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ये हैं राजस्थान की सावित्री, घूंघट से FPO चेयरपर्सन तक, 2310 महिला किसानों को दिखाई आत्मनिर्भरता की राह, जानें पूरा सफर

newz@gmail.com | Sep 23, 2026, 17:45 IST

राजस्थान के बूंदी की सावित्री गौर कभी घूंघट में खेतों में काम करती थीं। आज वह समृद्धि महिला FPO की चेयरपर्सन हैं और 2310 महिला किसानों को नई राह दिखा रही हैं। सोयाबीन की खेती से शुरू हुआ उनका सफर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गया है।

राजस्थान की सावित्री

राजस्थान के बूंदी जिले की सावित्री गौर की कहानी हिम्मत की मिसाल है। वह कभी घूंघट में रहकर खेतों में काम करती थीं। आज वह हजारों महिला किसानों की अगुवाई कर रही हैं। सावित्री समृद्धि महिला क्रॉप प्रोड्यूसर्स कंपनी की चेयरपर्सन हैं। इस किसान उत्पादक कंपनी यानी FPO (Farmer Producer Organisation) से 2310 महिलाएं जुड़ी हैं। उनकी कहानी बताती है कि सही मौका मिलने पर बड़ा बदलाव संभव है।

सावित्री बूंदी जिले के छोटे से गांव खटकर की रहने वाली हैं। यह गांव कोटा शहर से करीब 65 किलोमीटर दूर है। कुछ साल पहले तक यहां महिलाओं का जीवन घर और खेत तक सीमित था। सावित्री भी इन्हीं महिलाओं में से एक थीं। वह खेतों में मेहनत करती थीं। लेकिन बाहरी लोगों से बात करने में झिझकती थीं। उनकी पहचान भी गांव की बाकी महिला किसानों जैसी ही थी।

घूंघट में रहती थीं सावित्री

साल 2009 में सावित्री की जिंदगी में बड़ा मोड़ आया। इलाके में काम करने वाली संस्था सृजन (Srijan) से उनका जुड़ाव हुआ। सृजन के सहयोग से सावित्री एक महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। यह समूह महिला किसानों को खेती की नई तकनीक सिखाता था। साथ ही उत्पादन बढ़ाने की जानकारी भी देता था। इसी समूह से जुड़कर सावित्री की सोच बदलने लगी।

सोयाबीन से शुरू हुआ सफर

सावित्री ने सबसे पहले सोयाबीन की खेती के तरीके सीखे। नई जानकारी मिलने से उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। वह सिर्फ अपनी खेती तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने दूसरी महिला किसानों को भी खेती सिखानी शुरू की। धीरे-धीरे वह किसानों को ट्रेनिंग देने लगीं। वह खेतों में जाकर महिलाओं से सीधे बात करतीं। वह उन्हें बेहतर उत्पादन और बाजार की जानकारी देतीं। इसी सफर में वह एक भरोसेमंद किसान नेता बन गईं।

2310 महिला किसानों की अगुवाई

सावित्री की मेहनत का सफर आगे बढ़ता गया। वह समृद्धि महिला क्रॉप प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड की चेयरपर्सन बनीं। इस FPO की शुरुआत साल 2011 में हुई थी। आज इससे 2310 महिला किसान जुड़ी हुई हैं। कंपनी का मकसद किसानों की फसल को बाजार तक पहुंचाना है। साथ ही उपज का अच्छा दाम दिलाना भी इसका लक्ष्य है। कंपनी से जुड़ी महिलाएं सोयाबीन, उड़द, गेहूं और सरसों उगाती हैं।

बड़ी कंपनी से हुआ समझौता

FPO ने किसानों की उपज बेचने के लिए Bunge कंपनी से भी करार किया। इससे महिला किसानों को फसल बेचने में मदद मिलने लगी। उन्हें बाजार की सही जानकारी भी मिलने लगी। लेकिन इस सफर में मुश्किलें भी कम नहीं थीं। साल 2015 में लगातार दो बार फसल खराब हुई। कमजोर मॉनसून के कारण उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ। इससे FPO पर कर्ज का बोझ बढ़ने लगा।

