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राजस्थान में किसानों के हाथ राजनीति की कमान, 24 में से 12 मंत्री भी खेती से जुड़े

editor | Aug 25, 2026, 06:56 IST

किसानों के हाथ राजनीति: राजस्थान की राजनीति में किसान हमेशा से ताकत का बड़ा केंद्र रहे हैं। इसका असर भजनलाल सरकार की मंत्रिपरिषद से लेकर विधानसभा तक साफ दिखता है। वर्तमान में 16वीं विधानसभा है और इसके कुल 200 में से 121 विधायकों का पेशा या तो कृषि है या वो इससे किसी भी तरह जुड़े हैं। वहीं, भजनलाल मंत्रिपरिषद के 24 में से 12 मंत्रियों की पृष्ठभूमि भी सीधे कृषि से जुड़ी है।

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विधानसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक, खुद मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और डिप्टी सीएम डॉ प्रेमचंद बैरवा का व्यवसाय भी खेती ही है। यानी खेत में अन्न उगाने वाला किसान सिर्फ राजस्थान की अर्थव्यवस्था का आधार नहीं, बल्कि सूबे की सियासत में भी उसकी पकड़ मजबूत है।

राजस्थान क्षेत्रफल के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य है। यह 3.42 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। प्रदेश की 70 फीसदी से ज्यादा कृषि भूमि बारिश पर निर्भर है। इसी वजह से यहां की खेती को अक्सर ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता। यानी अच्छी बारिश हुई तो अच्छी फसल और इंद्र देवता की मेहरबानी नहीं मिली तो फिर किसानों की आमदनी पर सीधा असर।

इसके बावजूद किसानों की मेहनत और नई तकनीकों ने राजस्थान को कई फसलों के उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों की कतार में शामिल किया है। बाजरा, मक्का की पैदावर के मामले में देश में सबसे आगे है। राजस्थान में बाजरे की खेती का क्षेत्रफल सबसे ज्यादा है और पैदावर में भी पहले स्थान पर है।

राज्य में करीब 45 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में बाजरा उगाया जाता है और प्रति हेक्टेयर उत्पादन करीब 400 किलोग्राम है। राज्य की करीब दो तिहाई आबादी किसी न किसी रूप में कृषि से जुड़ी है। यही वजह है कि खेती का असर राजनीति पर भी दिखाई देता है। वहीं, मक्का का उत्पादन भी 10 लाख टन से ज्यादा होता है।

किसानों के हाथ राजनीति: विधानसभा में हर 5 में से तीन विधायक किसान

राजस्थान विधानसभा की 200 में से 121 विधायकों का व्यवसाय कृषि से जुड़ा है। यानी 60 फीसदी विधायक खेती-किसानी से जुड़े हैं। इनमें भाजपा के 67 और कांग्रेस के 42 विधायक हैं। इसके अलावा 12 और माननीय ऐसे हैं, जो छोटी पार्टियों से जुड़े हैं या निर्दलीय हैं और उनका पेशा या व्यवसाय भी कृषि है।

प्रदेश की ज्यादातर विधानसभा सीटें ग्रामीण इलाकों में हैं। इन सीटों पर किसानों का समर्थन किसी भी उम्मीदवार के लिए बेहद अहम माना जाता। यही कारण है कि चुनाव में टिकट देने से लेकर प्रचार अभियान और चुनावी मुद्दों तक किसान को नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं होता।

किसान ही जनता,जनता ही किसान

राजस्थान में खेती सिर्फ आजीविका का साधन नहीं, बल्कि राजनीति का भी बड़ा आधार है। भाजपा और कांग्रेस दोनों प्रमुख दलों में किसान और ग्रामीण पृष्ठभूमि के नेताओं की मजबूत मौजूदगी रही है। विधानसभा में भी किसानों से जुड़े मुद्दे लगातार उठते हैं। सिंचाई, बिजली, फसल का दाम,खाद-बीज,कर्ज, समर्थन मूल्य और ग्रामीण रोजगार जैसे मुद्दे हर सरकार के लिए अहम रहे हैं।

राजनीतिक दल भी किसानों की इस ताकत को समझते हैं। यही वजह है कि चुनाव के दौरान किसान वर्ग की नाराजगी और समर्थन दोनों को गंभीरता से लिया जाता है।

