बुंदेलखंड की खेती को अक्सर पानी की कमी से जोड़कर देखा जाता है। मौसम की मार भी यहां किसानों की बड़ी चुनौती रही है। लेकिन सागर जिले के एक किसान ने यह धारणा बदल दी है। खुरई तहसील के खिमलासा गांव के अमित जैन ने नई राह चुनी। उन्होंने पारंपरिक फसलों से हटकर विदेशी सब्जियों की खेती शुरू की। आज उनकी उपज सागर से निकलकर दिल्ली तक पहुंच रही है। करीब सात एकड़ की इस खेती ने उन्हें अलग पहचान दिलाई है।
मेडिकल शॉप से खेत तक
अमित जैन की उम्र 43 साल है। उन्होंने बी.कॉम. तक पढ़ाई की है। खेती में आने से पहले वह मेडिकल शॉप चलाते थे। साल 2012 में उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की खेती की जिम्मेदारी उन पर आ गई। पिता की इच्छा थी कि बेटा खेती में कुछ नया करे। इसी सोच ने अमित जैन को आधुनिक कृषि की ओर मोड़ा। उन्होंने सबसे पहले सरकारी कृषि योजनाओं की जानकारी जुटाई। इसके बाद उद्यानिकी विभाग, सागर से आधुनिक खेती का प्रशिक्षण लिया। यह प्रशिक्षण ही उनके नए प्रयोग की बुनियाद बना।
सात एकड़ में विदेशी सब्जी
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्होंने खेत में नया प्रयोग शुरू किया। करीब सात एकड़ रकबे में आधुनिक सब्जी उत्पादन खड़ा किया गया। इसमें ब्रोकली और रेड कैबेज की खेती शामिल है। चाइना कैबेज और लेट्यूस जैसी सब्जियां भी वह उगाते हैं। ये सभी उन्नत और विदेशी किस्में मानी जाती हैं। बुंदेलखंड में इस तरह की खेती अब भी कम देखी जाती है। यही वजह है कि उनका प्रयोग इलाके में चर्चा का विषय बना।
क्या हैं ये सब्जियां
ब्रोकली दिखने में फूलगोभी जैसी होती है। इसका रंग हरा होता है और स्वाद अलग होता है। रेड कैबेज लाल और बैंगनी रंग की पत्तागोभी होती है। चाइना कैबेज की पत्तियां नरम और लंबी होती हैं। लेट्यूस का इस्तेमाल ज्यादातर सलाद में किया जाता है। बड़े शहरों के होटल और रेस्तरां इनके प्रमुख खरीदार होते हैं। यही वजह है कि इनके दाम आम सब्जियों से ऊंचे रहते हैं।
दिल्ली तक पहुंची उपज
अमित जैन की सब्जियों की मांग अब स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। उनकी उपज सागर के अलावा भोपाल और इंदौर भेजी जाती है। दिल्ली की मंडियों तक भी यह सप्लाई पहुंच रही है। बड़े होटलों में विदेशी सब्जियों की मांग लगातार बनी रहती है। किसान के मुताबिक कई मौकों पर दाम अच्छे मिल जाते हैं। उनका कहना है कि भाव 50 रुपए प्रति किलो से ऊपर तक जाते हैं। मांग बढ़ने पर कई बार ऑर्डर इतने आ जाते हैं। ऐसे में पूरी मांग पूरी कर पाना मुश्किल हो जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस खेती से उन्हें सालाना लाखों रुपए की आमदनी होती है।
कम पानी में बेहतर नतीजे
अमित जैन के मुताबिक आधुनिक सब्जी खेती में पानी कम लगता है। खराब मौसम का असर भी अपेक्षाकृत कम पड़ता है। बुंदेलखंड में पानी और मौसम दोनों बड़ी चुनौती बने रहते हैं। ऐसे इलाकों में यह तकनीक दूसरे किसानों के भी काम आ सकती है। सीमित सिंचाई साधन वाले किसानों के लिए यह मॉडल उपयोगी माना जा रहा है। कम रकबे में ज्यादा कमाई की गुंजाइश भी इसमें बनती है।
योजनाओं से मिली मदद
आधुनिक खेती खड़ी करने में सरकारी योजनाओं ने भी भूमिका निभाई। उद्यानिकी विभाग की योजनाओं से उन्हें सब्सिडी का लाभ मिला। यह मदद इरिगेशन सिस्टम लगाने में काम आई। पैक हाउस निर्माण के लिए भी उन्हें सब्सिडी दी गई। वर्मी कम्पोस्ट के लिए भी सहायता मिली। इससे खेत पर जरूरी सुविधाएं तैयार हो सकीं। उत्पादन के साथ फसल की गुणवत्ता भी बेहतर हुई। बाजार तक पहुंच भी पहले के मुकाबले आसान हो गई।
पैक हाउस की अहमियत
विदेशी सब्जियां जल्दी खराब होने वाली फसलों में गिनी जाती हैं। तोड़ने के बाद इन्हें ठंडक और सावधानी की जरूरत होती है। पैक हाउस में उपज की छंटाई और पैकिंग की जाती है। इससे दूर की मंडियों तक माल बेहतर हालत में पहुंचता है। लंबी दूरी की सप्लाई में यही कड़ी सबसे अहम साबित होती है। यही वजह है कि पैक हाउस पर सब्सिडी अहम मानी जाती है।
सेवा की कहानी में जिक्र
अमित जैन की यह कहानी सेवा संकल्प अभियान 2026 के तहत सामने आई है। इसे सेवा की कहानी श्रृंखला में शामिल किया गया है। इस श्रृंखला में प्रगतिशील किसानों के अनुभव सामने रखे जा रहे हैं। मकसद यह है कि दूसरे किसान भी इनसे सीख ले सकें।
किसानों के लिए सबक
अमित जैन का अनुभव बताता है कि खेती में सोच बदलना जरूरी है। बाजार की मांग समझकर फसल चुनना फायदे का सौदा हो सकता है। नई तकनीक और सरकारी योजनाओं का सही इस्तेमाल भी मायने रखता है। पारंपरिक फसलों से हटकर भी अच्छा बाजार मिल सकता है। खिमलासा का यह किसान आज बुंदेलखंड में अलग पहचान बना रहा है। उनकी खेती आसपास के इलाकों में एक मिसाल बनकर उभरी है।
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