मुश्किल वक्त में साथ खड़ी रहीं

साल 2015 FPO के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। लगातार फसल खराब होने से कई किसान कर्ज नहीं चुका पा रहे थे। ऐसे मुश्किल समय में सावित्री ने हार नहीं मानी। वह एक खेत से दूसरे खेत तक गईं। उन्होंने हर किसान से खुद मिलकर बात की। सावित्री ने महिलाओं का हौसला बढ़ाया। उन्होंने किसानों को कर्ज चुकाने के लिए प्रेरित भी किया। इस दौर में उनका नेतृत्व FPO के लिए बड़ा सहारा बना।

नई तकनीक सीखने में भी आगे

सावित्री हमेशा नई तकनीक सीखने के लिए तैयार रहती थीं। उन्होंने फसल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचने का तरीका भी सीखा। इसके लिए उन्होंने फ्यूचर्स मार्केट की जानकारी हासिल की। सृजन के सहयोग से उन्होंने एक्सचेंज प्लेटफॉर्म को भी समझा। इसी प्लेटफॉर्म पर सोयाबीन और सरसों बेचने की प्रक्रिया सीखी गई। सितंबर 2016 में उन्होंने पहला बड़ा सौदा किया। उन्होंने 10 मीट्रिक टन सोयाबीन का नवंबर कॉन्ट्रैक्ट बेचा। इसके बाद उन्होंने 40 मीट्रिक टन सरसों का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट भी किया। इन सौदों से किसानों को बाजार समझने का अनुभव मिला।

फसल की क्वालिटी पर भी जोर

सावित्री की FPO ने सिर्फ फसल बेचने पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने फसल की गुणवत्ता सुधारने पर भी काम किया। इसके लिए कंपनी ने स्पाइरल ग्रेडर जैसी मशीनें लगाईं। महिला किसानों को फसल जांचने की ट्रेनिंग भी दी गई। इससे अच्छी गुणवत्ता वाली फसल को बेहतर दाम मिलने लगा।

मोबाइल पर देखती हैं फसल के भाव

आज सावित्री के लिए खेती सिर्फ फसल उगाने तक सीमित नहीं है। वह बाजार की कीमतों पर भी लगातार नजर रखती हैं। अपने मोबाइल फोन पर वह NCDEX (National Commodity and Derivatives Exchange) के भाव देखती हैं। जो महिला कभी बाहरी लोगों से बात करने में झिझकती थी। आज वह बाजार को बारीकी से समझती है। अब वह दूसरे किसानों का नेतृत्व भी कर रही हैं।

घूंघट से राष्ट्रीय मंच तक

सावित्री गौर का सफर एक छोटे से गांव से शुरू हुआ था। लगातार सीखने की इच्छा ने उन्हें आगे बढ़ाया। आज वह सिर्फ अपने गांव तक सीमित नहीं हैं। वह देशभर के कृषि कार्यक्रमों में भी अपना अनुभव साझा करती हैं। उनकी कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण मिलने पर बड़ा बदलाव मुमकिन है। ग्रामीण महिलाएं खेती के साथ नेतृत्व की भूमिका भी निभा सकती हैं।

आत्मनिर्भर बनने का मिला रास्ता

सावित्री के मुताबिक उनसे जुड़ी महिलाएं अब पहले से ज्यादा जागरूक हैं। उन्हें अब समझ आता है कि फसल कब और कैसे बेचनी है। सोयाबीन के पहले सौदे ने उनके लिए बड़ा अनुभव खोला। उनके अनुसार बाजार को समझने से किसानों की कमाई बेहतर हुई है। सावित्री गौर की कहानी सिर्फ एक महिला की सफलता नहीं है। यह राजस्थान की हजारों ग्रामीण महिलाओं के बदलते हौसले की भी कहानी है। इन महिलाओं ने खेती को आत्मनिर्भरता और सम्मान का जरिया बना लिया है।

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