मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड़ विकासखंड में एक किसान ने खेती का तरीका बदला है। भुताई गांव के कैलाश पवार ने पथरीली जमीन पर स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की। उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और योजना से मिली मदद ने इस बदलाव में साथ दिया। विभागीय जानकारी के अनुसार, स्ट्रॉबेरी की खेती से पवार को सालाना करीब 35 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा हो रहा है। उनकी उपज जबलपुर, नागपुर, इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में भेजी जाती है। इससे उनकी खेती स्थानीय बाजार से आगे तक पहुंची है।
परंपरागत खेती से कम थी आय
कैलाश पहले परिवार की करीब 16 हेक्टेयर जमीन पर परंपरागत फसलें उगाते थे। सिंचाई के लिए उनके पास कुएं और नलकूप की सुविधा थी। फिर भी परिवार को खेती से सालभर में करीब छह लाख की आय होती थी। अधिक आमदनी के लिए उन्होंने फसल बदलने और नई तकनीक अपनाने का रास्ता चुना। खेती में बदलाव का फैसला उन्होंने उपलब्ध जमीन और विभागीय मार्गदर्शन को देखते हुए लिया।
पवार ने करीब 2.4 हेक्टेयर जमीन पर स्ट्रॉबेरी लगाई। यह रकबा लगभग पांच से छह एकड़ के बराबर बताया गया है। परिवार की कुल जमीन और स्ट्रॉबेरी का रकबा अलग-अलग हैं। स्ट्रॉबेरी पूरे 16 हेक्टेयर में नहीं उगाई गई।
योजना से मिले तकनीकी साधन
उद्यानिकी विभाग की योजना के तहत वर्ष 2023-24 में पवार को तकनीकी साधनों का लाभ मिला। इनमें ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और पोटेटो प्लांटर शामिल थे। विभाग ने खेती से जुड़े तकनीकी मार्गदर्शन में भी सहयोग दिया।
ड्रिप सिंचाई से पौधों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है। मल्चिंग में जमीन को ढककर फसल के लिए अनुकूल स्थिति बनाने की कोशिश होती है। पवार ने इन साधनों और तकनीकों के सहारे स्ट्रॉबेरी उत्पादन शुरू किया।
वर्ष 2024-25 से उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की। यह कदम पारंपरिक फसलों से बागवानी की ओर बदलाव था। खेती की नई पद्धति अपनाने के लिए उन्होंने जमीन के एक हिस्से का उपयोग किया।
करीब 1.30 लाख पौधों से उत्पादन
पवार ने स्ट्रॉबेरी के करीब 1 लाख 30 हजार पौधे लगाए। जानकारी के मुताबिक, फसल करीब 70 दिनों में तैयार हो गई। फल की तुड़ाई मार्च के अंत तक चलती है।
फसल तैयार होने के बाद उपज को बाजार तक पहुंचाना भी जरूरी था। पवार ने अपनी स्ट्रॉबेरी जबलपुर, नागपुर, इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में भेजी। इन बाजारों तक आपूर्ति ने उनकी बिक्री का दायरा बढ़ाया।
किसान को 35 लाख रुपए का मुनाफा
पवार को स्ट्रॉबेरी की खेती में सालाना करीब 30 लाख रुपए की लागत आती है। इस खेती से उनकी आय करीब 65 लाख रुपए बताई गई है। दोनों आंकड़ों का अंतर करीब 35 लाख रुपए है। यह रकम स्ट्रॉबेरी से होने वाला अनुमानित शुद्ध मुनाफा है। इसमें सब्जियों से होने वाला अतिरिक्त लाभ शामिल नहीं है। पवार सब्जियों का उत्पादन भी करते हैं।
किसान की कमाई बाजार की मांग और बिक्री पर भी निर्भर करती है। उत्पादन अच्छा होने के साथ उपज को सही समय पर बेच पाना जरूरी होता है। पवार की उपज शहरों तक भेजी जाती है, जिससे उन्हें कई बाजारों में बिक्री का अवसर मिलता है।
कृषि और उद्यानिकी विभाग की भूमिका
इस मामले में उद्यानिकी विभाग ने तकनीकी मार्गदर्शन और योजना के जरिए सहायता दी। शासन और विभाग किसानों को परंपरागत फसलों के साथ नए विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पवार ने इसी मार्गदर्शन के बाद स्ट्रॉबेरी की खेती का प्रयोग किया।
किसान को उपलब्ध तकनीक, सही जानकारी और बाजार से जुड़ाव मिले तो नई फसल अपनाना आसान हो सकता है। पवार के मामले में विभागीय मदद के साथ उनकी अपनी पहल भी अहम रही। उन्होंने परिवार की कुल जमीन में से एक हिस्सा नई खेती के लिए चुना।
कृषि योजनाओं का लाभ लेने वाले किसानों के लिए स्थानीय मिट्टी और पानी की स्थिति समझना जरूरी है। फसल की लागत, तकनीकी जरूरत और बिक्री के रास्ते पहले जानना भी मददगार हो सकता है। पवार के मामले में विभागीय मार्गदर्शन के साथ बाजार तक आपूर्ति का रास्ता भी बना।
स्ट्रॉबेरी खेती हर जगह समान नतीजा देगी, यह कहना सही नहीं होगा। किसान को अपने इलाके की जलवायु, जमीन और उपलब्ध सुविधाओं के अनुसार फैसला करना होता है। यहां दिए गए मुनाफे के आंकड़े कैलाश पवार की खेती से जुड़े हैं।
पथरीली जमीन पर खेती का नया प्रयोग
पवार की जमीन को पथरीली बताया गया है। उन्होंने इसी जमीन के एक हिस्से पर तकनीकी साधनों की मदद से स्ट्रॉबेरी उगाई। इस बदलाव ने खेती के लिए कम उपयोगी मानी जा रही जमीन को नए उत्पादन से जोड़ा।
कहानी का अहम पहलू केवल स्ट्रॉबेरी की कीमत या मुनाफा नहीं है। इसमें किसान का फसल बदलने का फैसला, विभागीय मार्गदर्शन और बाजार तक पहुंचने की कोशिश भी शामिल है। इन सभी बातों ने मिलकर खेती को नया रूप दिया।
पवार अब हर साल स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। इससे उनके परिवार की आय का एक नया स्रोत बना है। सब्जियों का उत्पादन भी उनकी खेती से अतिरिक्त लाभ दे रहा है।
यह उदाहरण दूसरे किसानों के लिए जानकारी का आधार बन सकता है। वे विभाग से तकनीकी सलाह और योजना की पात्रता पूछ सकते हैं। किसी भी नई फसल में निवेश से पहले लागत और बाजार की जानकारी लेना जरूरी है।
कैलाश पवार की पहल दिखाती है कि खेती में बदलाव से अवसर बन सकते हैं। सरकारी योजना और विभागीय मार्गदर्शन इस बदलाव को सहारा दे सकते हैं। मगर अंतिम परिणाम किसान की स्थानीय परिस्थितियों और बाजार की मांग पर निर्भर करेगा।
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