हर साल 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। 2026 का संदेश है “आज का नवाचार, कल का पोषण”। यह दिन भूख और पोषण के सवाल पर सोचने का मौका देता है। इस बार जोर थाली में पोषण और खेत में तकनीक पर है। सवाल सीधा है। जब दुनिया में सबके लिए अनाज है, तो लोग भूखे क्यों हैं।
विश्व खाद्य दिवस का संदेश
इसका सीधा अर्थ है कि आज की सोच कल का पोषण तय करेगी। खेती में नई तकनीक, बेहतर बीज और समझदारी भरे तरीके इसी का हिस्सा हैं। मकसद है कि हर थाली तक पौष्टिक खाना पहुंचे। यह सिर्फ पेट भरने की बात नहीं है। खाना ऐसा हो, जिससे शरीर को सही पोषण मिले। इसी वजह से इस बार खेत और थाली साथ जोड़े गए हैं।
भूख के आंकड़े क्या कहते हैं
एफएओ के मुताबिक दुनिया में करीब 64.5 करोड़ लोग भूखे हैं। करीब 269 करोड़ लोग पौष्टिक खाना खरीदने की हालत में नहीं हैं। यानी हर तरफ से चुनौती बड़ी है। दुनिया में इतना अनाज उगता है कि सबका पेट भर जाए। फिर भी भूख बनी हुई है। इसका मतलब है कि दिक्कत सिर्फ उत्पादन की नहीं है।
खाना सही जगह, सही दाम पर और समय पर पहुंचना भी जरूरी है। जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनके लिए भरपूर अनाज भी बेकार है। इसी कमी को दूर करने पर इस दिन जोर दिया जाता है।
भारत ने क्या रास्ता दिखाया
भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। कभी यहां अनाज की कमी थी। आज देश अपनी आबादी का पेट भरता है और अनाज निर्यात भी करता है।
भारत ने कई कदमों से नया रास्ता दिखाया है। इनमें डिजिटल खेती शामिल है। किसानों तक यूपीआई (Unified Payments Interface) से सीधी मदद भी गिनाई गई है।
सॉइल हेल्थ कार्ड और पीएम किसान योजना भी इसी कड़ी में बताई गई हैं। बाजरा जैसे पौष्टिक अनाज को श्री अन्न के रूप में बढ़ावा मिल रहा है। ये कदम किसान और थाली, दोनों से जुड़े हैं।
खेत में तकनीक का असर
डिजिटल सलाह सेवाएं किसानों के काम आ रही हैं। मोबाइल पर मौसम, फसल की बीमारी और मंडी भाव की जानकारी मिल जाती है। इससे किसान समय पर फैसला ले पाता है।
ड्रोन से छिड़काव, बेहतर बीज और जैविक खेती से पैदावार बढ़ रही है। समय पर मौसम की जानकारी और फसल बीमा से नुकसान घट सकता है।
आधुनिक विज्ञान और स्थानीय अनुभव को साथ लाना होगा। आदिवासी और स्थानीय समुदायों के पास पानी बचाने और जैविक खेती का ज्ञान है। यह ज्ञान आज भी काम आ सकता है।
खाने की बर्बादी और पानी
कटाई के बाद करीब 13 प्रतिशत खाना खराब हो जाता है। दुकानों और घरों में 19 प्रतिशत खाना बर्बाद होता है। यानी भूख के बीच भी बहुत खाना कचरे में जाता है।
खेती में दुनिया का 70 प्रतिशत मीठा पानी इस्तेमाल होता है। इसलिए कम पानी में ज्यादा फसल लेना जरूरी है। मिट्टी की सेहत सुधारना भी उतना ही अहम है।
भारत में कोल्ड स्टोरेज और गोदाम कम होने से फल सब्जियां खराब होती हैं। इससे किसान की मेहनत बेकार जाती है। घटता भूजल भी बड़ी चिंता के रूप में गिनाया गया है।
महिला किसान और युवा
महिला किसान पुरुषों जितना ही काम करती हैं। लेकिन उन्हें जमीन, कर्ज और आधुनिक मशीनों तक कम पहुंच मिलती है। एक रिपोर्ट के हवाले से इससे पैदावार में 24 प्रतिशत का अंतर बनता है।
युवा स्टार्टअप और एग्री टेक के जरिए खेती का चेहरा बदल रहे हैं। वे नए तरीके और नई सोच ला रहे हैं। फिर भी छोटे किसानों तक आधुनिक तकनीक पहुंचाना बड़ी चुनौती है।
सरकार और कंपनियों से उम्मीद
सरकारों को ग्रामीण सड़क, कोल्ड चेन, कृषि शिक्षा और अनुसंधान के लिए बजट बढ़ान होगा। यह है। शोध पर निवेश का फायदा सबसे बड़ा होता है। निजी कंपनियों से सस्ते कृषि उपकरण बनाने को कहा गया है। साथ ही ऐसे मॉडल की बात है, जो छोटे किसानों को बाजार से जोड़ें। इससे उनकी आमदनी बढ़ सकती है।
आम लोग क्या कर सकते हैं
थाली में उतना ही खाना लें, जितनी जरूरत हो। खाने की बर्बादी रोकें। भोजन में बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज शामिल करें। जरूरत भर की सब्जी और राशन खरीदें। बचा हुआ खाना सही तरीके से रखें और अगले दिन इस्तेमाल करें। मौसमी और स्थानीय उपज को प्राथमिकता दें।
यह दिन क्यों मनाया जाता है
एफएओ की स्थापना 16 अक्टूबर 1945 को हुई थी। इसी तारीख की याद में हर साल विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन दुनिया भर में भूख, पोषण और टिकाऊ खेती पर चर्चा होती है। सरकारें, संस्थाएं और आम लोग अपने स्तर पर संकल्प लेते हैं। मकसद है कि कोई भूखा न रहे।
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