मालवा-निमाड़ में कम बारिश का असर अब रबी तक पहुंच गया है। कुएं, तालाब और बोरिंग में पानी घट गया है। इसी वजह से किसान गेहूं छोड़कर चना और सरसों की ओर जा रहे हैं। छह प्रमुख क्षेत्रों में गेहूं का रकबा करीब 1.73 लाख हेक्टेयर घट सकता है।
किसान क्यों बदल रहे फसल
अब खेत में बचा पानी ही फसल तय कर रहा है। गेहूं को आम तौर पर 5 से 7 सिंचाई चाहिए। कई क्षेत्रों में दो सिंचाई लायक पानी भी मुश्किल से बचा है। इसी हिसाब से किसान तय कर रहे हैं कि गेहूं बोएं या चना-सरसों। यह फैसला जोखिम से बचने का है। आम तौर पर चना और सरसों को कम सिंचाई लगती है।
गेहूं का रकबा कितना घटेगा
छह प्रमुख क्षेत्रों में पिछले साल गेहूं 8.75 लाख हेक्टेयर में बोया गया था। इस बार यह करीब 7.02 लाख हेक्टेयर रहने का अनुमान है। यानी 1.73 लाख हेक्टेयर की कमी आ सकती है। यह करीब 20 फीसदी गिरावट है।
देवास में रकबा 3.20 लाख से घटकर 2.71 लाख हेक्टेयर रह सकता है। धार में यह 3.42 लाख से 2.90 लाख हेक्टेयर होने का अनुमान है। दोनों जिलों में बड़ी गिरावट दिखती है। सबसे बड़ा फर्क आलीराजपुर में है। वहां रकबा 43 हजार से घटकर करीब 21 हजार हेक्टेयर रह सकता है। यानी लगभग आधा।
इंदौर जिले के क्षेत्रों में भी कमी का अनुमान है। महू में रकबा 45 हजार से 35 हजार हेक्टेयर हो सकता है। सांवेर में 58 हजार से 40 हजार हेक्टेयर रह सकता है। देपालपुर में 67,200 से घटकर 45 हजार हेक्टेयर का अनुमान है।
कहां कितनी कम हुई बारिश
इंदौर जिले में महू की हालत सबसे खराब है। वहां सामान्य 34 इंच के मुकाबले सिर्फ 17.5 इंच बारिश हुई। यानी करीब आधी। सांवेर में 36 की जगह 22 इंच बारिश हुई। देपालपुर में 35 के मुकाबले 32.06 इंच बारिश हुई। धार में इस बार सिर्फ 19.4 इंच बारिश हुई। यहां सामान्य बारिश 33 इंच है। यह 12 साल में सबसे कम है।
देवास में सामान्य 42 इंच के मुकाबले 31 इंच पानी गिरा। झाबुआ में 773.4 मिलीमीटर की जगह 549.3 मिलीमीटर बारिश हुई। आलीराजपुर में 879.7 के मुकाबले 500.4 मिलीमीटर दर्ज हुई।
बारिश के बाद भी पानी नहीं टिका
धार में भूजल स्तर 25 से 35 मीटर नीचे पहुंच गया है। इसका सीधा असर बोरिंग और कुओं पर पड़ा है। संकट केवल कम बारिश का नहीं है।
देपालपुर में बारिश सामान्य से करीब 3 इंच कम हुई। यह कमी सिर्फ 8 फीसदी के आसपास है। फिर भी 50 फीट गहरे एक कुएं में सिर्फ 10 फीट पानी बचा है। किसान बेनेडिया तालाब में नर्मदा का पानी पहुंचाने की मांग कर रहे हैं।
सोनकच्छ में ज्यादा बारिश हुई। इसके बावजूद अगेरा तालाब लगभग खाली है। तालाब की क्षमता 1.93 एमसीएम (Million Cubic Metres) है। उसमें सिर्फ 0.12 एमसीएम पानी बचा है।
गौतमपुरा और सांवेर के हालात
गौतमपुरा क्षेत्र के करीब 40 गांवों में जलस्रोत तेजी से घट रहे हैं। इसलिए किसान गेहूं की जगह चना, सरसों और मसूर की ओर जा रहे हैं। उनका कहना है कि पानी की कमी में गेहूं पर भरोसा नहीं कर सकते।
सांवेर में नहरें, नदी और तालाब भी लगभग सूखे हैं। किसान बताते हैं कि बोरिंग में पानी बहुत घट गया है। पहले तीन बोरिंग से जितना पानी मिलता था, अब मुश्किल से मिलता है।
महू में गाजर, प्याज और लहसुन का रकबा घट रहा है। ये ज्यादा पानी वाली फसलें हैं। इनकी जगह चना, आलू, सरसों और अलसी का रकबा बढ़ रहा है।
सूखा घोषित करने की मांग
धार में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखा है। उसमें जिले को सूखा प्रभावित घोषित करने की मांग की गई है। मंत्री नागर सिंह चौहान ने भी सूखा घोषित करने की मांग उठाई है। उन्होंने किसानों के लिए राहत पैकेज की भी बात की है। यानी सत्ता और विपक्ष, दोनों ओर से मांग उठी है। सरकार का फैसला अभी सामने नहीं आया है।
बांधों में भी असमान भराव
पूर्वी मध्य प्रदेश के लगभग सभी बांध लबालब हैं। पश्चिमी हिस्से यानी मालवा-निमाड़ के ज्यादातर प्रमुख जलाशय खाली रह गए हैं। असमान बारिश से जल भंडारण में बड़ा अंतर आ गया है।
खंडवा का ओंकारेश्वर बांध अपनी क्षमता का सिर्फ 26.78 फीसदी भर सका है। वहीं, इंदिरा सागर बांध में 90.85 फीसदी पानी भरा है। यह देश में सबसे ज्यादा जल भंडारण क्षमता वाला बांध है।
जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट के मुताबिक प्रदेश में बारिश 13 फीसदी कम हुई। उनके मुताबिक इस साल जल प्रबंधन एक चुनौती है। उन्होंने कहा कि मालवा में पानी कम खर्च करने की रणनीति अपनाई जाएगी।
किसान क्या सावधानी रखें
बुवाई से पहले अपने खेत के पानी का हिसाब लगा लें। देखें कि कितनी सिंचाई संभव है। कम पानी में चना और सरसों बेहतर विकल्प हो सकते हैं। बीज और किस्म की सलाह कृषि विभाग से लें। कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) से भी पूछ सकते हैं। केंद्र ने प्रमाणित दलहन बीज पर सब्सिडी बढ़ाई है।
चना की नई किस्मों पर 75 फीसदी या 6,000 रुपए क्विंटल तक मदद है। इनमें जो रकम कम होगी, वही मिलेगी। सूखा घोषित हो, तो राहत के लिए फसल नुकसान की जानकारी दर्ज कराएं। इसके लिए तहसील या कृषि कार्यालय से संपर्क करें। ये सामान्य सलाह है।
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