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MP में श्योपुर की 42 महिलाओं ने खेती के साथ अपनी किस्मत भी बदली, 150 बीघा में उगा रहीं मिर्च, दिल्ली-जयपुर भेजी खेप

newz@gmail.com | Oct 12, 2026, 13:45 IST

मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले के माधो का डेरा गांव की 42 महिलाएं 150 बीघा में मिर्च उगा रही हैं। चार स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने पहली खेप जयपुर और दिल्ली की मंडियों में भेजी है। उन्हें इस खेती से बेहतर कमाई की उम्मीद है।

मिर्च की फसल

श्योपुर जिले में महिलाओं ने खेती का नया रास्ता अपनाया है। माधो का डेरा गांव की 42 महिलाएं मिर्च उत्पादन कर रही हैं। इन महिलाओं ने पारंपरिक फसलों के बजाय नकदी फसल पर ध्यान दिया है। करीब 150 बीघा जमीन पर मिर्च की खेती की जा रही है। महिलाओं की मेहनत अब खेतों में दिखाई देने लगी है। मिर्च की फसल तैयार हो चुकी है। खेतों में तुड़ाई भी शुरू हो गई है। उत्पादित मिर्च की पहली खेप जयपुर और दिल्ली की मंडियों में भेजी गई है। इससे महिलाओं को अपनी उपज बेचने के नए बाजार मिले हैं।

यह पहल केवल फसल बदलने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ाने की कोशिश भी है। गांव की महिलाओं के परिवारों के पास सीमित जमीन है। पारंपरिक फसलों से होने वाली कमाई उनकी जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं पड़ती थी। इसी समस्या को देखते हुए नकदी फसलों की खेती को बढ़ावा दिया गया।

चार समूहों से जुड़ी हैं महिलाएं

इस पहल में गांव के चार स्वयं सहायता समूह शामिल हैं। इनके नाम गुरुनानक, डॉ. अंबेडकर, माता गुलाब देवी और गुरुनारायण हैं। इन समूहों से जुड़ी कुल 42 महिलाएं मिर्च उत्पादन कर रही हैं। प्रत्येक महिला ने अपनी उपलब्ध जमीन के अनुसार खेती शुरू की है।

यह गांव श्योपुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। यहां महिलाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (National Rural Livelihoods Mission) के तहत सहयोग मिला। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आजीविका को मजबूत करना है।

समूहों के जरिए महिलाओं को खेती से जुड़ी गतिविधियों में आगे बढ़ाया जा रहा है। मिर्च जैसी नकदी फसल अपनाना इसी प्रयास का हिस्सा है। कम जमीन वाले परिवारों के लिए फसल का चुनाव महत्वपूर्ण होता है। इसलिए बाजार में बिकने वाली फसलों की ओर ध्यान दिया जा रहा है।

इस बदलाव से महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हुई है। वे उत्पादन से लेकर उपज बेचने तक की प्रक्रिया में शामिल हैं। पहली खेप का मंडियों तक पहुंचना इस प्रयास का शुरुआती पड़ाव है। अब फसल की आगे होने वाली बिक्री पर भी नजर रहेगी।

18 लाख रुपए से जुटाए संसाधन

मिर्च की खेती शुरू करने के लिए चारों समूहों को आर्थिक मदद मिली। उन्हें लगभग 18 लाख रुपए की सीसीएल (Cash Credit Limit) राशि उपलब्ध कराई गई। इस रकम से खेती के जरूरी संसाधन जुटाए गए। इनमें बेहतर किस्म के बीज और खाद शामिल हैं।

महिलाओं ने अपनी जरूरत के अनुसार खेतों में मिर्च लगाई। प्रत्येक महिला ने लगभग दो से छह बीघा जमीन पर बुवाई की। इस काम में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की ओर से तकनीकी सहयोग भी मिला। खेती में वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने पर जोर दिया गया।

सिर्फ बीज और खाद जुटाना ही पर्याप्त नहीं होता। फसल को समय पर पानी देना भी जरूरी है। इसके लिए महिलाओं ने ड्रिप सिंचाई व्यवस्था अपनाई। उद्यानिकी विभाग की योजना के तहत अनुदान लेकर ड्रिप सिस्टम खरीदे गए। इससे खेतों में पानी देने की व्यवस्था की गई।

ड्रिप सिंचाई में पानी पौधों की जड़ों के पास पहुंचाया जाता है। इससे पानी को नियंत्रित तरीके से देने में मदद मिलती है। हालांकि, वास्तविक बचत मिट्टी, मौसम और सिंचाई प्रबंधन पर निर्भर करती है। इस पहल में आर्थिक मदद, तकनीकी सलाह और सिंचाई की व्यवस्था महत्वपूर्ण रही। इन संसाधनों ने महिलाओं को मिर्च उत्पादन शुरू करने में सहयोग दिया। अब तैयार फसल को बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।

