राजस्थान के गठन के बाद 7 अप्रैल 1949 को हीरालाल शास्त्री पहले मुख्यमंत्री (मनोनीत) बने। इसके बाद सीएस वेंकटाचारी ने अंतरिम सरकार का नेतृत्व किया। 1951 में कुछ वक्त के लिए जय नारायण व्यास ने भी सूबे की कमान संभाली थी। राज्य में पहली निर्वाचित विधानसभा का गठन फरवरी 1952 में हुआ था और टीकाराम पालीवाल पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने थे।
राजस्थान में अब तक कुल 14 मुख्यमंत्री हुए हैं। इनमें से मौजूदा सीएम भजनलाल शर्मा समेत सूबे के 7 मुखिया ऐसे रहे हैं, जिनकी जड़ें खेती-किसानी से जुडी रहीं। इसके अलावा भी दर्जनों नेता ऐसे हैं, जो सीधे तौर पर कृषि से जुड़े रहे, और राजस्थान के साथ ही केंद्र सरकार में भी मंत्री बने।
74 में से 47 साल किसान परिवारों के हाथ रही सत्ता
राजस्थान में पहली बार 1952 में विधानसभा का गठन हुआ था। तब से अब तक 16 विधानसभा चुनाव हो चुके। इस दौरान कुछ नेता एक से ज्यादा बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन अगर कुल कार्यकाल जोड़ें, तो 74 में से 47 साल प्रदेश की कमान किसान पृष्ठभूमि के नेताओं के पास रही। इन्हीं नेताओं के कार्यकाल में किसानों के लिए कई नई योजनाएं और नवाचार शुरू हुए।
किसानों के सहारे ही मिला सत्ता का ताज
राजस्थान की राजनीति भी मध्यप्रदेश की तरह खेतों की पगडंडियों से होकर ही गुजरती है। चाहे केंद्र का बजट हो या राज्य का, किसान और खेती हमेशा उसके केंद्र में रहे हैं। कई नेता किसान परिवारों से निकले,और भले ही सब मुख्यमंत्री न बन पाए हों लेकिन राज्य और केंद्र की राजनीति में उनका दबदबा हमेशा रहा। कांग्रेस और भाजपा के अलावा बीच-बीच में सत्ता में आई जनता दल जैसी पार्टियों ने भी किसानों के भरोसे ही जीत हासिल की।
राजस्थान के वे मुख्यमंत्री,जिनकी जड़ें खेती से जुड़ी रहीं
भजनलाल शर्मा: खेत से सत्ता के शीर्ष तक
वर्तमान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का जन्म भरतपुर जिले के अटारी गांव में किसान परिवार में हुआ। उनके पिता किशन स्वरूप शर्मा किसान थे। बाद में भजनलाल शर्मा सियासत में सक्रिय हुए और संगठन में लंबी पारी खेलने के बाद 2023 में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। वह जयपुर की सांगानेर विधानसभा सीट से विधायक हैं। उनका सूबे की कमान संभालना इस मायने में भी अहम है कि राजस्थान की राजनीति में गांव और किसान परिवार से निकला व्यक्ति संगठन के रास्ते सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा।

अशोक गहलोत: साधारण परिवार से 3 बार बने मुख्यमंत्री
अशोक गहलोत माली जाति से आते हैं, जो राजस्थान में परंपरागत रूप से खेती से जुड़ी मानी जाती है। आज भी उनके परिवार की पैतृक कृषि भूमि है। हालांकि उन्होंने खुद कभी खेती नहीं की। एक साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर गहलोत आम आदमी और गरीबों के मुख्यमंत्री के तौर पर पहचाने जाते हैं।

उनकी राजनीति में गांव, गरीब, किसान और आम आदमी से जुड़े मुद्दों को लगातार प्रमुखता मिलती रही। यही वजह है कि किसान और ग्रामीण राजस्थान की राजनीति में उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा।
भैरोंसिंह शेखावत: छोटे किसान के घर से निकलकर उपराष्ट्रपति बने
भैरोंसिंह शेखावत किसान परिवार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के बड़े चेहरे बने। उनका जन्म सीकर जिले के खाचरियावास गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी भी उन पर आ गई थी। शेखावत 3 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे और बाद में देश के उपराष्ट्रपति भी बने।

