मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में सोयाबीन किसानों की परेशानी बढ़ी है। कई किसानों को इस बार उम्मीद से कम उत्पादन मिला है। कुछ खेतों में फसल समय से पहले पीली पड़ गई। कई जगह फूल झड़ने की शिकायत भी सामने आई है। कुछ किसानों ने बारिश से नुकसान की बात कही है। गुलाबगंज क्षेत्र में कटाई का काम भी शुरू हो गया है, लेकिन कम उत्पादन ने किसानों का गणित बिगाड़ दिया है। कई किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल दिख रहा है। इसी बीच कृषि वैज्ञानिकों ने खेतों का निरीक्षण किया।
वैज्ञानिकों ने किन गांवों का दौरा किया?
कृषि वैज्ञानिकों की टीम ग्यारसपुर विकासखंड के गांवों में पहुंची। टीम ने कई खेतों में फसल की स्थिति देखी। अंडियाकलां गांव में सोयाबीन फसल का निरीक्षण हुआ। गूलरखेड़ी गांव में भी वैज्ञानिक खेतों तक पहुंचे। अटारीखेजड़ा और सुआखेड़ी में भी जांच की गई। चाठोली गांव में भी फसल की स्थिति देखी गई।
वैज्ञानिकों ने अलग-अलग किस्मों की स्थिति देखी। पौधों की बढ़वार का भी निरीक्षण किया गया। रोग और कीट प्रकोप की भी जांच हुई। संभावित उत्पादन का भी आकलन किया गया। वैज्ञानिकों ने किसानों से उनकी समस्याएं भी सुनीं।
कौन-कौन से वैज्ञानिक पहुंचे खेतों में?
निरीक्षण दल में राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञ शामिल थे। यह संस्थान इंदौर में स्थित है। पादप रोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव कुमार टीम में शामिल रहे। कीट विशेषज्ञ डॉ. लोकेश मीणा ने भी निरीक्षण किया। पादप प्रजनक डॉ. अनिता राणा भी टीम में रहीं। कृषि विज्ञान केंद्र विदिशा के वैज्ञानिक अक्षय उज्जवल भी मौजूद रहे।
वैज्ञानिकों ने खेतों की स्थिति किसानों के साथ समझी। उन्होंने फसल प्रबंधन को लेकर जरूरी सुझाव भी दिए। रोग और कीट नियंत्रण पर भी सलाह दी गई। किसानों को लगातार फसल निगरानी की सलाह मिली। लक्षण दिखने पर विशेषज्ञों से सलाह लेने को कहा गया।
एक बीघा में करीब एक बोरा उत्पादन
गुलाबगंज क्षेत्र में कम उत्पादन की तस्वीर ज्यादा साफ है। यहां कई खेतों में सोयाबीन की कटाई जारी है। अच्छी फसल वाले खेतों में हार्वेस्टर चल रहे हैं। कम उत्पादन वाले खेतों में मजदूर कटाई कर रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर मजदूरी महंगी होने की बात सामने आई है। इसलिए दूसरे क्षेत्रों से भी मजदूर बुलाए गए हैं। कटनी और शहडोल जैसे क्षेत्रों से मजदूर आए हैं। इससे किसानों की कटाई लागत और बढ़ रही है।
मुंगवारा गांव के किसान इदरीश खान ने उत्पादन बताया। उनके अनुसार एक बीघा में करीब एक बोरा मिला। किसान पहले ही कई मदों पर खर्च कर चुके हैं। इनमें बीज, खाद और दवा का खर्च शामिल है। जुताई और बोवनी पर भी किसानों की लागत लगी है। कटाई का खर्च भी अब जुड़ रहा है।
सोयाबीन पर निर्भर किसानों की परेशानी
चक हाटखेड़ा के किसान संतोष सोलंकी ने चिंता जताई। उनके अनुसार क्षेत्र में कई किसान सोयाबीन पर निर्भर हैं। धान की खेती में पानी की जरूरत ज्यादा होती है। धान में खेती का खर्च भी ज्यादा बताया गया है,इसलिए कई किसान सोयाबीन को प्राथमिकता देते हैं।
कम उत्पादन से लागत की भरपाई मुश्किल लग रही है। इससे किसानों की आर्थिक चिंता बढ़ गई है। इस बार कम उत्पादन ने किसानों की उम्मीदें कमजोर की हैं। फसल की कम उपज सीधे उनकी आमदनी पर असर डालती है। कटाई खर्च बढ़ने से परेशानी और बढ़ रही है।
कई गांवों में फसल प्रभावित होने की शिकायत
किसानों के अनुसार कई गांवों में सोयाबीन प्रभावित हुई है। इन गांवों में गुनआ और अंडिया शामिल हैं। मुंगवारा और माला में भी नुकसान की बात कही गई। चटोली और हथियाखेड़ा में भी किसान चिंतित हैं। सोजना वन और रकोली में भी परेशानी बताई गई। एरण और इकोदिया में भी उत्पादन प्रभावित बताया गया। कारारिया गांव का नाम भी किसानों ने बताया है।
कुछ किसानों ने फसल जल्दी पीली होने की बात कही। कुछ खेतों में फूल झड़ने की शिकायत मिली है। कुछ किसानों ने ज्यादा बारिश से नुकसान बताया। हालांकि नुकसान का अंतिम कारण अभी तय नहीं हुआ है, इसीलिए वैज्ञानिकों का खेत निरीक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अगली फसल के खर्च की भी चिंता
सोयाबीन का नुकसान केवल मौजूदा फसल तक सीमित नहीं है। किसानों के सामने अगली फसल का खर्च भी है। रबी सीजन में गेहूं और चने की तैयारी होगी। इसके लिए किसानों को जुताई करानी होगी। बीज और खाद का इंतजाम भी करना होगा। बोवनी के लिए भी अतिरिक्त पैसा चाहिए।
कम सोयाबीन उत्पादन से नकदी की कमी हो सकती है। इससे अगली फसल का खर्च जुटाना कठिन होगा। कई परिवारों पर अन्य घरेलू खर्च भी हैं। किसानों ने शादी-विवाह के खर्च का भी जिक्र किया है। इससे परिवारों पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।
किसानों ने मुआवजे की मांग उठाई
प्रभावित किसानों ने पहले प्रशासन को ज्ञापन दिया था। किसानों ने तहसीलदार के जरिए कलेक्टर को ज्ञापन भेजा। उन्होंने फसल नुकसान का मुद्दा प्रशासन के सामने रखा। अब किसान उचित नुकसान आकलन की मांग कर रहे हैं।
किसानों का कहना है कि नुकसान का सही सर्वे होना चाहिए। भारी नुकसान वाले किसानों को पर्याप्त राहत मिलनी चाहिए। मुआवजा मिलने से अगली फसल का खर्च जुट सकता है। इससे किसानों पर बढ़ता आर्थिक दबाव भी कम होगा।
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