब 40 लाख क्विंटल सर्टिफाइड और फाउंडेशन बीज की जरूरत होती है। इसमें से 7 लाख क्विंटल बीज राज्य सहकारी बीज उत्पादक एवं विपणन संघ द्वारा वितरित किया जाता है। वहीं इससे पांच गुना बीज निजी दुकानों से बेंचा जाता है।
सिस्टम से व्यापारी को फायदा, किसानों से छल
किसान संगठनों का कहना है मध्य प्रदेश में कृषि और सहकारिता विभाग की खाद और बीज वितरण की व्यवस्था व्यापारियों के इशारे पर तय होती है। सीजन से ठीक पहले तक विभाग के आंकड़ें खाद और बीज की पर्याप्त उपलब्धता का दावा करते हैं। जिलावार डेटा भी जारी किया जाता है। जब किसानों की संख्या और जमीन का रकबा पहले से तय है फिर हर साल खाद का संकट और बीज की कमी कैसे आ जाती है। खाद और बीज को कोई भी किसान जमा नहीं करता, फिर पर्याप्त बताया जाने वाले खाद और बीज कहां चला जाता है। किसान नेताओं का आरोप है कि विभाग की व्यवस्था से हर बार केवल व्यापारियों को फायदा होता है। अधिकारी फाइलों पर लक्ष्य पूरा दर्शाकर खुश हो जाते हैं, किसान के हिस्से में परेशानी और घाटा ही आता है। दशकों से सरकारें बदली, नेताओं ने दावे किए लेकिन किसान हर बार छला गया है।
10 हजार करोड़ पहुंचा खाद का कारोबार
एमपी में रासायनिक उर्वरक यूरिया, डीएपी और एनपीके का सालाना कारोबार 8,000 करोड़ से 10,000 करोड़ तक है। खरीफ सीजन में यूरिया की मांग करीब साढ़े 9 लाख मीट्रिक टन है वहीं डीएपी की माग लगभग 3.6 लाख मीट्रिक टन होती है। इसके अलावा एनपीके और अन्य उर्वरक की मांग 3 से 4 लाख मीट्रिक टन के आसपास है। वहीं रबी सीजन मेंयह मांग बढ़कर जाती है। गेहूं की उपज के लिए नाइट्रोजन की जरूरत के चलते इस सीजन में यूरिया की मांग करीब 12 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचती है। जबकि 4 से 4.5 लाख मीट्रिक टन डीएपी की डिमांड होती है। यूरिया की एक बोरी करीब 250 रुपए जबकि डीएपी की बोरी 1400 रुपए के आसपास मिलती है। खाद की किल्लत के दौर में दुकानदार इनके लिए ज्यादा कीमतें वसूलते हैं।
तैयारी के बावजूद क्यों नहीं मिलता खाद- बीज
सर्टिफाइड और फाउंडेशन बीज तैयार कर किसानों तक पहुंचाने के लिए मध्य प्रदेश में 1,750 से अधिक प्राथमिक बीज सहकारी समितियां पंजीकृत हैं। कृषि विभाग के पास हर जिले की फसल का रकबा पहले से होता है। इसी के आधार पर अलग- अलग फसलों के बीज की मात्रा भी विभाग के रिकॉर्ड में रखी जाती है। बावजूद इसके हर साल रबी और खरीफ सीजन में अच्छे बीज की किल्लत खड़ी होती है। नतीजा किसानों को डेढ़ से दो गुना कीमत चुकाकर बीज खरीदना पड़ता है। विभाग की सारी तैयारी के बाद भी किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज वाजिब कीमत पर न मिलना भी अधिकारियों की मंशा पर सवाल खड़े करता है। वहीं बीज उत्पादन का लाइसेंस लेने वाली प्राथमिक संस्थाओं का बीज आखिर सहकारी समितियों की जगह कहां जाता है यह भी जांच का विषय है। किसानों का आरोप है कि अधिकारी और व्यापारियों की मिलीभगत के कारण ही सीजन में कृत्रिम रूप से बीज की कमी दिखाई जाती है। जिससे हड़बड़ाकर किसान बाजार से मंहगा बीज खरीदने मजबूर होते हैं।
कीटनाशकों की कीमतों पर नहीं कंट्रोल
कृषि प्रधान मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था का 47 फीसदी हिस्सा खेती पर निर्भर है। इसके बावजूद सरकार और कृषि विभाग का खाद, बीज और पेस्टीसाइड की कीमतों पर कंट्रोल नहीं है। प्रदेश में अमानक खाद और कीटनाशकों का बड़ा बाजार है। यूरिया, डीएपी जैसे उर्वरक और कीटनाशक का अनुमानित सालाना कारोबार 10 से 12 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। पेस्टीसाइड, हर्बीसाइड का बाजार ही 2 हजार करोड़ से ज्यादा का है। वहीं उर्वरक का कारोबार 8 से 10 हजार करोड़ तक है। इसके बावजूद अमानक कीटनाशक और घटिया खाद से लुट रहे किसानों को बचाने कृषि विभाग पर कारगर योजना तक नहीं है। इसी वजह से घटिया कीटनाशक और खाद निर्माता करोड़ों कमा रहे हैं, वहीं किसान ठगी का शिकार होने के साथ ही घाटा उठा रहे हैं।
अमानक कीटनाशक से बर्बाद हुई फसल
