केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खेती को लाभकारी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने वैज्ञानिकों की निगरानी में प्रदर्शन प्लॉट लगाने को कहा। उन्होंने कहा कि किसानों को गांवों से बाहर निकालना लक्ष्य नहीं है। खेती से किसानों की आमदनी बढ़ाना प्राथमिक लक्ष्य होना चाहिए। किसान कई फसलें और अलग-अलग किस्में उगाते हैं। इसके बावजूद उन्हें उम्मीद के अनुसार लाभ नहीं मिलता।
शिवराज ने कहा कि उन्नत तकनीक खेतों तक पहुंचनी चाहिए। इससे खेती की लागत घटाने में सहायता मिल सकती है। गुणवत्ता और उत्पादकता में भी सुधार किया जा सकता है। उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर (Indian Council of Agricultural Research) का उल्लेख किया। परिषद के विभिन्न संस्थानों को किसानों से सीधे जुड़ने की जरूरत बताई गई।
इंदौर में हुआ प्रशिक्षण
राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने यह प्रशिक्षण आयोजित किया। कार्यक्रम पांच और छह अक्टूबर को इंदौर में हुआ। प्रशिक्षण का विषय उन्नत सोयाबीन उत्पादन और फसल संरक्षण था। इसमें मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण तकनीक भी शामिल रही।
सीहोर जिले के लगभग 20 चयनित किसानों ने प्रशिक्षण लिया। किसानों को वैज्ञानिकों से सीधे सवाल पूछने का अवसर मिला। कार्यक्रम में बाया और मकोड़िया गांवों के किसान शामिल हुए। सतार, निम्ना, चींच और चांदा से भी किसान पहुंचे।
ग्रहण, रिहेटी, बोरदी और सरदार नगर के किसान भी आए। कावदा और जहानपुर गांवों की भी भागीदारी रही। भैरूंदा, सलकनपुर और लाड़कुई क्षेत्र के किसान प्रशिक्षण में पहुंचे। चकल्दी और गोपालपुर क्षेत्र के किसानों ने भी हिस्सा लिया।
चार जिलों में चल रही परियोजना
यह प्रशिक्षण मध्य प्रदेश कृषि रोडमैप 2026 का हिस्सा है। इसके तहत चार जिलों में व्यापक कृषि परियोजना चल रही है। इन जिलों में रायसेन, विदिशा, सीहोर और देवास शामिल हैं। चयनित गांवों में उन्नत कृषि तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।
आईसीएआर के विभिन्न संस्थान प्रदर्शन प्लॉट तैयार कर रहे हैं। इन प्लॉटों पर नई तकनीकों का खेत स्तर पर परीक्षण होगा। वैज्ञानिक किसानों को नियमित तकनीकी मार्गदर्शन भी देंगे। इससे तकनीक अपनाने में आने वाली परेशानी समझी जा सकेगी। परियोजना में किसानों की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर है। प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम इसी उद्देश्य से आयोजित हो रहे हैं।
उन्नत बुआई की जानकारी
वैज्ञानिकों ने किसानों को उन्नत सोयाबीन उत्पादन तकनीक समझाई। विशेष ध्यान बेहतर बुआई पद्धतियों पर दिया गया। किसानों को रेज्ड-बेड पद्धति के फायदे बताए गए। इसमें फसल ऊंची क्यारियों पर बोई जाती है। ब्रॉड-बेड-फरो (Broad Bed and Furrow) तकनीक की जानकारी भी दी गई। इसे बीबीएफ पद्धति के नाम से भी जाना जाता है।
यह तकनीक खेत में बेहतर जल निकासी में मदद करती है। अधिक बारिश के दौरान जलभराव का खतरा कम हो सकता है। कम बारिश में नमी बचाने में भी यह उपयोगी है। इससे पौधों की स्थापना बेहतर बनाने में सहायता मिलती है। वैज्ञानिकों ने उत्पादन लागत घटाने के तरीके भी बताए। किसानों को स्थानीय मौसम के अनुसार तकनीक चुनने की सलाह मिली।
फसल सुरक्षा के तरीके