राजस्थान का मुख्यमंत्री रहते हुए अंत्योदय, ग्रामीण विकास और रोजगार से जुड़ी योजनाओं पर उनका जोर रहा। सूबे का मुखिया रहते उन्होंने 1990 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण का फायदा किसानों तक पहुंचाने में देरी नहीं की। इजरायल की यात्रा के बाद उन्होंने राजस्थान में ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई थी। उनका राजनीतिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि राजस्थान के ग्रामीण समाज से निकला नेता राष्ट्रीय राजनीति में भी शीर्ष तक पहुंच सकता।
जगन्नाथ पहाड़िया: वंचित तबके से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक
जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान के पहले दलित मुख्यमंत्री थे। आजादी से पहले उनका परिवार भूमिहीन था, लेकिन आजादी के बाद हुए भूमि सुधारों ने उनकी किस्मत बदल दी। इसके बाद वे सांसद, केंद्रीय मंत्री और राजस्थान के मुख्यमंत्री भी बने। हालांकि मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल एक साल से कुछ ही ज्यादा समय तक रहा।

उनका राजनीतिक सफर यह दिखाता है कि राजस्थान में सत्ता की राजनीति केवल बड़े शहरों या स्थापित राजनीतिक परिवारों तक सीमित नहीं रही। गांव और सामाजिक रूप से वंचित तबकों से निकले नेताओं ने भी सत्ता के शीर्ष तक जगह बनाई।
मोहनलाल सुखाड़िया: आधुनिक राजस्थान के निर्माता
राजस्थान में करीब 17 साल तक मुख्यमंत्री रहे मोहनलाल सुखाड़िया को आधुनिक राजस्थान का निर्माता कहा जाता। उनके कार्यकाल में भूमि सुधार, पंचायती राज, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के बड़े काम हुए। उनके कार्यकाल में ही खेतों में मजदूरी करने वाले लोग खुद जमीन के मालिक बने। जागीरदारी व्यवस्था खत्म होने के बाद जमीन और ग्रामीण सत्ता के पुराने ढांचे में बड़ा बदलाव आया। इस दौर ने किसानों और ग्रामीण तबके को राजनीतिक रूप से भी मजबूत किया।
हरिदेव जोशी: पत्रकारिता से मुख्यमंत्री पद तक
बांसवाड़ा से आने वाले हरिदेव जोशी राजस्थान के प्रमुख आदिवासी नेताओं में रहे। एक हाथ नहीं होने के बावजूद उन्होंने हाथ वाली पार्टी (कांग्रेस) की सियासत की। वह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और पत्रकारिता भी की थी। बाद में 3 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा आधार ग्रामीण और आदिवासी इलाका रहा। उनके परिवार का भी कृषि से नाता रहा।
आपातकाल के दौरान जब वे मुख्यमंत्री थे,तभी सीलिंग एक्ट लागू हुआ,जिसके तहत बड़े जमींदारों से जमीन लेकर गरीब किसानों में बांटी गई। उनके दौर में भूमि सुधार और ग्रामीण समाज से जुड़े मुद्दे राजनीति के केंद्र में रहे।
जयनारायण व्यास: किसान आंदोलनों से सत्ता तक
जयनारायण व्यास स्वतंत्रता सेनानी थे और देश के आजाद होने के बाद पहली अंतरिम सरकार में मुख्यमंत्री रहे थे। वह 1951-52 और फिर 1952 से 1954 तक भी सूबे के मुखिया रहे। उनके परिवार का मूल पेशा खेती ही था। आजादी से पहले उन्होंने किसानों की समस्याओं को लेकर कई आंदोलन चलाए थे,और इन आंदोलनों में उनका साथ देने वाले ज्यादातर लोग किसान ही थे। उनकी राजनीति में रियासतों के खिलाफ संघर्ष और जनता के अधिकारों के सवाल प्रमुख रहे। उस दौर में किसान और ग्रामीण समाज इस राजनीतिक बदलाव का बड़ा आधार था।
राजस्थान की राजनीति में किसान आज भी अहम
राजस्थान की सियासत में समय के साथ मुद्दे बदले हैं, लेकिन किसान और गांव की अहमियत घटी नहीं है। पानी,सिंचाई,बिजली,फसल का दाम,कर्ज,न्यूनतम समर्थन मूल्य,भूमि और ग्रामीण रोजगार आज भी चुनावी राजनीति के अहम मुद्दे हैं।
यहां खेत से निकले नेताओं ने कभी सीधे सत्ता संभाली, तो कभी किसान और ग्रामीण समाज को अपने राजनीतिक आधार के रूप में इस्तेमाल किया। राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में गांव से सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले इन नेताओं की मौजूदगी इस रिश्ते की गहराई को बताती है।
