मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में किसान गुरु पवार चर्चा में हैं। स्वीट कॉर्न ने उनकी किस्मत बदल दी। वे करीब 70 एकड़ में स्वीट कॉर्न उगाते हैं। उनकी शुद्ध आय करीब 40 लाख रुपए बताई गई है। गुरु पवार परासिया ब्लॉक के बिछकवाड़ा गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर नया रास्ता चुना। अब आसपास के किसान भी उनसे सीख रहे हैं।
स्वीट कॉर्न से 40 लाख की कमाई
गुरु पवार की शुद्ध आय करीब 40 लाख रुपए रही है। हालांकि इसका खर्च, पैदावार और बिक्री भाव का ब्योरा उसमें नहीं है। सही फसल और सही तरीका चुनने से खेती का हिसाब बदल सकता है। पवार का अनुभव इसी बात की मिसाल के तौर पर पेश किया गया है।
पारंपरिक खेती से क्यों हटे
गुरु पवार पहले पारंपरिक फसलें उगाते थे। खेती की लागत लगातार बढ़ रही थी। मौसम का भरोसा नहीं था और बाजार की हालत भी बदलती रहती थी। इन वजहों से मेहनत के हिसाब से कमाई नहीं हो पा रही थी। यह हाल देश के कई किसानों का है। ऐसे में पवार ने कुछ नया आजमाने का फैसला किया।
आत्मा परियोजना से मिली राह
स्वीट कॉर्न की जानकारी पवार को कृषि विभाग की आत्मा परियोजना से मिली। आत्मा का पूरा नाम एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (Agricultural Technology Management Agency) है। यह नाम सामान्य जानकारी के तौर पर जोड़ा गया है।
परियोजना से उन्हें खेती की सुधरी तकनीक बताई गई। फसल की देखभाल, सिंचाई और बिक्री के बारे में भी सलाह मिली। इसी मार्गदर्शन से उनका भरोसा बढ़ा।
छोटे रकबे से 70 एकड़ तक
पवार ने शुरुआत में स्वीट कॉर्न को पारंपरिक फसलों के साथ उगाया। यानी उन्होंने एक झटके में पूरी जमीन पर नया प्रयोग नहीं किया। पहले अनुभव लिया और नतीजे देखे।
जब फायदा दिखा तो उन्होंने रकबा धीरे धीरे बढ़ाया। अब करीब 70 एकड़ में स्वीट कॉर्न की खेती होती है। कम जोखिम के साथ आगे बढ़ना किसानों के लिए अच्छा सबक है।
कटाई के बाद मिट्टी का इलाज
भुट्टे तोड़कर पवार बचे डंठल खेत में ही मिला देते हैं। इसके लिए वे रोटावेटर चलाते हैं। इससे अवशेष मिट्टी में दब जाते हैं। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है। मिट्टी की उर्वरता भी सुधरती है। यानी अगली फसल के लिए खेत पहले से बेहतर तैयार हो जाता है।
आलू की बुवाई में फायदा
स्वीट कॉर्न जल्दी तैयार हो जाती है। इस वजह से पवार का खेत जल्दी खाली हो जाता है। रिपोर्ट के अनुसार इसके बाद वे समय पर आलू की बुवाई कर पाते हैं।
उनके मुताबिक इससे आलू की पैदावार भी बेहतर मिलती है। यानी एक ही खेत से दो फसलें लेने का हिसाब बनता है। इससे साल भर की कमाई पर असर पड़ता है।
गांव के किसानों पर असर
आसपास के सैकड़ों किसान स्वीट कॉर्न उगाने लगे हैं। यह पवार की सफलता देखकर हुआ बताया गया है। यह दावा रिपोर्ट में किया गया है। इसकी गिनती अलग से नहीं बताई गई।
यहां की उपज बड़े शहरों तक भेजी जा रही है। जब एक किसान सफल होता है, तो दूसरे उससे हौसला लेते हैं। गांव में ऐसा चलन खेती का तरीका बदल सकता है।
प्रति एकड़ औसत कमाई कितनी
यह सामान्य गणना है, खबर का हिस्सा नहीं। 40 लाख रुपए को 70 एकड़ में बांटें। औसत करीब 57,000 रुपए प्रति एकड़ बैठता है। यह मोटा औसत है।
असली कमाई हर खेत में अलग होती है। किस्म, लागत, भाव और बिक्री का समय सब पर असर डालते हैं। इसलिए इस औसत को किसी के लिए पक्का मुनाफा न मानें।
स्वीट कॉर्न की खेती से पहले ये रखें ध्यान
शुरू करने से पहले स्थानीय बाजार देखें। खरीदार, ढुलाई, उत्पादन की लागत और मांग का आकलन जरूर करें। पहले कम रकबे से शुरुआत करें। खरीदार से बात पक्की करें। कटाई और बिक्री का समय पहले से तय रखें। स्वीट कॉर्न जल्दी खराब होती है, इसलिए ढुलाई का इंतजाम पहले से देखें।
अपने जिले के कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लें। अच्छी किस्म और बुवाई का सही समय वहीं से पता चल सकता है। बिना जानकारी के बड़ा रकबा लेना जोखिम भरा हो सकता है।
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