भाजपा के 67 विधायक कृषि से जुड़े

साल 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के 67 ऐसे विधायक हैं,जिनका पेशा कृषि है या जिनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा खेती से आता है। इनमें छगन सिंह राजपुरोहित, झाबर सिंह सांखला, पुष्पेंद्र सिंह, भागचंद टांकड़ा, राधेश्याम बैरवा, गौतम कुमार, डॉ. सुरेश धाकड़, डॉ जसवंत सिंह यादव, संजीव कुमार, हरी सिंह रावत, रामअवतार, प्रताप सिंह सिंघवी, आदू राम मेघवाल, हरलाल सहारन, अजय सिंह, गोरधन, डॉ प्रेमचंद बैरवा, कैलाश चंद्र मीणा, प्रताप लाल भील, गोपीचंद मीणा, छोटू सिंह, जोगेश्वर गर्ग, महेंद्र पाल मीणा, बाबूलाल खराड़ी, अर्जुन लाल झींगर, दर्शन सिंह, रमेश खींची, शत्रुघ्न गौतम, डॉ. विश्वनाथ मेघवाल, सुभाष मील, धर्मपाल, ललित मीणा, अंशुमान सिंह भाटी, हंसराज पटेल, सुरेंद्र सिंह राठौड़, रामबिलास, गजेंद्र सिंह खींवसर, कन्हैयालाल, गोपाल लाल शर्मा, गोविंद प्रसाद, केशाराम चौधरी, वीरेंद्र सिंह, जवाहर सिंह बेढम, विश्वराज सिंह मेवाड़, विक्रम सिंह जाखल, विजय सिंह, राम सहाय वर्मा, भेरा राम चौधरी, समाराम, हेमंत मीणा, मदन दिलावर, गुरवीर सिंह, शंकरलाल ढेचा, अमृतलाल मीणा, भजन लाल शर्मा, हीराल नागर, किरोड़ीलाल मीणा, बाबू सिंह राठौर, हमीर सिंह भायल, झाबर सिंह खर्रा, जोराराम कुमावत, फूल सिंह मीणा, उदयलाल दांगी, राजेंद्र गुर्जर, रेवंत राम डांगा, सुखवंत सिंह और शांता मीणा शामिल हैं।

कांग्रेस के 42 विधायक भी किसान पृष्ठभूमि से

कांग्रेस में भी कृषि से जुड़े विधायकों की संख्या कम नहीं है। पार्टी के 42 विधायकों का व्यवसाय कृषि है। इनमें महेंद्र जीत सिंह मालवीय, इंद्रा, अर्जुन सिंह बमनिया, हरीश चौधरी, समरजीत सिंह, वीरेंद्र सिंह, गणेश घोघरा, हाकम अली खान, रामकेश, नानालाल निनामा, अशोक चांदना, बृजेंद्र सिंह ओला, विकास चौधरी, दीपचंद खैरिया, रमिला खड़िया, गोविंद सिंह डोटासरा, मुकेश भाकर, कुमारी रीता चौधरी, ललित यादव, सुशील रामेश्वर डूडी, रामनिवास गवरिया, विद्याधर सिंह, विनोद कुमार, चेतन पटेल कोलाना, सोहनलाल नायक, मांगीलाल मीणा, पूसाराम गोदारा, मोतीराम, अभिमन्यु, अनिल कुमार शर्मा, मनीष यादव, मनोज कुमार, श्रवण कुमार, डुंगरराम गेडर, नरेंद्र बुढानिया, कांति प्रसाद, घनश्याम, सचिन पायलट, भगवाना राम सैनी, प्रमोद जैन, दीनदयाल और रुपिंदर सिंह कूनर शामिल हैं।

राजस्थान के 24 में से आधे मंत्री कृषि से जुड़े

विधानसभा की तरह भजनलाल सरकार की मंत्रिपरिषद में भी कृषि पृष्ठभूमि वाले नेताओं की अच्छी संख्या है। कुल 24 में से 12 मंत्रियों का सीधा जुड़ाव खेती से है। इनमें मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, के अलावा झाबर सिंह खर्रा, मदन दिलावर, सुरेश सिंह रावत, कन्हैयालाल चौधरी, हीरालाल नागर, हेमंत मीणा, गौतम कुमार, विजय सिंह और जवाहर सिंह बेढम जैसे नाम शामिल हैं। कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन खेती से भी जुड़े हैं।

इन मंत्रियों के पास शिक्षा,ऊर्जा,जल संसाधन,राजस्व,परिवहन,जनस्वास्थ्य,नगरीय विकास और सहकारिता जैसे अहम विभाग भी हैं। यानी सरकार के कई बड़े फैसले लेने वाले लोगों का खुद का रिश्ता गांव और खेती से है।

राजनीति में किसान की ताकत साफ

मौजूदा विधानसभा में 200 में से 121 विधायकों और मंत्रिपरिषद में 12 किसान पृष्ठभूमि के चेहरों की मौजूदगी साफ बताती है कि राजस्थान की राजनीति में किसान सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीतिक समीकरण का मजबूत आधार है। सरकार हो या विपक्ष, दोनों को किसानों के मुद्दों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखना ही पड़ता है। हालांकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ने के बावजूद किसान की समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

यही राजस्थान की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना भी है कि जिस किसान की संख्या सत्ता के गलियारों में इतनी अधिक है, वही अपनी बुनियादी समस्याओं के लिए हर बार सरकार की ओर ताकता है।

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