ब्यावर के आनंद का मामला
ब्यावर जिले की तहसील मसूदा की ग्राम पंचायत नयागांव की डांग की ढाणी के परिवार का आनंद छीन लिया। मगरा विकास बोर्ड क्षेत्र के आनन्द पुत्र सुक्खा के परिवार में जीविकोपार्जन में कोई भी सदस्य सक्षम नहीं है। उसके पांच भाइयों के पास कुल दस बीघा कृषि भूमि है, जिसमें से दो बीघा ही उसके पास है। उन पांच भाइयों की वृद्ध मां 75 वर्षीय है। उसके परिवार में चार बेटी दो बेटे हैं, जिनमें से दो बेटियां अपने-अपने ससुराल में हैं। दो बेटियां छोटी 6 एवं बड़ी 8 वर्ष की है, दो बेटों में से वयस्क मंदबुद्धि है, दूसरा अवयस्क है।
भरतपुर-ब्यावर भारतमाला परियोजना के अंतर्गत उसकी कृषि भूमि के अधिग्रहण के समाचार से वह अवसाद में आ गया। उसे कोई सहारा दिखाई नहीं दिया। इसी से उसने समय पूर्व अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। उसके परिवार वालों की कमजोर स्थिति को देखते हुए गांव वालों ने उसका अंतिम संस्कार रोक दिया तब उपखंड अधिकारी गांव में पहुंचीं।
उन्होंने पूर्व से चल रही सरकारी योजनाओं के अंतर्गत सहायता दिलाने का आश्वासन भी दिया। ग्रामीण जनों ने उसके परिवार के पालनार्थ जिला कलेक्टर से उनके कार्यालय में जाकर विनती की, लेकिन जिला कलेक्टर ने इसे आत्महत्या का प्रकरण होने से किसी प्रकार की सहायता देना संभव नहीं बताया।
सहायता पर सवाल
देश में आत्महत्या करने वाले के आश्रित परिवारों के लिए सहायता देने की योजनाएं बनाई गई हैं। पिछले पांच वर्षों में राजस्थान में आत्महत्या करने वाले किसानों को 10 लाख रुपए तक की सहायता दी गई, जिसका एक उदाहरण दूदू तहसील के गांव उदयपुरिया के गणेश जावलिया के आश्रितों को दी गई आर्थिक सहायता है।
इन दोनों प्रकरणों में इतना ही अंतर है कि दूदू में सहायता प्राप्त होने तक किसानों का धरना चल रहा था, किंतु आनंद के गांव में जागरूकता का अभाव एवं आर्थिक रूप से कमजोरी के कारण इस प्रकार का धरना आयोजित नहीं हो सका। इसलिए उसे किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हो सकी। इस प्रकार के अनेक अन्य उदाहरण भी हैं।
संविधान में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा होते हुए भी सरकार कानों में तेल डालकर बैठ गई। इस संबंध में राजस्थान के किसानों की ओर से किसान महापंचायत ने मुख्यमंत्री तक को पत्र भेजकर आग्रह भी किया, किंतु परिणाम ढाक के तीन पात जैसा ही रहा। सरकारों का दबाव के आधार पर ही सहायता उपलब्ध करने का स्वभाव बन गया। न्यायोचितता जैसे शब्द पुस्तकों की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित रह गए।
देश में घटती कृषि भूमि
देश में कृषि क्षेत्र प्राथमिक आर्थिक गतिविधि है, इसके साथ ही देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका का आधार है। पिछले पांच वर्षों में भारत के कृषि योग्य भूमि के क्षेत्रफल में 8,38,000 हेक्टेयर की कमी हुई। इसी अवधि में राजस्थान में 31,000 हेक्टेयर कृषि भूमि में कमी आई।
वर्तमान में देश की कृषि भूमि का औसत आकार 1.08 हेक्टेयर है। पारिवारिक बंटवारे के कारण यह आकार निरंतर घट रहा है। किसान परिवारों में कृषि भूमि को बचाकर रखना प्रतिष्ठा का प्रतीक है। इसलिए पेट में गांठ देकर भी किसानों की एक पीढ़ी ने कृषि भूमि में बढ़ोतरी को लक्ष्य पर रखा। इसी दिशा में उत्तम खेती की धारणा स्थापित हुई।
देश की समृद्धि के लिए ‘जन, जल, जमीन, जंगल, जानवर’ आधार स्तंभ निरूपित किया गया। इसके विपरीत पाश्चात्य सभ्यता की चमचमाहट के अंधानुकरण के कारण सीमेंट, कंक्रीट, रोड़ी जैसे कार्यों को विकास स्वीकार कर लिया। इसके लिए विदेशी निवेश को साध्य समझ लिया। ये नीतियां पूंजीपतियों के लिए अनुकूल रहती है।
भूमि अधिग्रहण में कंपनियों की भूमिका
भूमि अधिग्रहण के लिए सर्वेक्षण एवं “भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013” एवं उसकी क्रियान्वित के लिए राज्य में निर्मित “राजस्थान भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार नियम, 2016” में विहित प्रक्रियाओं को पूर्ण कराने का कार्य कंपनियों को सौंपा जा रहा है। व्यवहार में ये कंपनियां शासन प्रशासन को अपने अनुसार चलाने में सफल प्रतीत हो रही है।
