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रोजल हिबिस्कस की खेती: एमपी के किसान अनमोल ने जैविक तरीके से उगाई औषधीय फसल, कृषि विभाग ने भी सराहा

newz@gmail.com | Oct 6, 2026, 14:15 IST

सागर के बीना में किसान अनमोल दुबे ने जैविक तरीके से रोजल हिबिस्कस उगाया है। जून में बोई फसल में फूल आने लगे हैं। कृषि विभाग ने निरीक्षण कर इसे प्रेरणादायक मॉडल बताया।

औषधीय खेती

बढ़ती लागत के बीच कई किसान नई फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। मध्य प्रदेश के सागर जिले में ऐसा ही एक प्रयोग चर्चा में है। बीना तहसील के पुरेना गांव के किसान अनमोल दुबे ने रोजल हिबिस्कस उगाया है। उनकी फसल अब फूल की अवस्था में पहुंच गई है। कृषि विभाग ने इसे किसानों के लिए प्रेरणादायक मॉडल बताया है।

अनमोल दुबे ने क्या किया

अनमोल दुबे सागर जिले की बीना तहसील के गांव पुरेना में खेती करते हैं। उन्होंने पारंपरिक फसलों से हटकर एक नई राह चुनी। उन्होंने रोजल हिबिस्कस की औषधीय खेती अपनाई।

खेती में लागत बढ़ रही है और पारंपरिक फसलों में चुनौतियां भी हैं। ऐसे में किसान वैकल्पिक और लाभकारी फसलें तलाश रहे हैं। अनमोल दुबे का प्रयोग इसी बदलाव की एक कड़ी माना जा रहा है।

जून में बोई थी फसल

कृषि विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार उन्होंने जून में फसल की बोनी की थी। इसके बाद नियमित देखभाल की गई। फसल प्रबंधन प्राकृतिक तरीके से किया गया। अब फसल अच्छी अवस्था में पहुंच चुकी है। खेत में फूल आने लगे हैं। यानी फसल फ्लावरिंग स्टेज पर है। यह किसान के लिए अहम पड़ाव माना जाता है।

रासायनिक खाद-दवा से दूरी

अनमोल दुबे ने बताया कि उन्होंने फसल में कोई रासायनिक दवा नहीं डाली। उन्होंने रासायनिक उर्वरक का भी इस्तेमाल नहीं किया। उनके मुताबिक फसल में जैविक और प्राकृतिक खाद का उपयोग हुआ।

यह प्रयोग इसलिए भी अहम है कि खेती में लागत घटाने की जरूरत है। मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी है। इसके लिए प्राकृतिक और जैविक खेती को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है।

रोजल हिबिस्कस क्या है

रोजल हिबिस्कस का वैज्ञानिक नाम Hibiscus sabdariffa है। हिंदी में इसे आम तौर पर लालअंबारी या पटवा भी कहा जाता है। फूल के नीचे बनने वाला मोटा, लाल हिस्सा खास माना जाता है। इसे कैलिक्स (Calyx) कहते हैं।

कृषि जानकारी के मुताबिक इससे चाय, पेय, जैम, जेली और सिरप बनते हैं। इसका उपयोग प्राकृतिक रंग के रूप में भी बताया गया है। यह जानकारी सामान्य कृषि स्रोतों की है। मूल खबर में यह अलग से नहीं दी गई।

फसल को कितना समय लगता है

रोजल की फसल आम तौर पर 150 से 180 दिन की बताई जाती है। जानकारी के मुताबिक यह छोटे दिन वाला पौधा है। यानी दिन छोटे होने पर इसमें फूल अच्छे आते हैं। फूल आने के बाद कैलिक्स को तुड़ाई के लायक होने में समय लगता है। तुड़ाई फूल के दो-तीन हफ्ते बाद बताई जाती है। इसलिए अनमोल दुबे की फसल के आगे के चरण पर किसानों की नजर रहेगी।

विभाग की टीम ने किया निरीक्षण

हाल ही में कृषि विभाग की टीम किसान के खेत पर पहुंची। टीम की अगुवाई बीना के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी अवधेश राय ने की। टीम में कृषि विस्तार अधिकारी भी शामिल थे। अधिकारियों ने फसल की अवस्था देखी। उन्होंने फूल आने की स्थिति भी जांची। खेत में अपनाई जा रही प्रबंधन तकनीकों को भी परखा गया।

अधिकारियों के मुताबिक फसल की स्थिति बेहद अच्छी और संतोषजनक मिली। साथ ही अगले चरण के लिए जरूरी दिशा-निर्देश भी दिए गए। इनका मकसद फसल की बेहतर देखभाल और उत्पादन है।

औषधीय खेती से नई राह

रोजल जैसी औषधीय फसलें आय का नया रास्ता खोल सकती हैं। इसी वजह से यह प्रयोग दूसरे किसानों के लिए अहम माना जा रहा है। उन्होंने दिखाया कि सिर्फ पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहना जरूरी नहीं। नई फसल, नई तकनीक और प्राकृतिक खेती अपनाकर भी आगे बढ़ा जा सकता है।

दूसरे किसानों के लिए मॉडल

स्थानीय स्तर पर इस खेती को प्रेरणादायक मॉडल की तरह देखा जा रहा है। एक तरफ उन्होंने औषधीय फसल को अपनाया। दूसरी तरफ रासायनिक खाद-दवा से दूरी रखकर प्राकृतिक तरीके से फसल तैयार की।

कृषि विभाग भी ऐसे किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है। ये वे किसान हैं जो वैकल्पिक फसलों में प्रयोग कर रहे हैं। किसानों के लिए यह कहानी एक प्रयोग की तरह है। असली नतीजा तुड़ाई, सुखाई और बिक्री के बाद ही साफ होगा। बाजार और खरीदार की जानकारी भी बाद में अहम होगी।

नई फसल से पहले क्या देखें

कोई भी नई फसल अपनाने से पहले किसान जानकारी जरूर जुटाएं। पहले कृषि विभाग के अधिकारियों से सलाह लें। यह भी देखें कि उपज कहां और किस भाव पर बिकेगी।

शुरुआत छोटे रकबे में करना ज्यादा सुरक्षित रहता है। इससे जोखिम कम रहता है। अनमोल दुबे की तरह विभाग के दिशा-निर्देश लेकर आगे बढ़ना बेहतर है।

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