छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का एक छोटा गांव इन दिनों चर्चा में है। यहां के किसान लोकेंद्र साहू ने देश के लिए जान देने वाले जवानों की याद को सहेजने की अनोखी पहल की है। उन्होंने अपनी निजी खेती की जमीन पर शहीद पार्क बनाया है। यह जानकारी 22 सितंबर 2026 की रिपोर्ट पर आधारित है।
गांव का नाम देवगहन है। पार्क में देश के अलग-अलग हिस्सों में आतंकियों और नक्सलियों से लड़ते हुए शहीद हुए जवानों की प्रतिमाएं हैं। इसमें युद्ध में शहीद हुए जवान भी शामिल हैं। कुल 18 प्रतिमाएं यहां स्थापित की गई हैं।
बिना सरकारी मदद के तैयार हुआ पार्क
इस पार्क की सबसे खास बात यह है कि इसे किसी सरकारी योजना से मदद नहीं मिली। किसी बड़े संस्थान का भी सहयोग नहीं लिया गया। लोकेंद्र साहू ने इसे अपनी मेहनत की कमाई से तैयार कराया है।
शहीदों के सम्मान का यह जुनून लोकेंद्र पर इस कदर चढ़ा कि उन्होंने इसके लिए अपनी जमीन तक बेच दी। प्रतिमाओं को बनवाने और स्थापित करने में उन्होंने करीब 10 लाख रुपए खर्च किए। यह रकम और जमीन बेचने की बात रिपोर्ट में लोकेंद्र के हवाले से है।
26/11 के नायक से कारगिल के शहीद तक
शहीद पार्क में कई जाने-पहचाने नाम शामिल हैं। इनमें मुंबई के 26/11 आतंकी हमले में साहस दिखाने वाले तुकाराम ओंबले की प्रतिमा है। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की प्रतिमा भी यहां लगी है। इसके अलावा अलग-अलग आतंकी और नक्सली हमलों में शहीद हुए जवानों को भी जगह दी गई है।
कारगिल युद्ध में शहीद हुए छत्तीसगढ़ के जवान दुर्वासा निषाद की प्रतिमा भी इस पार्क में है। इस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों के शहीदों की स्मृतियां एक जगह सहेजी गई हैं।
आने वाली पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश
लोकेंद्र की कोशिश सिर्फ प्रतिमाएं लगवाने तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक इसके पीछे मकसद आने वाली पीढ़ी को शहीदों की कहानियों से जोड़ना है। वे चाहते हैं कि गांव के बच्चे और युवा पार्क में आएं। उनका मानना है कि इससे बच्चे जान पाएंगे कि जवानों ने देश के लिए कैसे बलिदान दिया।
आमतौर पर गांवों में खेती की जमीन किसान की आजीविका का सबसे बड़ा सहारा होती है। लेकिन लोकेंद्र ने इसी जमीन का एक हिस्सा शहीदों की याद के लिए दे दिया। लोकेंद्र की इच्छा है कि यह जगह आगे चलकर युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बने।
किसान बनने से पहले देखा था क्रिकेटर बनने का सपना
लोकेंद्र साहू के व्यक्तित्व की एक और दिलचस्प कहानी क्रिकेट से जुड़ी है। किसान बनने से पहले उन्होंने क्रिकेटर बनने का सपना देखा था। करीब 25 साल पहले, यानी 2001-02 के आसपास, वे इसी सपने के लिए मुंबई पहुंच गए थे।
वहां उन्होंने क्रिकेट की ट्रेनिंग भी ली। उन्हें उम्मीद थी कि मेहनत से खेल में भविष्य बनेगा। इसी दौरान उनके पिता का पहले ही निधन हो चुका था। फिर उनके दादा का भी निधन हो गया। परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
हालात ऐसे बने कि उन्हें क्रिकेटर बनने का सपना छोड़ना पड़ा। वे मुंबई से वापस अपने गांव देवगहन लौट आए। सपना अधूरा रह गया, पर क्रिकेट के लिए उनका प्यार कम नहीं हुआ।
बेटी के जन्मदिन पर लगवाई सचिन की प्रतिमा
लोकेंद्र ने अपने इसी जुनून को नए तरीके से जिंदा रखा। करीब पांच साल पहले अपनी बेटी के जन्मदिन पर उन्होंने बड़ा कदम उठाया। उन्होंने गांव के खेल मैदान में सचिन तेंदुलकर की आदमकद प्रतिमा लगवाई।
लोकेंद्र के लिए सचिन सिर्फ एक सफल क्रिकेटर नहीं हैं। उनके मुताबिक सचिन मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य हासिल करने की प्रेरणा हैं। इसी वजह से उन्होंने सचिन की प्रतिमा को गांव के खेल मैदान में जगह दी।
सूर्यकुमार यादव के फैसले ने जीता दिल
लोकेंद्र की क्रिकेट से जुड़ी कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वर्ष 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ित परिवारों की मदद के लिए क्रिकेटर सूर्यकुमार यादव ने अपनी मैच फीस दान की थी। इस बात से लोकेंद्र काफी प्रभावित हुए।
इसके बाद उन्होंने सूर्यकुमार को सम्मान देने का फैसला किया। उन्होंने करीब 2 लाख रुपए की लागत से सूर्यकुमार की आदमकद प्रतिमा तैयार कराई। वे इसे लेकर मुंबई पहुंचे और सूर्यकुमार के जन्मदिन पर उन्हें भेंट की।
सूर्यकुमार ने कहा- गांव में ही लगाइए
लोकेंद्र की भावनाओं का असर सूर्यकुमार यादव पर भी पड़ा। सूर्यकुमार ने प्रतिमा अपने पास रखने के बजाय इसे लोकेंद्र के गांव में ही लगाने की इच्छा जताई। अब देवगहन गांव में सचिन तेंदुलकर के साथ सूर्यकुमार की प्रतिमा भी दिखेगी।
एक तरफ गांव में 18 शहीद जवानों की प्रतिमाएं अगली पीढ़ी को देशभक्ति और बलिदान की कहानी बताएंगी। दूसरी तरफ क्रिकेट के सितारों की प्रतिमाएं बच्चों को खेल की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी।
अधूरा सपना, नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
लोकेंद्र साहू की कहानी सिर्फ शहीदों और क्रिकेट के प्रति प्रेम की कहानी नहीं है। इसके केंद्र में वह सपना भी है, जो पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से अधूरा रह गया था।
लोकेंद्र खुद क्रिकेट के मैदान में अपना सपना पूरा नहीं कर पाए। लेकिन अब वे गांव के बच्चों को बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। शहीदों के बलिदान को खेत की मिट्टी से जोड़ने से लेकर क्रिकेटरों की प्रतिमाएं लगाने तक, उनकी कोशिश गांव में ऐसी यादें छोड़ने की है जिन्हें आने वाली पीढ़ियां समझ सकें।
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