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मध्यप्रदेश में गेहूं की फसल पर पानी का दबाव, क्या बदल जाएगी खेती की तस्वीर?

newz@gmail.com | Oct 12, 2026, 19:00 IST

मध्यप्रदेश में रबी सीजन से पहले गेहूं की सिंचाई और भूजल पर निर्भरता चिंता बढ़ा रही है। वैज्ञानिक कम पानी वाली किस्मों पर काम कर रहे हैं। नई तकनीक किसानों तक पहुंचाना अगली बड़ी चुनौती है।

गेहूं की फसल

रामानन्द तिवारी@भोपाल. मध्यप्रदेश में गेहूं की खेती अब ऐसे मोड़ पर है, जहां अच्छी पैदावार के साथ पानी की बचत भी जरूरी होती जा रही है। बदलता मौसम, भूजल पर निर्भरता और सिंचाई की बढ़ती लागत किसानों के सामने नई चुनौती खड़ी कर सकती है। कृषि वैज्ञानिक कम पानी में तैयार होने वाली किस्मों पर काम कर रहे हैं। लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब सही बीज, तकनीक और सिंचाई की जानकारी समय पर खेतों तक पहुंचेगी।

गेहूं की खेती में बदलने वाला है पानी का गणित

मध्यप्रदेश में रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं के लिए पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण मुद्दा बन रही है। मौसम में लगातार बदलाव और भूजल पर निर्भर खेती के कारण आने वाले वर्षों में सिंचाई की रणनीति बदलने की जरूरत पड़ सकती है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. श्रीनिवास राव के मुताबिक मध्य और दक्षिण भारत में पिछले एक-दो वर्षों के दौरान बारिश के स्वरूप में बदलाव देखने को मिला है। कहीं अत्यधिक वर्षा हुई तो कहीं सूखे जैसी परिस्थितियां बनीं। ऐसे में वैज्ञानिकों का ध्यान उन गेहूं की किस्मों पर है, जो सीमित सिंचाई में भी बेहतर उत्पादन दे सकें।

तीन-चार सिंचाई में तैयार होगा गेहूं?

वैज्ञानिक ऐसी किस्मों पर काम कर रहे हैं, जिन्हें तीन से चार सिंचाई में तैयार किया जा सके। इसका उद्देश्य पानी की खपत घटाते हुए उत्पादन को बनाए रखना है। हालांकि हर खेत में सिंचाई की जरूरत एक जैसी नहीं होती। मिट्टी की प्रकृति, तापमान, बारिश और फसल की अवस्था के अनुसार पानी की आवश्यकता बदलती है। इसलिए नई किस्मों के साथ किसानों को सिंचाई का सही समय और तकनीक समझाना भी जरूरी होगा।

भूजल पर निर्भर किसानों के सामने अलग चुनौती

मध्यप्रदेश के कई गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में ट्यूबवेल सिंचाई का प्रमुख साधन हैं। ऐसे इलाकों में भूजल स्तर नीचे जाने से पानी निकालने की लागत बढ़ सकती है। जिन किसानों के पास निजी सिंचाई साधन नहीं हैं, उन्हें पानी के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे खेती की लागत और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। कम पानी वाली किस्मों का महत्व ऐसे क्षेत्रों में अधिक हो सकता है, जहां सिंचाई की उपलब्धता सीमित है।

नई किस्में विकसित होंगी, लेकिन बीज कब मिलेगा?

वैज्ञानिक शोध का वास्तविक लाभ किसानों तक प्रमाणित बीज पहुंचने के बाद ही मिलेगा। इसके लिए बीज उत्पादन, उपलब्धता, स्थानीय जलवायु के अनुसार किस्मों का चयन और कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से तकनीकी जानकारी देना महत्वपूर्ण होगा। खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए नई किस्मों की कीमत तथा समय पर उपलब्धता अहम होगी।

पिछले दो वर्षों के मौसम ने क्या सिखाया?

वर्ष 2024 और 2025 के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश की असमानता और मौसम की अनिश्चितता ने खेती में जोखिम प्रबंधन की जरूरत को रेखांकित किया। इस अनुभव से स्पष्ट है कि केवल सामान्य मानसून के अनुमान के आधार पर खेती की योजना बनाना पर्याप्त नहीं है। मिट्टी में नमी, स्थानीय जल उपलब्धता और मौसम पूर्वानुमान को ध्यान में रखकर फसल प्रबंधन करने से जोखिम कम किया जा सकता है।

अक्टूबर की बारिश से कितना फायदा?

वैज्ञानिक ऐसी किस्मों पर भी ध्यान दे रहे हैं, जो बुवाई के समय मिट्टी में उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग कर सकें। अक्टूबर में बारिश होने पर कुछ क्षेत्रों में मिट्टी की नमी बढ़ सकती है। इससे शुरुआती सिंचाई की जरूरत कम होने की संभावना रहती है। हालांकि इसका लाभ बारिश की मात्रा, समय और मिट्टी की स्थिति पर निर्भर करेगा। केवल बारिश के भरोसे पूरी फसल तैयार करने की योजना व्यावहारिक नहीं होगी।

गेरुआ रोग से बचाव भी वैज्ञानिकों की प्राथमिकता

पानी के साथ गेहूं की फसल को बीमारियों से सुरक्षित रखना भी महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक गेरुआ यानी रस्ट रोग के प्रति प्रतिरोधी किस्मों पर काम कर रहे हैं। ऐसी किस्में बीमारी से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकती हैं।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रतिरोधी किस्मों से राष्ट्रीय स्तर पर करीब तीन हजार करोड़ रुपये की संभावित बचत का अनुमान बताया गया है। वास्तविक लाभ इनके इस्तेमाल और रोग की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

भूजल के आंकड़े क्या संकेत देते हैं?

केंद्रीय भूजल बोर्ड के वर्ष 2025 के आकलन के अनुसार मध्यप्रदेश में सालाना निकाले जा सकने वाले भूजल की मात्रा लगभग 34.15 अरब घनमीटर और वार्षिक निकासी करीब 20.26 अरब घनमीटर आंकी गई है।

प्रदेश में भूजल दोहन का औसत अनुपात लगभग 59.32 प्रतिशत है। हालांकि यह राज्य का औसत है। अलग-अलग क्षेत्रों में भूजल की स्थिति भिन्न हो सकती है। इसीलिए गेहूं उत्पादक जिलों में स्थानीय जल उपलब्धता के अनुसार सिंचाई प्रबंधन अधिक उपयोगी होगा।

अब खेतों तक तकनीक पहुंचाने की चुनौती

रबी सीजन में कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्रों और बीज उत्पादक संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कम सिंचाई वाली किस्मों का प्रदर्शन, प्रमाणित बीज की उपलब्धता, मिट्टी की नमी का संरक्षण और किसानों को समय पर सलाह देना उत्पादन बनाए रखने में मददगार हो सकता है।

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