अप्रैल तक होगी मिर्च की तुड़ाई

मिर्च उत्पादक महिला किसान सीमा बाई ने अपनी खेती का अनुभव साझा किया। उन्होंने पांच बीघा जमीन पर मिर्च लगाई है। उनके खेत में फसल की तुड़ाई शुरू हो चुकी है। उनकी मिर्च बिक्री के लिए जयपुर मंडी भेजी गई है।

सीमा बाई के अनुसार, मिर्च की तुड़ाई अप्रैल महीने तक चलने की उम्मीद है। इस अवधि में लगभग 12 बार तुड़ाई होने का अनुमान है। यानी फसल की उपज एक ही बार में नहीं निकाली जाएगी। अलग-अलग चरणों में मिर्च तोड़ने की योजना है।

उनके मुताबिक, एक बीघा में लागत निकालने के बाद करीब दो लाख रुपए की आमदनी हो सकती है। इस अनुमान के अनुसार, पांच बीघा से लगभग 10 लाख रुपए मिलने की उम्मीद है। यह सीमा बाई का बताया हुआ अनुमान है। इसे सभी महिलाओं की तय कमाई नहीं माना जाना चाहिए।

वास्तविक आमदनी कई बातों पर निर्भर करेगी। इसमें कुल उत्पादन, बाजार भाव और खेती की लागत शामिल हैं। मंडी तक पहुंचाने का खर्च भी अंतिम कमाई को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अनुमानित आय और वास्तविक लाभ में अंतर संभव है।

अधिकारियों ने क्या बताया?

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के नोडल अधिकारी अनुज विजयवर्गीय ने इस पहल की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कृषि सखियों के जरिए छोटे किसानों को नई फसलों से जोड़ा जा रहा है। इसमें पारंपरिक खेती के साथ नकदी फसलों और सब्जियों के उत्पादन पर ध्यान दिया जा रहा है।

उनके अनुसार, माधो का डेरा गांव में लगभग 150 बीघा जमीन पर मिर्च उत्पादन का क्लस्टर तैयार किया गया है। क्लस्टर का मतलब है, एक क्षेत्र में एक जैसी फसल का बड़े स्तर पर उत्पादन। इससे एक ही जगह फसल उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

मिशन के जिला परियोजना प्रबंधक (DPM) सोहनकृष्ण मुदगल ने भी इस पहल की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि महिलाओं को नकदी फसलों के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य किसानों की आमदनी बढ़ाने के प्रयासों को आगे बढ़ाना है।

उन्होंने यह भी बताया कि उद्यानिकी और मसाला फसलों के क्षेत्र में काम किया जा रहा है। इस तरह महिलाओं को खेती के दूसरे विकल्पों से जोड़ने की कोशिश हो रही है। हालांकि, अधिकारियों की ओर से इस रिपोर्ट में कुल उत्पादन या सभी समूहों की वास्तविक कमाई के आंकड़े नहीं दिए गए हैं।

क्या दूसरे किसान भी सीख सकते हैं?

श्योपुर की महिलाओं का यह उदाहरण छोटे किसानों के लिए उपयोगी जानकारी देता है। इसमें फसल का चुनाव, आर्थिक सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार तक पहुंच जैसे पहलू शामिल हैं। इन सभी बातों का खेती की योजना बनाते समय ध्यान रखना जरूरी है।

हालांकि हर किसान के लिए मिर्च की खेती लाभदायक होगी, ऐसा जरूरी नहीं है। फसल चुनने से पहले स्थानीय मिट्टी, पानी और मौसम की स्थिति समझनी चाहिए। बाजार में मिर्च की मांग और भाव का भी आकलन करना चाहिए।

खेती की लागत का हिसाब पहले तैयार करना भी जरूरी है। इसमें बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन का खर्च शामिल होना चाहिए। संभावित आमदनी की तुलना कुल लागत से करने पर जोखिम समझने में मदद मिलेगी।

महिलाओं के समूहों के लिए बाजार की जानकारी भी अहम है। दिल्ली और जयपुर की मंडियों में पहली खेप भेजना एक शुरुआती कदम है। आगे नियमित बिक्री और उचित भाव मिलने से इस पहल की सफलता का बेहतर आकलन हो सकेगा।

फिलहाल श्योपुर की 42 महिलाओं ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़ने की कोशिश की है। लगभग 150 बीघा में मिर्च उत्पादन उनके सामूहिक प्रयास को दिखाता है। अब फसल की बिक्री और वास्तविक कमाई के आंकड़े इस पहल के नतीजे बताएंगे।

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