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छत्तीसगढ़ के किसान रामलाल ने बकरी पालन से बदली अपनी जिंदगी, सालाना कमाई पहुंची एक लाख रुपए

newz@gmail.com | Oct 15, 2026, 13:22 IST

छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के सुरही गांव के रामलाल लकड़ा ने बकरी पालन से अपनी आमदनी बढ़ाई। करीब दस साल पहले शुरू हुआ उनका काम अब 185 बकरियों तक पहुंच गया है। वे सालाना करीब एक लाख रुपए कमाते हैं।

बकरी पालन

मुंगेली के किसान रामलाल लकड़ा की कहानी प्रेरणा देती है। उन्होंने बकरी पालन को अपनी आजीविका का मुख्य जरिया बनाया। आज उनका काम आसपास के किसानों के लिए सीख बन गया है। रामलाल सुरही गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने करीब दस साल पहले बकरी पालन शुरू किया था। उस समय उनके पास बकरियां कम थीं। संसाधन भी सीमित थे। लेकिन उन्होंने इस काम को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया।

आज रामलाल के पास कुल 185 बकरियां हैं। यह बदलाव एक दिन में नहीं हुआ। इसके पीछे लगातार देखभाल और मेहनत शामिल है। उन्होंने उपलब्ध स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया। इससे उन्हें शुरुआत में महंगे इंतजामों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। रामलाल का अनुभव बताता है कि पशुपालन छोटे किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकता है। खासकर उन परिवारों के लिए, जिनके पास खेती की जमीन सीमित है। हालांकि, सफलता के लिए नियमित देखभाल और सही प्रबंधन जरूरी है।

बकरी पालन से कितनी कमाई?

रामलाल के मुताबिक, बकरी पालन से उन्हें सालाना करीब एक लाख रुपए की आमदनी होती है। इस कमाई से वे बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। घर की रोजमर्रा की जरूरतें भी पूरी होती हैं। इसके बाद वे कुछ बचत भी कर पाते हैं। उनका कहना है कि बकरियों की बाजार में मांग बनी रहती है। इससे जरूरत के समय पशु बेचने का विकल्प मिलता है।

उनकी कहानी बताती है कि बकरी पालन परिवार की आय में योगदान दे सकता है। छोटे स्तर से शुरुआत करने वाले किसान अपने अनुभव के साथ काम बढ़ा सकते हैं। इसके लिए पहले स्थानीय बाजार और उपलब्ध संसाधनों को समझना जरूरी है।

स्थानीय चारे से संभाला काम

रामलाल बताते हैं कि बकरी पालन के लिए उन्हें महंगे संसाधनों की जरूरत नहीं पड़ी। वे गांव में उपलब्ध प्राकृतिक चारे और संसाधनों का उपयोग करते हैं। इससे पशुओं को पालने में स्थानीय साधनों की भूमिका बनी रहती है।

हालांकि, केवल चारा उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है। बकरियों की उम्र और जरूरत के अनुसार भोजन देना जरूरी है। साफ पानी और सुरक्षित जगह भी उनकी देखभाल का हिस्सा हैं।

रामलाल के अनुभव में पशुओं की सेहत सबसे महत्वपूर्ण है। समय पर चारा देना और नस्ल सुधार पर ध्यान देना भी जरूरी है। ये काम नियमित रूप से करने पड़ते हैं। लापरवाही होने पर पशुओं की सेहत और कमाई दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

नए पशुपालकों को शुरुआत में अपने संसाधनों का आकलन करना चाहिए। उन्हें यह देखना चाहिए कि चारा कहां से मिलेगा। पशुओं के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध है या नहीं। बीमारी की स्थिति में पशु चिकित्सक तक पहुंच भी जरूरी है।

बीमारी से बचाव कैसे करें?