- रायसेन, सागर, धार, देवास और विदिशा जिलों में अगस्त 2025 में अमानक ‘क्लोरीम्यूरॉन-इथाइल’ खरपतवारनाशक के छिड़काव से सोयाबीन की फसलें झुलस गई थी। जांच के बाद अमानक दवा बनाने वाली कंपनी एचपीएम केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड और उसके डीलर सुप्रीम एग्रो ओवरसीज सागर के खिलाफ केस दर्ज किया गया था।
- उज्जैन संभाग में 2023 में किसान दिनेश कामदार ने कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशक का छिड़काव किया था। खेत में बाराजाइड कीटनाशक का छिड़काव करने से उनकी फसल मुरझाकर खराब हो गई थी। दिनेश ने इसकी शिकायत कृषि विभाग में दर्ज कराई जिसके बाद जांच में दवा सब स्टैंडर्ड पाई गई थी।
- हरदा जिले में 2020 में फसल में अमानक फंगीसाइड के छिड़काव ने कई किसानों की फसल बर्बाद कर दी थी। इन किसानों ने विज़न ऑर्गेनिक्स ब्रांड का ‘सवेरा फंगीसाइड पाउडर का छिड़काव किया था। जो पावडर किसानों को बेंचा गया वह एक्सपायरी डेट से बाहर हो चुका था। इसको लेकर मामला उपभोक्ता फोरम में पहुंचा थो। जहां से किसानों को मुआवजा देने के आदेश कंपनी को दिए गए थे।
- ग्वालियर-चंबल संभाग में 2022 में अमानक कीटनाशकों ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया था। ग्वालियर, भिंड और मुरैना जिलों के किसानों को दुकानों से बिना लाइसेंस के कीटनाशक थमाए गए थे। बाजरा, ज्वार की फसलें खराब होने के बाद किसानों की शिकायत पर कृषि विभाग द्वारा ग्वालियर में कई दुकानों को सील कर स्टॉक जब्त किया गया था।
- एचपीएम केमिकल्स कंपनी के अमानक और घटिया कीटनाशक व फर्टिलाइजर बाजार में उतारे जाने से बीते सालों में कई किसानों को नुकसान उठाना पड़ा है। कंपनी के अमानक उत्पादों की शिकायतों के चलते कंपनी पर कार्रवाई की गई बल्कि अन्य कंपनी के उत्पादों की जांच भी कराई जा रही है।
लूपहोल से भरी है कृषि विभाग की कार्रवाई
मध्य प्रदेश में किसानों को मंहगे कीटनाशक, खरपतवार बेंचने वाली कंपनियों पर कार्रवाई सुस्त है। कार्रवाई के प्रावधान भी कमजोर हैं, जिससे कीटनाशक निर्माता और डीलर मुनाफे के लालच में इसे अनदेखा करते हैं। प्रदेश में सब स्टैंडर्ड एग्रो कैमिकल्स उत्पाद निर्माताओं को सीधे तौर पर ब्लैकलिस्ट नहीं किया जाता। बल्कि शिकायत सामने आने पर केवल संबंधित बैच के लाइसेंस रद्द करने या स्टॉक की बिक्री पर रोक लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराने का चलन हैं। इस वजह से फसल बर्बाद होने के बाद किसानों को कोई राहत नहीं मिलती बल्कि कंपनी से भरपाई के लिए उन्हें उपभोक्ता फोरम में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
पांच साल में सैंकड़ों कीटनाशक मिले अमानक
बीते 5 साल में एमपी में कीटनाशक और खरपतवारनाशक अमानक होने की हजारों शिकायत कृषि विभाग और प्रशासन तक पहुंची हैं। इनके आधार पर हुई जांच में सैंकड़ों सैंपलों से दवा अमानक होने की पुष्टि होने के बावजूद सख्त कार्रवाई नहीं हुई। पांच सालों में सैंकड़ों दवा सैंपल सब स्टैंडर्ड पाए जाने के बावजूद 200 कीटनाशक निर्माता और विक्रेताओं को चिन्हित कर बैच लाइसेंस रद्द या निलंबित किए गए। कुछ मामलों में आपराधिक केस भी दर्ज कराए गए।
एमपी में धड़ल्ले से बन रहे नकली कीटनाशक
मध्य प्रदेश में कीटनाशक और खरपतवारनाशक दवाओं का बड़ा बाजार है। करोड़ों रुपए के कारोबार से मुनाफे कमाने के लिए बड़े ब्रांड की नकली दवाएं बनाने वाले गिरोह भी सक्रिय हैं। किसानों की शिकायत के बाद मई 2026 में कृषि विभाग की टीम ने देवास के नाहर दरवाजा क्षेत्र से भारी मात्रा में कीटनाशक जब्त किए थे। गुणवत्ताहीन कीटनाशी रसायनों को ब्रांडेड कंपनी के डिब्बों में पैक पर बाजार में खपाया जा रहा था। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और कृषि विभाग द्वारा इंडोसल्फान, मिथाइल पैराथ्रिआन, फॉस्फेमिडॉन और कार्बोफ्युरान जैसे रसायनों पर प्रतिबंध लगाया है। इसके बावजूद कीटनाशकों में इन अमानक रसायनों का उपयोग जारी है और कीटनाशक विक्रेता इन्हें बेंच रहे हैं।
