बुरहानपुर जिले की शाहपुर नगर परिषद अब कचरे से जैविक खाद बना रही है। यह खाद किसानों, बगीचों, नर्सरियों और आम लोगों को बेची जा रही है। 50 किलो की एक बोरी की कीमत 200 रुपए रखी गई है। शहर का गीला कचरा अब बेकार नहीं जा रहा। वही कचरा खेतों और बगीचों के लिए खाद बन रहा है।
नगर परिषद की नई पहल
शाहपुर नगर परिषद ने कचरा प्रबंधन को खाद बनाने से जोड़ा है। शहर में रोज निकलने वाला कचरा एक जगह जमा होता है। वहां उसे अलग किया जाता है। इसके बाद जैविक कचरे से खाद तैयार होती है।
इस काम में परिषद की पूरी टीम लगी है। सफाई का काम 60 सफाई मित्र संभालते हैं। कचरा ले जाने के लिए 10 वाहन चालक तैनात हैं। शहर के 15 वार्डों में कचरा उठाने के लिए 9 वाहन चलते हैं। यही वाहन कचरे को निस्तारण स्थल तक पहुंचाते हैं।
कचरा कहां से आता है
खाद के लिए कचरा कई जगह से आता है। इसमें घरों का कचरा शामिल है। दुकानों और होटलों का कचरा भी इसमें आता है। सब्जी मंडी का कचरा भी इसी में जुड़ता है।
सब्जी मंडी का कचरा खाद के लिए अच्छा माना जाता है। इसमें फल और सब्जियों के छिलके और डंठल भरपूर होते हैं। यह कचरा जैविक होता है, इसलिए आसानी से सड़कर खाद बन जाता है।
घर पर ही अलग होता है कचरा
कचरे को अलग करने का काम घरों से ही शुरू हो जाता है। गीले कचरे के लिए हरा डिब्बा रखा गया है। सूखे कचरे के लिए नीला डिब्बा है।
गीले कचरे में फल, सब्जी और खाने का बचा सामान आता है। सूखे कचरे में प्लास्टिक, कागज और ऐसी चीजें आती हैं। जब कचरा पहले से अलग हो, तो आगे का काम आसान हो जाता है। इसलिए लोगों से डिब्बों का सही इस्तेमाल करना जरूरी है। कचरा मिला हो, तो खाद बनाना मुश्किल हो सकता है।
निस्तारण स्थल पर काम
कचरा जब निस्तारण स्थल पर पहुंचता है, तो दोबारा छंटाई होती है। कर्मचारी दस्ताने और मास्क पहनकर काम करते हैं। वे प्लास्टिक, कागज, गत्ता, धातु, कांच और कपड़ा अलग करते हैं। यह सूखा कचरा रिसाइकलिंग के लिए गट्ठर बनाकर रखा जाता है। इसे दोबारा इस्तेमाल के लिए भेजा जा सकता है।
बचा हुआ जैविक कचरा खाद के लिए अलग रखा जाता है। इसमें फल और सब्जी के छिलके, फूल और चायपत्ती शामिल हैं। बचा हुआ खाना भी इसी में डाला जाता है।
खाद बनने की पूरी प्रक्रिया
जैविक कचरा पहले कंपोस्ट शेड में पहुंचता है। वहां इसे लंबी कतारों में ढेर के रूप में रखा जाता है। इन्हें विंडरो कहते हैं। ढेर पर छाछ और गुड़ का पानी छिड़का जाता है। यह घोल सूक्ष्म जीवाणुओं का कल्चर बनता है। ये जीवाणु कचरे को सड़ाकर खाद में बदलते हैं।
ढेर को समय समय पर पलटा जाता है। इससे हवा हर हिस्से तक पहुंचती है। कर्मचारी नमी और तापमान पर भी नजर रखते हैं। दोनों सही रहें, तो खाद अच्छी बनती है।
45 दिन में तैयार जैविक खाद
इस पूरी प्रक्रिया में करीब 45 दिन लगते हैं। इसके बाद खाद तैयार मानी जाती है। फिर उसे छलनी मशीन से छाना जाता है। छनाई के बाद बारीक और साफ खाद अलग हो जाती है। जो मोटा हिस्सा बचता है, उसे दोबारा प्रक्रिया में डाल दिया जाता है। इस तरह कुछ भी बर्बाद नहीं होता।
कीमत और पैकिंग
परिषद ने खाद की कीमत 4 रुपए प्रति किलो रखी है। इस हिसाब से 50 किलो की बोरी 200 रुपए की पड़ती है। यह गणित सीधा है। 50 किलो को 4 रुपए से गुणा करें, तो 200 रुपए बनते हैं।
यही दर एक क्विंटल के लिए करीब 400 रुपए बैठती है। यह हिसाब अलग से जोड़ा गया है। खरीदार इसे अपनी जरूरत के हिसाब से समझ सकते हैं।
बोरियों को तौलकर भरा जाता है। उन पर “जैविक खाद, नगर परिषद शाहपुर” का लेबल लगाया जाता है। खाद किसान, उद्यान, नर्सरी और आम नागरिक खरीद सकते हैं।
किसानों के लिए क्या फायदा
जैविक खाद आम तौर पर मिट्टी की सेहत के लिए अच्छी मानी जाती है। यह मिट्टी की बनावट सुधारने में मदद करती है। यह नमी रोकने में भी सहायक होती है। यह सामान्य जानकारी है, इस खबर का दावा नहीं।
अक्टूबर का समय रबी की तैयारी का होता है। ऐसे में खेत तैयार करने वाले किसान जैविक खाद देख सकते हैं। कम कीमत इसे छोटे किसानों के लिए भी आसान बना सकती है।
खरीदने से पहले किसान खाद की हालत देख लें। खाद भुरभुरी और बिना बदबू की हो, तो बेहतर माना जाता है। मात्रा के बारे में अपने कृषि अधिकारी से सलाह लेना ठीक रहेगा।
शहर के काम में खाद की कमाई
खाद बेचने से जो पैसा आता है, उसका इस्तेमाल शहर में होगा। इसे शहर के विकास और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च किया जाएगा। यानी कचरे से बनी खाद परिषद की आमदनी का जरिया भी है।
यह पहल कचरे के बोझ को कम करने में भी मदद करती है। गीला कचरा खाद बने, तो निस्तारण स्थल पर कचरा कम जमा होता है।
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