रामलाल बकरियों की साफ-सफाई और स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं। उनके मुताबिक, समय पर टीकाकरण से बीमारी का खतरा कम करने में मदद मिलती है। नियमित कृमि-नाशक दवा और पशु चिकित्सक से जांच भी जरूरी है।

उनके बाड़े में बकरियों के लिए अलग छायादार शेड बनाया गया है। इससे गर्मी और बारिश के दौरान पशुओं को सुरक्षा मिलती है। मौसम के अनुसार आश्रय की व्यवस्था करना पशुपालन का अहम हिस्सा है।

बकरियों के रहने की जगह साफ और हवादार होनी चाहिए। गंदगी और नमी से कई स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं। बीमार पशु दिखाई देने पर उसे अलग रखना उपयोगी हो सकता है। इलाज और दवा के लिए पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।

टीकाकरण का समय और दवा की मात्रा स्थानीय पशु चिकित्सक से तय करानी चाहिए। हर क्षेत्र में बीमारी का जोखिम एक जैसा नहीं होता। इसलिए बिना सलाह दवा देना उचित नहीं है।

बाजार से सीधे बिक्री का फायदा

रामलाल की बकरियों की संख्या बढ़ने के साथ बिक्री का तरीका भी बदला है। अब वे नर बकरों को स्थानीय हाट-बाजार में बेचते हैं। इसके अलावा, वे शहर के व्यापारियों को भी सीधे बिक्री करने लगे हैं।

रामलाल के अनुसार, सीधे बिक्री करने से उन्हें बिचौलियों की तुलना में बेहतर दाम मिल सकता है। इससे खरीदारों तक पहुंच बनाने का विकल्प बढ़ा है। हालांकि, मिलने वाला भाव पशु की उम्र, वजन और बाजार की मांग पर निर्भर करता है।

पशुपालकों के लिए बिक्री से पहले बाजार की जानकारी लेना उपयोगी रहता है। अलग-अलग खरीदारों से भाव पूछना भी मदद कर सकता है। पशु की सेहत और उचित वजन का ध्यान रखना चाहिए। इससे बिक्री के समय बेहतर निर्णय लेने में आसानी होती है।

नए पशुपालकों को शुरुआत में स्थानीय बाजार को समझना चाहिए। उन्हें यह पता करना चाहिए कि किस तरह के पशुओं की मांग है। बिक्री के मौसम और परिवहन खर्च का हिसाब भी जरूरी है। इससे संभावित आमदनी का आकलन बेहतर हो सकता है।

गांव के युवाओं को दे रहे सलाह

रामलाल अब गांव के युवाओं को भी बकरी पालन अपनाने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि रोजगार के लिए केवल परंपरागत नौकरियों पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। खेती के साथ पशुपालन भी आय का विकल्प बन सकता है।

उनके बाड़े में आसपास के गांवों से लोग जानकारी लेने आते हैं। वे बकरी पालन की देखभाल और प्रबंधन के बारे में समझते हैं। इस तरह रामलाल का अनुभव दूसरे परिवारों तक भी पहुंच रहा है।

सुरही और आसपास के गांवों में कुछ परिवारों ने छोटे स्तर पर बकरी पालन शुरू किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गांव के सरपंच और कृषि विस्तार कार्यकर्ता भी उनके बाड़े का दौरा करते हैं। नए पशुपालकों को व्यावहारिक जानकारी देने की कोशिश की जाती है।

इस तरह एक किसान का अनुभव गांव में सीखने का माध्यम बन रहा है। इससे इच्छुक परिवारों को काम शुरू करने से पहले जानकारी मिल सकती है। हालांकि, हर परिवार के संसाधन और परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए दूसरे किसान के मॉडल को अपनाने से पहले अपनी जरूरतें समझना जरूरी है।

छोटे किसानों के लिए क्या सीख?

रामलाल की कहानी का मुख्य संदेश नियमित देखभाल और धैर्य है। उन्होंने सीमित संसाधनों से काम शुरू किया। फिर धीरे-धीरे बकरियों की संख्या बढ़ाई। उनके अनुभव में पशुओं की सेहत, समय पर चारा और नस्ल सुधार महत्वपूर्ण हैं।

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