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एमपी के अरुण ने बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन कर चमकाई किस्मत, फिश फीड बेचकर बढ़ाई अपनी कमाई

newz@gmail.com | Oct 3, 2026, 17:14 IST

भोपाल के अरुण राठौर ने बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन शुरू किया। इसके साथ उन्होंने फिश फीड बेचने का काम भी शुरू किया। इससे उनकी आय के दो साधन बने और स्थानीय मत्स्य पालकों को फीड मिलने लगा।

मछली पालन

भोपाल के ग्राम शेरपुर निवासी अरुण राठौर ने नई राह तलाश की। वह पारंपरिक काम के साथ अतिरिक्त आमदनी चाहते थे। इसी तलाश ने उन्हें मत्स्य पालन की ओर बढ़ाया। उन्होंने बायोफ्लॉक पोंड तकनीक से मछली पालन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने सीहोर मत्स्य विभाग से संपर्क किया।

मत्स्य विभाग के सहायक संचालक कार्यालय से उन्हें जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने मत्स्य पालन को अतिरिक्त आय का साधन बनाया। शुरुआत में यह तकनीक उनके लिए नया अनुभव थी। पानी और मछलियों की देखरेख भी सीखनी पड़ी। धीरे-धीरे उन्होंने पालन की प्रक्रिया को समझना शुरू किया।

बायोफ्लॉक तकनीक में नियंत्रित जल व्यवस्था का इस्तेमाल होता है। इसमें सीमित क्षेत्र में मछली पालन किया जाता है। पानी की गुणवत्ता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। पर्याप्त ऑक्सीजन की उपलब्धता भी जरूरी रहती है। मछलियों के आहार का नियमित प्रबंधन भी करना पड़ता है।

शुरुआती चुनौतियों से सीखा

मछली पालन शुरू करने के बाद कई चुनौतियां सामने आईं। मछलियों को सही आहार देना उनके लिए नया काम था। पानी की गुणवत्ता बनाए रखना भी चुनौती थी। तकनीकी प्रबंधन को समझना भी जरूरी था। तैयार मछलियों के लिए बाजार तलाशना भी आसान नहीं था।

अरुण ने नियमित देखरेख और अनुभव से इन चुनौतियों को संभाला। समय के साथ उन्हें मछलियों की वृद्धि बेहतर दिखने लगी। तैयार मछली को बाजार में उचित मूल्य मिलने लगा। इन परिणामों से उनका भरोसा बढ़ा। इसके बाद उन्होंने अपना काम आगे बढ़ाने की सोची।

फिश फीड में दिखा नया अवसर

मछली पालन के दौरान अरुण ने एक जरूरत पहचानी। आसपास के मत्स्य पालकों को गुणवत्तापूर्ण फिश फीड चाहिए था। स्थानीय स्तर पर यह जरूरत उनके लिए नया अवसर बनी। उन्होंने मछली पालन के साथ फिश फीड बेचना शुरू किया।

इस फैसले से उनके पास आय के दो साधन हो गए। एक तरफ मछली उत्पादन से आमदनी होने लगी। दूसरी तरफ फिश फीड बिक्री से अतिरिक्त आय मिली। इससे उनके कारोबार का दायरा भी बढ़ने लगा।

स्थानीय मत्स्य पालकों को भी इसका फायदा मिला। उन्हें मछलियों के आहार के लिए स्थानीय सुविधा मिली। इससे फीड की तलाश में बाहर जाने की जरूरत घट सकती है। हालांकि, फीड की गुणवत्ता और कीमत का महत्व बना रहता है।

उत्पादन के साथ कारोबार भी बढ़ा

अरुण राठौर की पहल केवल मछली उत्पादन तक सीमित नहीं रही। उन्होंने इससे जुड़े दूसरे कारोबार को भी समझा। मछली पालन में फिश फीड की नियमित जरूरत रहती है। इसी जरूरत को उन्होंने अपने कारोबार से जोड़ लिया।

यह मॉडल स्थानीय मांग को समझने पर आधारित है। इसमें उत्पादन के साथ संबंधित सेवा भी जुड़ती है। इससे एक ही क्षेत्र से आय के नए रास्ते बनते हैं। अरुण ने इसी तरीके से अपना काम बढ़ाया।

बायोफ्लॉक तकनीक में प्रबंधन अहम

बायोफ्लॉक तकनीक में सिर्फ टैंक या पोंड बनाना पर्याप्त नहीं है। पानी की स्थिति पर लगातार नजर रखनी होती है। मछलियों को सही मात्रा में आहार देना जरूरी है। ऑक्सीजन की उपलब्धता पर भी ध्यान देना पड़ता है। इन कामों में लापरवाही उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।

अरुण के अनुभव में भी शुरुआत आसान नहीं थी। उन्होंने धीरे-धीरे तकनीकी पहलुओं को समझा। नियमित देखरेख से उन्हें पालन का अनुभव मिला। बाजार से जुड़ाव ने उनके कारोबार को आगे बढ़ाया।

किसानों के लिए क्या सीख है

अरुण की कहानी में मुख्य बात आय के नए अवसर हैं। उन्होंने एक व्यवसाय से जुड़ी दूसरी जरूरत पहचानी। फिर उसी जरूरत को अपने काम से जोड़ दिया। इससे कारोबार का दायरा बढ़ाने का रास्ता मिला।

किसान और ग्रामीण युवा स्थानीय मांग पर ध्यान दे सकते हैं। खेती या पशुपालन से जुड़े कई सहायक कारोबार होते हैं। ऐसे काम अतिरिक्त आय का जरिया बन सकते हैं। हालांकि, हर कारोबार में लागत और बाजार की जांच जरूरी है।

मत्स्य पालन में बाजार की भूमिका भी अहम रहती है। उत्पादन के बाद बिक्री की व्यवस्था जरूरी होती है। स्थानीय मांग की जानकारी कारोबार को दिशा दे सकती है। अरुण ने इसी जरूरत को फिश फीड बिक्री से जोड़ा।

यह मॉडल हर व्यक्ति के लिए समान परिणाम नहीं देता। स्थानीय पानी, बाजार और लागत की स्थिति अलग होती है। तकनीकी प्रशिक्षण लेकर शुरुआत करना इसलिए उपयोगी रहता है। मत्स्य विभाग से जानकारी लेना भी जरूरी हो सकता है।

अरुण ने कैसे बढ़ाया काम

अरुण ने पहले मछली उत्पादन पर ध्यान दिया। इसके बाद उन्होंने आसपास की जरूरत को समझा। उन्हें फिश फीड की स्थानीय मांग दिखाई दी। फिर उन्होंने फीड बिक्री को कारोबार से जोड़ा।

इससे उनका काम केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहा। मछली पालन और फीड बिक्री साथ चलने लगे। इससे आय के दो संभावित स्रोत बने। साथ ही स्थानीय मत्स्य पालकों को सुविधा मिली।

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