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एमपी के नक्सल प्रभावित 100 गांवों में बढ़ेंगे कृषि आधारित रोजगार, डेयरी और मछली पालन को भी बढ़ावा

newz@gmail.com | Oct 22, 2026, 11:11 IST

नक्सल प्रभावित रहे बालाघाट के 100 गांवों में कृषि आधारित रोजगार और उद्यम बढ़ाए जाएंगे। बालाघाट कलेक्टर आदित्य सिंह ने हर गांव के लिए आदर्श प्रोजेक्ट बनाने के निर्देश दिए। डेयरी, मुर्गी पालन, मछली पालन, मुनगा रोपण और तिलहन खेती पर जोर रहेगा।

बालाघाट

नक्सल प्रभावित रहे 100 गांवों की तस्वीर बदलने की तैयारी है। इन गांवों में खेती और उससे जुड़े व्यवसायों को बढ़ावा दिया जाएगा। इसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को गांव में ही रोजगार देना है। इसके लिए कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग मिलकर काम करेंगे। तिलहन फसलों को भी इस योजना में शामिल किया जाएगा। हर गांव की जरूरत के अनुसार अलग कार्ययोजना तैयार होगी।

कलेक्टर आदित्य सिंह ने 19 अक्टूबर को संबंधित विभागों की बैठक ली। इसमें कृषि विकास, किसानों की आय और ग्रामीण रोजगार पर चर्चा हुई। उन्होंने अधिकारियों को गांववार आदर्श प्रोजेक्ट तैयार करने के निर्देश दिए। इन परियोजनाओं में स्थानीय संसाधनों और भौगोलिक परिस्थितियों को प्राथमिकता मिलेगी। ग्रामीणों की जरूरतों को भी योजना तैयार करते समय ध्यान में रखा जाएगा। इससे रोजगार के अवसर गांवों के आसपास विकसित करने में मदद मिल सकती है।

खेती से आगे बढ़ेंगे किसान

कलेक्टर आदित्य सिंह ने कृषि को व्यवसाय से जोड़ने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, जिले की 70 से 80 प्रतिशत आर्थिक गतिविधियां कृषि पर आधारित हैं। इसलिए खेती को केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्होंने किसानों को नगदी फसलों और कृषि विविधीकरण के लिए प्रोत्साहित करने को कहा। नए प्रयोगों और उद्यमिता से किसानों की आय बढ़ाने पर भी जोर दिया। इसका मकसद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है।

कृषि विविधीकरण का मतलब खेती में अलग-अलग फसलों और गतिविधियों को अपनाना है। किसान अपनी जमीन, पानी और स्थानीय बाजार के अनुसार विकल्प चुन सकते हैं। इससे एक ही फसल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

कृषि आधारित उद्यम ग्रामीण युवाओं और महिला समूहों के लिए भी अवसर बना सकते हैं। स्थानीय स्तर पर काम मिलने से रोजगार के लिए पलायन का दबाव घट सकता है। इसके लिए योजनाओं को प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ना जरूरी होगा।

मुनगा रोपण से मिलेगा अवसर

प्रशासन ने मुनगा रोपण को बढ़ावा देने की योजना बनाने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए आजीविका मिशन के स्व-सहायता समूहों की मदद लेने पर जोर दिया गया। योजना के तहत बड़े पैमाने पर मुनगा के पौधे लगाने की तैयारी होगी।

मुनगा को कई क्षेत्रों में सहजन के नाम से भी जाना जाता है। इसकी पत्तियों और फलियों का उपयोग भोजन में किया जाता है। स्थानीय मांग होने पर इससे अतिरिक्त आय के अवसर बन सकते हैं।

डेयरी और मुर्गी पालन को बढ़ावा

कलेक्टर ने दुग्ध उत्पादन और मुर्गी पालन पर भी ध्यान देने को कहा। इन गतिविधियों से ग्रामीण परिवार खेती के साथ अतिरिक्त आय हासिल कर सकते हैं। इनके लिए स्थानीय जरूरतों के अनुसार छोटे उद्यम विकसित किए जा सकते हैं।

डेयरी शुरू करने के लिए पशुओं की उपलब्धता और चारे की व्यवस्था जरूरी है। पशु स्वास्थ्य सेवाएं और दूध की नियमित बिक्री भी अहम हैं। गांव में दूध संग्रह और परिवहन की सुविधा हो, तो व्यवसाय को मदद मिल सकती है।

मुर्गी पालन में भी प्रशिक्षण, उचित आवास और पशु चिकित्सा सेवाओं की जरूरत होती है। बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन तय करना फायदेमंद रहता है। छोटे स्तर से शुरुआत करने वाले परिवारों को लागत का आकलन पहले करना चाहिए।

अधिकारियों को इन गतिविधियों से जुड़े प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करना है। प्रशासन ने योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखने पर जोर दिया है।