प्रशिक्षण में जैविक और अजैविक तनावों की जानकारी दी गई। मौसम, रोग और कीट फसल को प्रभावित कर सकते हैं। किसानों को खरपतवार प्रबंधन के व्यावहारिक तरीके बताए गए। समय पर नियंत्रण से पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा घटती है। रोग और कीट प्रबंधन पर अलग सत्र रखा गया। वैज्ञानिकों ने जरूरत आधारित उपचार अपनाने पर जोर दिया।
किसानों ने संस्थान के प्रदर्शन प्लॉटों का भ्रमण किया। वहां उन्होंने विभिन्न तकनीकों का खेत स्तर पर उपयोग देखा। वैज्ञानिकों ने हर तकनीक का व्यावहारिक पक्ष समझाया। किसानों की स्थानीय समस्याओं पर भी चर्चा की गई।
सोया उत्पाद बनाना सीखा
प्रशिक्षण में सोयाबीन के मूल्य संवर्धन पर विशेष जोर रहा। किसानों को प्रसंस्करण से अतिरिक्त आय की संभावनाएं बताई गईं। संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. नेहा पांडे ने सजीव प्रदर्शन किया। उन्होंने सोयाबीन से कई खाद्य उत्पाद बनाना सिखाया। इन उत्पादों में सोया दूध और सोया पनीर शामिल थे। किसानों ने सोया उपमा और हलवा बनाना भी सीखा।
सोया कुकीज बनाने की प्रक्रिया भी समझाई गई। प्रतिभागियों ने तैयार उत्पादों का स्वाद लिया। किसानों ने उत्पादों की गुणवत्ता और स्वाद की सराहना की। वैज्ञानिकों ने ग्रामीण स्तर पर छोटे कारोबार की संभावना बताई। कच्ची उपज बेचने से किसान को सीमित मूल्य मिलता है। प्रसंस्करण से उसी उपज का मूल्य बढ़ाया जा सकता है।
बीज इकाई का भ्रमण
किसानों ने संस्थान की बीज प्रसंस्करण इकाई भी देखी। उन्हें गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार करने की प्रक्रिया समझाई गई। वैज्ञानिकों ने बीज सफाई और ग्रेडिंग की जानकारी दी। सुरक्षित भंडारण से जुड़ी सावधानियां भी बताई गईं।
किसानों ने संस्थान के अनुसंधान कार्यक्रमों का निरीक्षण किया। उन्होंने वैज्ञानिकों से खेती की समस्याओं पर संवाद किया। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान देने का प्रयास हुआ। किसानों की जिज्ञासाओं का व्यावहारिक तरीके से जवाब दिया गया।
टीम ने संभाला प्रशिक्षण
कार्यक्रम संस्थान के निदेशक डॉ. कुंवर हरेंद्र सिंह के नेतृत्व में हुआ। डॉ. बीयू दुपारे ने कार्यक्रम में तकनीकी सहयोग दिया। डॉ. लोकेश कुमार मीना ने समन्वय की जिम्मेदारी संभाली। डॉ. संजीव कुमार और डॉ. हेमंत माहेश्वरी भी शामिल रहे। संस्थान के तकनीकी दल ने किसानों को मार्गदर्शन दिया।
वैज्ञानिकों ने कहा कि केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। तकनीक का खेतों में सफल उपयोग भी जरूरी है। प्रदर्शन और प्रशिक्षण से किसानों का भरोसा बढ़ सकता है। प्रत्यक्ष निगरानी से तकनीकी गलतियां भी समय पर सुधरेंगी।
किसानों की आय कैसे बढ़ेगी
बेहतर तकनीक से बीज और खाद का सही उपयोग होगा। इससे अनावश्यक लागत कम करने में सहायता मिल सकती है। जल प्रबंधन सुधरने से फसल नुकसान का जोखिम घटेगा। रोग और कीट की समय पर पहचान भी जरूरी होगी।
गुणवत्तापूर्ण उत्पादन से किसानों को बेहतर बाजार मिल सकता है। प्रसंस्करण से नए ग्रामीण कारोबार भी शुरू हो सकते हैं। योजना की सफलता नियमित निगरानी पर निर्भर रहेगी। किसानों की प्रतिक्रिया भी परियोजना में शामिल करनी होगी। प्रदर्शन प्लॉटों के नतीजे सार्वजनिक करना भी उपयोगी रहेगा। इससे दूसरे किसान भी सही तकनीक चुन सकेंगे।
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