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बड़वानी की रिंकु ने केले के तने से रेशा बनाकर बदली किस्मत, मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना से लगाई फाइबर यूनिट

newz@gmail.com | Sep 8, 2026, 17:22 IST

बड़वानी की रिंकु कुमावत ने केले के तने से रेशा बनाकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना से मदद लेकर लगाई यूनिट अब रोज 30 किलो रेशा बना रही है और 5 लोगों को रोजगार दे रही है।

केले के तने से रेशा

बड़वानी जिले के गांव एकलरा बसाहट में रिंकु आशीष कुमावत रहती हैं। यह गांव विकासखंड बड़वानी में आता है। इस पूरे जिले में केले की खेती बहुत होती है। हर साल यहां बड़ी मात्रा में केला उगाया जाता है। लेकिन केले की फसल के बाद उसका तना अक्सर बेकार पड़ा रहता है। किसान इसे खेत में यूं ही फेंक देते हैं।

रिंकु ने इसी तने को कमाई का जरिया बनाने की सोची। उन्होंने केले के तने से रेशा निकालने का काम शुरू किया। इसके लिए उन्होंने मां नर्मदा बनाना फाइबर नाम से यूनिट लगाई। यह यूनिट मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना के तहत शुरू हुई। इस योजना से उन्हें वित्तीय मदद मिली। सरकारी मदद मिलते ही उनका सपना हकीकत में बदल गया।

ऐसे किया निवेश और शुरुआत

रिंकु ने इस यूनिट में करीब 6.50 लाख रुपए का निवेश किया। यह पैसा मशीनरी लगाने में खर्च हुआ। रेशा निकालने के लिए खास मशीन लगाई गई। शुरुआत में उन्हें कुछ दिक्कतें भी आईं। लेकिन धीरे-धीरे उनका काम बढ़ने लगा। मेहनत और सही योजना ने रंग दिखाया। आज उनकी यूनिट अच्छी तरह चल रही है। अब वह हर महीने अच्छी कमाई कर पा रही हैं।

रिंकु ने रोजगार दिया और उत्पादन बढ़ाया

इस यूनिट से रिंकु खुद तो आत्मनिर्भर बनी हैं। साथ ही उन्होंने गांव के 5 अन्य लोगों को भी रोजगार दिया है। यूनिट में हर दिन करीब 30 किलो रेशा तैयार होता है। यह रेशा केले के तने से निकाला जाता है। रेशा निकालने के बाद उसे धूप में सुखाया जाता है।

कहां बिकता है यह रेशा

सूखा रेशा गुजरात के बाजारों में भेजा जाता है। मुख्य रूप से यह सूरत और अंकलेश्वर में बिकता है। इन शहरों में फाइबर कारोबार का बड़ा बाजार है। यहां के व्यापारी मध्य प्रदेश से रेशा मंगवाते हैं। रेशे की गुणवत्ता के हिसाब से दाम तय होता है। एक किलो रेशा 120 से 250 रुपए तक में बिकता है। अच्छी क्वालिटी का रेशा ज्यादा दाम दिलाता है। इससे रिंकु को हर महीने अच्छी आमदनी हो जाती है।

रेशे से बनती हैं कई चीजें

इस रेशे से कई तरह के सामान बनते हैं। इससे टोकरी, चटाई और झाड़ू बनाई जाती है। बैग बनाने में भी इस रेशे का उपयोग होता है। इको-फ्रेंडली पेपर बनाने में भी यह रेशा काम आता है। इस तरह केले का तना बेकार नहीं जाता।

रेशा निकालते समय तने से एक तरल पदार्थ भी निकलता है। इस तरल का उपयोग जैविक खाद और कीटनाशक की तरह होता है। इसे सब्जियों की फसल पर छिड़का जाता है। इससे किसानों को अलग से खर्च नहीं करना पड़ता। इस तरह पूरा तना किसी न किसी काम आता है। न कोई कचरा बचता है और न कोई नुकसान होता है। यही वजह है कि यह काम पर्यावरण के लिए भी अच्छा है।

कलेक्टर ने की यूनिट की तारीफ

हाल ही में बड़वानी कलेक्टर जयति सिंह ने यूनिट का दौरा किया। उनके साथ जिला पंचायत सीईओ (Chief Executive Officer) अर्पित गुप्ता भी मौजूद रहे। दोनों अधिकारियों ने रिंकु के काम को सराहा। उन्होंने कहा कि यह मॉडल बाकी महिलाओं के लिए प्रेरणा है। अधिकारियों ने इसे स्वरोजगार की अच्छी मिसाल बताया।

योजना की पूरी जानकारी

यह यूनिट मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना से जुड़ी है। इसे मध्य प्रदेश के MSME (Micro, Small and Medium Enterprises) विभाग ने बनाया है। इस योजना का मकसद युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ना है। सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग अपना काम शुरू करें। इसलिए योजना में आसान शर्तों पर पैसा दिया जाता है।

उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को 50 हजार से 50 लाख रुपए मिलते हैं। सेवा और खुदरा कारोबार को 50 हजार से 25 लाख रुपए तक मिलते हैं। यह पैसा बैंकों के जरिए दिया जाता है। इस योजना के लिए उम्र 18 से 45 साल तय है। आवेदक को कम से कम आठवीं पास होना चाहिए। आवेदन SAMAST पोर्टल यानी samast.mponline.gov.in पर किया जा सकता है। आवेदन की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है। ज्यादा जानकारी के लिए जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र से संपर्क करें। हर जिले में महाप्रबंधक इसकी जानकारी देते हैं।

गांव की महिलाओं के लिए मिसाल

रिंकु की कहानी बड़वानी जिले में चर्चा का विषय बनी है। उनकी मेहनत से गांव की कई महिलाओं को हौसला मिला है। कई महिलाएं अब उनसे यूनिट लगाने की जानकारी मांग रही हैं। अब जिले के और लोग भी ऐसे उद्यम शुरू करने की सोच रहे हैं।

खासकर वे युवा जो खेती के साथ कुछ नया करना चाहते हैं। सरकारी योजनाओं का सही उपयोग करके कोई भी आत्मनिर्भर बन सकता है। रिंकु की यह कहानी इसका जीता जागता उदाहरण है। यह कहानी बताती है कि छोटी सोच भी बड़ा बदलाव ला सकती है।

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