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MP के किसान देवकरण को गेहूं से ज्यादा कमाई अमरूद की खेती से, 220 क्विंटल से 4.25 लाख की आय

newz@gmail.com | Oct 23, 2026, 20:13 IST

सीहोर जिले के पाडलिया गांव के किसान देवकरण ठाकुर ने गेहूं की जगह अमरूद की खेती अपनाई। सरकारी योजना से 60 हजार रुपए की मदद मिली। उनके मुताबिक, 2026-27 में 220 क्विंटल अमरूद से 4.25 लाख रुपए की शुद्ध आय हुई।

अमरूद

गेहूं छोड़ अमरूद की खेती

मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में एक किसान ने बागवानी से कमाई बढ़ाई है। आष्टा विकासखंड के पाडलिया गांव में देवकरण ठाकुर खेती करते हैं। पहले वे अपने खेतों में गेहूं की फसल उगाते थे। अब उन्होंने अमरूद की बागवानी को भी अपनी खेती का हिस्सा बनाया है।

देवकरण ठाकुर को उद्यानिकी विभाग की योजना से मदद मिली। विभाग ने वर्ष 2023-24 में उन्हें योजना के तहत लाभ दिया था। इसके लिए फल क्षेत्र विस्तार घटक में अमरूद की खेती चुनी गई। उन्हें 1.50 हेक्टेयर जमीन पर बाग लगाने के लिए 60 हजार रुपए का अनुदान मिला।

इस सहायता से उन्हें बागवानी शुरू करने में आर्थिक मदद मिली। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उन्होंने एस-49 किस्म का अमरूद लगाया। अब उनके खेत में अमरूद का उत्पादन हो रहा है। खेती के इस बदलाव ने उनकी कमाई के तरीके को बदल दिया है।

सरकारी योजना से मिली मदद

देवकरण ठाकुर को एकीकृत बागवानी विकास मिशन (Mission for Integrated Development of Horticulture, MIDH) के तहत सहायता मिली। इस योजना में फल क्षेत्र विस्तार के जरिए बागवानी को बढ़ावा दिया जाता है। उनके मामले में अमरूद की खेती के लिए अनुदान दिया गया। यह सहायता वर्ष 2023-24 में स्वीकृत हुई थी।

किसानों के लिए बागवानी शुरू करने में शुरुआती खर्च एक अहम चुनौती होता है। पौधे खरीदना, खेत तैयार करना और बाग की देखभाल करना जरूरी होता है। अनुदान मिलने से शुरुआती निवेश का कुछ हिस्सा पूरा करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, खेती की कुल लागत किसान की परिस्थितियों के अनुसार बदलती है।

देवकरण ठाकुर के उदाहरण में सरकारी सहायता के साथ फसल का चुनाव भी महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने गेहूं के बजाय फल उत्पादन का विकल्प अपनाया। बागवानी में नियमित देखभाल और सही प्रबंधन की जरूरत होती है। इसके बदले किसानों को बाजार में फल बेचकर कमाई का अवसर मिल सकता है।

गेहूं और अमरूद की कमाई

पहले देवकरण ठाकुर गेहूं की खेती से कमाई करते थे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उन्हें 80 क्विंटल गेहूं का उत्पादन मिलता था। इस फसल पर उनकी लागत करीब 70 हजार रुपए बताई गई है। खर्च निकालने के बाद उनकी शुद्ध आय 1.30 लाख रुपए थी।

अमरूद की खेती में उनकी कमाई के आंकड़े इससे ज्यादा बताए गए हैं। वर्ष 2026-27 में उन्हें 220 क्विंटल अमरूद उत्पादन मिला। इस बागवानी पर कुल लागत 1.25 लाख रुपए बताई गई है। वहीं, इससे कुल आय 5.50 लाख रुपए होने की जानकारी दी गई है।

इन आंकड़ों के अनुसार, लागत घटाने के बाद उनकी शुद्ध आय 4.25 लाख रुपए रही। गेहूं से मिलने वाली बताई गई शुद्ध आय 1.30 लाख रुपए थी। इस तरह अमरूद से शुद्ध आय करीब 3.3 गुना बैठती है। हालांकि, दोनों फसलों की लागत और कमाई की अवधि समान है या नहीं, यह जानकारी स्पष्ट नहीं है।

अमरूद की खेती में क्या अहम है?

