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मुख्यमंत्री से ‘चाउर वाले बाबा’ तक: छत्तीसगढ़ की राजनीति का एक दिलचस्प किस्सा

editor | Aug 21, 2026, 13:36 IST

छत्तीसगढ़ की राजनीति में कुछ नेताओं की पहचान उनके पद से बनती है, तो कुछ की पहचान किसी ऐसी बात से जुड़ जाती है, जिसे लोग लंबे समय तक याद रखते हैं। डॉ. रमन सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ। मुख्यमंत्री के रूप में उनका लंबा कार्यकाल तो राजनीतिक इतिहास का हिस्सा है ही, लेकिन गांवों और गरीब परिवारों के बीच उनकी एक और पहचान बनी चाउर (चावल ) वाले बाबा। यह नाम किसी सरकारी पद का हिस्सा नहीं था। न किसी चुनावी दस्तावेज में लिखा गया और न ही किसी सरकारी आदेश से मिला। यह नाम धीरे-धीरे उस दौर की राजनीति और सार्वजनिक छवि से जुड़ता चला गया, जब सस्ती दर पर चावल उपलब्ध कराने की योजना छत्तीसगढ़ की सबसे चर्चित सरकारी योजनाओं में शामिल हो गई।

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एक रुपए किलो चावल ने बदल दी पहचान

2003 में जब डॉ. रमन सिंह पहली बार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने, तब प्रदेश की राजनीति के सामने कई चुनौतियां थीं। इनमें सबसे बड़ी चुनौती गरीब परिवारों तक खाद्यान्न पहुंचाने की भी थी। उनकी सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करते हुए गरीब परिवारों को बेहद कम कीमत पर चावल देने की योजना को आगे बढ़ाया। बाद के वर्षों में एक रुपए किलो चावल की योजना छत्तीसगढ़ की राजनीति की पहचान बन गई। राशन की दुकान से मिलने वाला सस्ता चावल लाखों परिवारों के लिए सीधे घरेलू बजट से जुड़ा सवाल था। राजनीति के लिहाज से भी इसका असर साफ दिखाई दिया। यही वह दौर था जब रमन सिंह को लोग चाउर वाले बाबा कहने लगे।

नाम में बाबा क्यों जुड़ा

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण और आदिवासी राजनीति में नेताओं को उनके काम या व्यवहार से जुड़े उपनाम मिलना कोई नई बात नहीं है। रमन सिंह के नाम के साथ बाबा जुड़ने के पीछे भी उनकी सार्वजनिक छवि और ग्रामीण इलाकों में लोकप्रिय संबोधन को माना जाता है। चाउर वाले बाबा नाम में एक साथ दो बातें थीं। एक तरफ मुख्यमंत्री रमन सिंह और दूसरी तरफ गरीब परिवारों तक सस्ता चावल पहुंचाने वाली सरकार की योजना। धीरे-धीरे यह संबोधन राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन गया। दिलचस्प बात यह है कि यह नाम केवल समर्थकों के बीच ही नहीं चला। विरोधी राजनीति में भी चावल रमन सरकार की पहचान और उसकी योजनाओं पर चर्चा का एक प्रमुख विषय बन गया।

योजना से आगे राजनीतिक पहचान

रमन सिंह के लिए चावल की योजना सिर्फ खाद्य वितरण की योजना नहीं रही। उनकी सरकार ने इसे छत्तीसगढ़ मॉडल के तौर पर भी पेश किया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बदलाव, राशन कार्ड और गरीब परिवारों को सस्ता अनाज देने की व्यवस्था को लेकर राज्य की राजनीति में लगातार चर्चा होती रही। इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ कि सरकार की योजनाओं का एक हिस्सा सीधे गरीब परिवारों की रसोई तक पहुंच गया। राजनीति में किसी योजना की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यही माना जाता है कि उसका असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई दे। रमन सिंह की राजनीतिक पहचान भी इसी के साथ बदलती गई। डॉक्टर रमन सिंह से आगे बढ़कर वे कई लोगों के लिए चाउर वाले बाबा बन गए।

तीन कार्यकाल और एक उपनाम

डॉ. रमन सिंह 2003 से 2018 तक लगातार तीन कार्यकाल मुख्यमंत्री रहे। इस लंबे कार्यकाल में उनकी सरकार की कई योजनाएं चर्चा में रहीं, लेकिन सस्ता चावल उनकी सबसे याद की जाने वाली राजनीतिक पहचानों में शामिल रहा। आज रमन सिंह मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनका नाम आते ही तीन कार्यकाल, भाजपा की लंबी सरकार और गरीब परिवारों के लिए सस्ता चावल अक्सर चर्चा में होती है। यही किसी राजनीतिक उपनाम की असली ताकत होती है। पद बदल जाता है, सरकार बदल जाती है, चुनाव बीत जाते हैं, लेकिन लोगों की जुबान पर बना कोई नाम वर्षों तक कायम रहता है। छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह की कहानी में चाउर वाले बाबा ऐसा ही एक नाम है।

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