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32 साल से लंबित किशाऊ परियोजना पर छह राज्यों में ऐतिहासिक समझौता, राजस्थान को कितना फायदा, समझें पूरा गणित

newz@gmail.com | Sep 15, 2026, 22:12 IST

किशाऊ परियोजना पर छह राज्यों ने समझौता किया है। राजस्थान भी इसमें शामिल है। परियोजना से पानी और सिंचाई का फायदा मिल सकता है। परियोजना से राजस्थान को क्या मिलेगा? पानी, सिंचाई और लागत का फायदा-नुकसान समझें

किशाऊ परियोजना

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर बड़ा समझौता हुआ है। राजस्थान समेत छह राज्यों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता मंगलवार को दिल्ली में हुआ। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल मौजूद रहे।

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा भी बैठक में शामिल हुए। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल और हरियाणा के मुख्यमंत्री भी मौजूद रहे। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी समझौते में शामिल रहीं। यह परियोजना करीब 32 साल से अटकी थी। अब छह राज्यों की सहमति से रास्ता साफ हुआ है। परियोजना टोंस नदी पर बांध बनाने से जुड़ी है।

राजस्थान के लिए यह समझौता खास महत्व रखता है। राज्य पहले से पानी की कमी झेलता रहा है। ऐसे में यमुना बेसिन का अतिरिक्त भंडारण महत्वपूर्ण हो सकता है।

राजस्थान को पानी का फायदा

किशाऊ परियोजना से राजस्थान को पानी का फायदा मिलने की उम्मीद है। केंद्र सरकार ने जून में इसकी सहमति स्पष्ट की थी। उस समय हिमाचल के हिस्से का पानी बांटने पर सहमति बनी। इस पानी में राजस्थान और दिल्ली को हिस्सा मिलेगा।

यह फैसला राजस्थान के लिए सबसे अहम पहलू है, क्योंकि राजस्थान को अपने हिस्से का पानी चाहिए। इससे पहले भी राज्य इस हिस्से की मांग करता रहा है।

जून 2026 में राजस्थान और हरियाणा के बीच सहमति बनी थी। तब राजस्थान के हिस्से के पानी पर चर्चा हुई थी। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने अपनी मांग स्पष्ट की थी। राजस्थान ने अपने तय हिस्से का पानी मांगा था।

राजस्थान के आर्थिक सर्वे में भी पानी का आंकड़ा दर्ज है। 1994 के समझौते में 577 एमसीएम पानी आवंटित बताया गया है। यह पानी जुलाई से अक्टूबर के दौरान उपलब्ध होना था।

किसानों को कैसे फायदा होगा?

किशाऊ परियोजना का फायदा सिर्फ पेयजल तक सीमित नहीं है। परियोजना से करीब 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता बनने का लक्ष्य है। इसका लाभ छह राज्यों के जल क्षेत्र में मिलेगा। राजस्थान के लिए सिंचाई क्षमता बढ़ना बड़ा फायदा हो सकता है। खासकर पानी की कमी वाले इलाकों में इसका असर दिख सकता है। हालांकि राजस्थान को कितनी अतिरिक्त सिंचाई मिलेगी, स्पष्ट नहीं है। इसकी अंतिम स्थिति पानी बंटवारे की व्यवस्था पर निर्भर करेगी।

किशाऊ की जल हिस्सेदारी 1994 की व्यवस्था से जुड़ी है, इसलिए राजस्थान का लाभ समझौते की शर्तों पर निर्भर रहेगा। सिर्फ परियोजना बनने से हर खेत तक पानी नहीं पहुंचेगा।

इसके लिए आगे वितरण व्यवस्था बनानी होगी। पाइपलाइन, नहर और भंडारण जैसी व्यवस्थाएं जरूरी होंगी। राज्य को इस हिस्से पर अलग से काम करना होगा।

परियोजना कितनी बड़ी है?