मछली पालन और तिलहन खेती

बैठक में जिले के तालाबों में मत्स्य पालन की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। कलेक्टर ने उप संचालक मत्स्योद्योग को इस दिशा में काम करने के निर्देश दिए। उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर जोर दिया गया।

मछली पालन ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का एक अतिरिक्त साधन बन सकता है। इसके लिए तालाब की स्थिति, पानी की गुणवत्ता और मछली के बीज की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। उचित प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच से व्यवसाय को मदद मिल सकती है।

तिलहन फसलों को भी कृषि आधारित आजीविका योजना में शामिल किया जाएगा। किसानों को अपनी जमीन और मौसम के अनुसार फसल चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। बेहतर परिणाम के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज और तकनीकी सलाह की जरूरत होगी।

उद्यानिकी गतिविधियों को भी इन परियोजनाओं से जोड़ा जाएगा। इससे स्थानीय संसाधनों के अनुसार अलग-अलग रोजगार विकल्प विकसित किए जा सकते हैं। हालांकि, हर गांव में कौन-सा व्यवसाय शुरू होगा, यह उसकी कार्ययोजना तय होने के बाद स्पष्ट होगा।

धान खरीदी की तैयारियों पर जोर

बैठक में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। कलेक्टर ने खरीदी केंद्रों पर जरूरी व्यवस्थाएं समय पर पूरी करने के निर्देश दिए। किसानों को उपज बेचने में परेशानी नहीं होनी चाहिए।

खरीदे गए धान के सुरक्षित भंडारण के लिए पर्याप्त गोदाम उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया। खरीदी केंद्रों से गोदामों तक परिवहन की व्यवस्था भी जरूरी बताई गई। प्रशासन ने संबंधित अधिकारियों को सभी तैयारियां समय सीमा में पूरी करने को कहा।

धान खरीदी के दौरान भंडारण और परिवहन में देरी होने से परेशानी बढ़ सकती है। इससे केंद्रों पर अव्यवस्था और उपज संभालने में दिक्कत हो सकती है। इसलिए समय पर तैयारी किसानों और खरीदी व्यवस्था, दोनों के लिए जरूरी है।

31 अक्टूबर को बलराम कृषि महोत्सव

कलेक्टर ने 31 अक्टूबर को होने वाले बलराम कृषि महोत्सव की तैयारियां पूरी करने को कहा। यह आयोजन कृषि उपज मंडी, गोंगलई में आयोजित किया जाएगा। उप संचालक कृषि को आयोजन की जिम्मेदारी से जुड़ी तैयारियां समय पर पूरी करने के निर्देश मिले।

इस महोत्सव के माध्यम से किसानों तक कृषि संबंधी उपयोगी जानकारी पहुंचाने पर जोर रहेगा। किसानों को नई तकनीकों और खेती से जुड़े नवाचारों की जानकारी मिल सकती है। ऐसे आयोजन कृषि विभाग और किसानों के बीच संवाद का अवसर भी बनते हैं।

फसल बीमा दावों का होगा निराकरण

बैठक में फसल बीमा योजना के लंबित मामलों की भी समीक्षा की गई। कलेक्टर ने बीमा कंपनी के अधिकारी को पात्र किसानों के दावे समय पर निपटाने के निर्देश दिए। बीमारी या अन्य कारणों से प्रभावित फसलों के मामलों पर विशेष ध्यान देने को कहा गया।

प्रशासन ने स्पष्ट किया कि पात्र किसानों को बीमा लाभ दिलाने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। किसानों के लिए फसल नुकसान के बाद दावा प्रक्रिया समय पर पूरी होना जरूरी है। इससे प्रभावित परिवारों को आर्थिक मदद मिल सकती है।

किसानों को अपने बीमा आवेदन और फसल नुकसान से जुड़े दस्तावेज संभालकर रखने चाहिए। दावा लंबित होने पर संबंधित विभाग या बीमा कंपनी से स्थिति पूछी जा सकती है। पात्रता और भुगतान का फैसला योजना के नियमों के अनुसार होगा।

गांवों में आर्थिक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य

इन निर्देशों के जरिए प्रशासन कृषि आधारित रोजगार के नए रास्ते खोलना चाहता है। योजना में खेती के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन और उद्यानिकी को भी जगह दी गई है। इससे ग्रामीण परिवारों के सामने आय के कई विकल्प विकसित हो सकते हैं।

नक्सल प्रभावित रहे 100 गांवों में स्थानीय जरूरतों के आधार पर काम करना अहम होगा। हर गांव की जमीन, पानी, बाजार और लोगों की क्षमता अलग हो सकती है। इसलिए एक जैसी योजना लागू करने के बजाय गांववार प्रोजेक्ट तैयार करना उपयोगी रहेगा।

अब आगे की चुनौती इन योजनाओं को जमीन पर उतारने की होगी। विभागों के बीच तालमेल, प्रशिक्षण और बाजार की व्यवस्था इसकी सफलता तय करेंगे। ग्रामीणों की भागीदारी से परियोजनाओं को लंबे समय तक चलाने में मदद मिल सकती है।

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