उनके सीधे संबंध उच्च स्तर पर रहने के कारण वे जिला स्तर के अधिकारियों को आदेशित निर्देशित करती रहती है। ईसरदा बांध के निर्माण के लिए खड़ी फसलों को चौपट कर मिट्टी लेने के लिए जिला प्रशासन टोंक ने किसानों को उनकी फसलों की क्षतिपूर्ति राशि चुकाने का विश्वास दिलाया था। किसानों ने तो अपने वचन को पूरा किया किंतु कंपनी वह मूल्य चुकाने से पीछे हट गई।
जिला प्रशासन कंपनी के सामने असहाय बन गया, किसानों को अपनी फसलों के मूल्य से वंचित रहना पड़ा, सामान्यतया कंपनियों की इस प्रकार की ही कार्यप्रणाली है। इसी का परिणाम है कि पारदर्शिता के अधिकार को पीछे धकेलते हुए अधिग्रहण की कार्यवाही दुराव छिपाव के आधार पर औपचारिकताओं की पूर्ति के लिए की जा रही है।
कृषि जोतों का आकार छोटा होने के कारण किसान परिवार विस्थापित होकर उजड़ने की स्थिति में होने पर भी विस्थापन नहीं माना जा रहा है। किसानों द्वारा किए जाने वाले विरोध का संज्ञान भी नहीं लिया जा रहा है। अधिग्रहण के संबंध में सामाजिक प्रभाव के अध्ययन से स्वतंत्र निकाय बहु-शाखीय विशेषज्ञता प्राप्त समूह को पंगु बना रखा है। यमुना जल संग्रहण के लिए सरकारी भूमि उपलब्ध होते हुए भी चूरू जिले के हासियावास बांध के लिए आठ गांवों की कृषि भूमियों का अधिग्रहण किया जा रहा है। हरियाणा के हथिनी कुंड से चूरू जिले के हासियावास तक पाइपलाइन की लंबाई 295 किलोमीटर आकलित की गई है।
खुली नहर बनाम पाइपलाइन
भरतपुर जिले के बंध बरेठा तक पानी पहुंचाने के लिए 189 किलोमीटर लंबी ईसरदा बांध से खुली नहर के लिए सवाईमाधोपुर, दौसा, टोंक, करौली, भरतपुर पांच जिलों में 13 तहसीलों के सौ गांवों की 11,404 बीघा कृषि भूमि का अधिग्रहण प्रक्रियाधीन है। बंध बरेठा में पानी की आवक गंभीर नदी से होती आई है, ईसरदा बांध से गंभीर नदी को जोड़ने से प्राकृतिक बहाव का उपयोग भी श्रेष्ठ विकल्प हो सकता है। इस उच्च प्रौद्योगिकी समय में पाइपलाइन द्वारा पानी पहुंचाने के विकल्प का चयन नहीं करना आश्चर्यजनक है।
यह स्थिति तो तब है जब अन्य अनेक योजनाओं के साथ यमुना नदी के हथिनी कुंड से चूरू के हासियावास तक पानी पाइप लाइन के द्वारा पहुंचाने के लिए योजना को मूर्त रूप दिया जा रहा है। ये दोहरे मापदंड भेदभाव एवं पक्षपात का प्रतीक है।
इसी प्रकार की स्थिति “कोटपूतली से किशनगढ़ ग्रीन फील्ड एक्सप्रेसवे” की है, जहां समानांतर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 48 की सड़क तथा रेल मार्ग होते हुए भी भूमि अधिग्रहण के प्रयास किये जा रहे हैं। कमोवेश ऐसी स्थिति ‘भरतपुर ब्यावर भारतमाला परियोजना’ की है। ऐसी परियोजनाओं में प्रभावी व्यक्तियों की भूमियों को बचाते हुए आर्थिक रूप से कमजोर एवं शासन प्रशासन तक पहुंच से विरत असहायों की आजीविका छीनना सरकारों की नियति बन चुकी है।
इन परियोजनाओं पर होने वाला भारी भरकम व्यय राजनेता, अधिकारी तंत्र एवं धनपतियों के लिए आकर्षक बना हुआ है। वे येन-केन प्रकारेण अपनी पूंजी में बढ़ोतरी के लिए लोक प्रयोजन के नाम पर इस प्रकार के खेल खेलते रहते हैं। इसीलिए जनता की ओर से इस प्रकार की योजनाओं की आवश्यकताओं का आग्रह नहीं होते भी जनता की मांग के नाम पर उनकी आवश्यकता प्रतिपादित करने में अपने प्रभाव एवं धन शक्ति का उपयोग करते रहते हैं।
भारतीय संविधान की अवधारणा के अनुसार बनी लोक कल्याणकारी सरकारों के द्वारा भूमि अधिग्रहण के कारण किसानों में हाहाकार मचा हुआ है। जन भावनाओं के आधार पर योजनाएं तैयार करने का मंतव्य सरकारों की कार्यप्रणाली से गधे के सिर पर सींगों की भांति लुप्त हो रहा है। यह लोक के विचार हेतु गंभीर विषय है। इसी से ही तंत्र से रक्षा संभव है।
लेखक- रामपाल जाट, राष्ट्रीय अध्यक्ष किसान महापंचायत
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