किशाऊ बांध टोंस नदी पर बनाया जाएगा। टोंस नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। बांध की ऊंचाई करीब 232.6 मीटर होगी। परियोजना में करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी जमा होगा। इससे उत्तर भारत की पानी जरूरतों को मदद मिलेगी। परियोजना से करीब 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई का लक्ष्य है।

इससे करीब 1,476 मिलियन यूनिट बिजली भी बनेगी। बिजली उत्पादन परियोजना का एक अहम हिस्सा है। परियोजना का मुख्य फायदा जल भंडारण से जुड़ा है। परियोजना से यमुना में पर्यावरणीय प्रवाह भी बढ़ेगा। किशाऊ के पानी का 25 प्रतिशत हिस्सा महत्वपूर्ण होगा। इससे यमुना में पानी बनाए रखने में मदद मिलेगी।

राजस्थान के लिए सबसे बड़ा फायदा

राजस्थान के लिए सबसे बड़ा फायदा पानी की उपलब्धता है। खासकर पेयजल संकट वाले इलाकों को राहत मिल सकती है। राज्य के कई हिस्से लंबे समय से जल संकट झेलते हैं।

राजस्थान पहले ही यमुना जल हिस्सेदारी का मुद्दा उठा चुका है। जून में हरियाणा ने राजस्थान का हिस्सा देने पर सहमति जताई। इससे दोनों राज्यों के बीच पुराना विवाद कम हुआ।

हरियाणा और राजस्थान ने 2024 में एक अलग समझौता किया था। इसका लक्ष्य हथिनीकुंड से पानी राजस्थान पहुंचाना था। पहले चरण में 577 एमसीएम तक पानी पहुंचाने की योजना है।

किशाऊ के बाद व्यवस्था और मजबूत हो सकती है, क्योंकि तीन बड़े भंडारण प्रोजेक्ट पानी रोकने में मदद करेंगे। इनमें किशाऊ, लखवार और रेणुकाजी परियोजनाएं शामिल हैं।

राजस्थान को नुकसान कहां हो सकता है?

किशाऊ परियोजना से सीधे बड़े नुकसान का संकेत नहीं है। फिर भी राजस्थान के लिए कुछ जोखिम जरूर हैं। सबसे बड़ा सवाल पानी की वास्तविक उपलब्धता से जुड़ा है। परियोजना में छह राज्यों के हित जुड़े हैं, इसलिए पानी का बंटवारा सहमति से होगा। राजस्थान को अपने हिस्से के लिए लगातार समन्वय रखना होगा।

दूसरा मुद्दा परियोजना की लागत से जुड़ा है। जल घटक की 90 प्रतिशत लागत केंद्र उठाएगा। बाकी 10 प्रतिशत लागत छह राज्य साझा करेंगे, इसलिए राजस्थान पर कुछ वित्तीय जिम्मेदारी आएगी। हालांकि यह बोझ कुल परियोजना लागत के मुकाबले सीमित रहेगा। राज्य के लिए असली सवाल लाभ के अनुपात का है।

तीसरा जोखिम परियोजना में देरी का है। यह परियोजना पहले ही दशकों तक अटकी रही है। तकनीकी और राज्यों के बीच सहमति से देरी हुई थी। अगर निर्माण फिर धीमा हुआ, लाभ भी टल जाएगा, इसलिए समझौते के बाद तेजी से काम जरूरी है।

किशाऊ परियोजना राजस्थान के लिए अवसर लेकर आई है। पानी की संभावित हिस्सेदारी इसका सबसे बड़ा फायदा है। सिंचाई और पेयजल दोनों क्षेत्रों में असर पड़ सकता है। नुकसान की तुलना में लाभ की संभावना ज्यादा दिखती है, लेकिन राजस्थान को अपनी हिस्सेदारी पर नजर रखनी होगी। परियोजना की लागत में राज्य की भागीदारी भी रहेगी।

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