अमरूद की बागवानी में केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं होता। पौधों की देखभाल, पानी और खाद का सही प्रबंधन भी जरूरी है। फल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए समय पर निगरानी करनी पड़ती है। उत्पादन और बिक्री पर इन बातों का असर पड़ सकता है।

देवकरण ठाकुर ने एस-49 किस्म के अमरूद की खेती की। उपलब्ध विवरण में इस किस्म के चयन की वजह नहीं बताई गई है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी सफलता का पूरा कारण सिर्फ यही किस्म है। खेत की स्थिति, देखभाल और बिक्री की कीमत भी कमाई को प्रभावित कर सकती है।

अमरूद जैसी फल फसलों में बाजार की भूमिका भी अहम होती है। किसानों को उत्पादन के साथ खरीदार और बिक्री का रास्ता समझना पड़ता है। फल जल्दी खराब हो सकते हैं, इसलिए उनकी संभाल और समय पर बिक्री महत्वपूर्ण है। हालांकि, देवकरण ठाकुर के फल किस बाजार में और किस भाव पर बिके, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।

दूसरे किसानों के लिए सीख

देवकरण ठाकुर की कहानी बताती है कि खेती में फसल के विकल्पों पर विचार करना उपयोगी हो सकता है। पारंपरिक फसलों के साथ किसान बागवानी की संभावनाएं भी देख सकते हैं। लेकिन हर किसान के खेत और आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। इसलिए किसी दूसरे की कमाई देखकर तुरंत वही फैसला लेना उचित नहीं होगा।

बागवानी शुरू करने से पहले किसान अपनी जमीन और पानी की उपलब्धता का आकलन कर सकते हैं। स्थानीय बाजार में फल की मांग और बिक्री की व्यवस्था समझना भी जरूरी है। पौधों की लागत, देखभाल और उत्पादन शुरू होने तक लगने वाले समय को ध्यान में रखना चाहिए। उद्यानिकी विभाग से योजना और तकनीकी सलाह की जानकारी लेना भी उपयोगी हो सकता है।

सरकारी अनुदान शुरुआती खर्च का बोझ कम कर सकता है। लेकिन योजना की पात्रता, सहायता की राशि और शर्तें विभाग से जांचना जरूरी है। किसान को अपने इलाके के अनुसार सही फसल चुननी चाहिए। इससे जोखिम समझकर खेती में बदलाव करने में मदद मिल सकती है।

खेती में बदलाव से बढ़ी उम्मीद

पाडलिया गांव के देवकरण ठाकुर का उदाहरण स्थानीय किसानों के लिए चर्चा का विषय बन सकता है। उनके बताए आंकड़ों में अमरूद की खेती से शुद्ध आय गेहूं की तुलना में काफी ज्यादा है। इससे बागवानी को आय के एक संभावित विकल्प के रूप में देखने की वजह मिलती है।

फिर भी खेती में कमाई हर साल एक जैसी नहीं रहती। मौसम, कीट, रोग, उत्पादन और बाजार भाव से आमदनी बदल सकती है। फल की बिक्री में देरी होने पर नुकसान का जोखिम भी रहता है। इसलिए बागवानी में उतरने से पहले पूरी योजना बनाना जरूरी है।

किसानों को सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी लेकर उनका लाभ उठाने पर विचार करना चाहिए। साथ ही, उत्पादन और बिक्री का रिकॉर्ड रखना भी मददगार हो सकता है। इससे पता चलता है कि किस फसल पर कितना खर्च हुआ और वास्तविक कमाई कितनी रही। ऐसी जानकारी आगे की खेती की योजना बनाने में काम आ सकती है।

देवकरण ठाकुर की सफलता का मुख्य संदेश खेती में नए विकल्प तलाशना है। उनके मामले में सरकारी सहायता और अमरूद की बागवानी साथ आए। हालांकि, दूसरे किसानों के लिए परिणाम अलग हो सकते हैं। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सही फैसला ही खेती को टिकाऊ और लाभकारी बना सकता है।

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