@रविकांत दीक्षित. नई दिल्ली एक किसान की तस्वीर आंखों में बनाइए। सिर पर पगड़ी या कंधे पर गमछा। बदन पर धोती-कुर्ता या मिट्टी से सनी बंडी। कंधे पर हल और पैरों में देसी जूते। यही तस्वीर लंबे समय तक भारत के किसानों की पहचान मानी जाती रही। फिल्मों में किसानों को इसी अंदाज में दिखाया गया है। बच्चों की किताबों में तो अब भी यही तस्वीर है, लेकिन गांव की पगडंडी पर आज जरा गौर से देखिए।
हल की जगह खेत में ट्रैक्टर खड़ा है। कंधे पर गमछे की जगह हाथ में मोबाइल है और कई युवा किसान खेत की मेड़ पर धोती-कुर्ते में नहीं, जींस-टीशर्ट, ट्रैक पैंट, स्पोर्ट्स शूज और कैप में दिखाई दे रहे हैं। शादी-ब्याह हो या गांव का बाजार, मोदी जैकेट ने भी ग्रामीण पहनावे में अपनी जगह बना ली है। अब खेतों में जींस वाले किसान दिखाई पड़ते हैं।
विदिशा जिले के गंजबासौदा के किसान देवेंद्र रघुवंशी, कुरवाई तहसील के विलोदा के किसान छोटू दांगी और सागर के किसान संतोष शर्मा जैसे किसानों की पीढ़ी जिस बदलाव को अपने आसपास देख रही है, वह सिर्फ कपड़ों का बदलाव नहीं है। यह गांव के बदलते जीवन, सोच और किसान की बदलती पहचान की कहानी भी है
खेत वही, पहनावा बदल गया किसान का
कुरवाई के किसान राजेंद्र शर्मा कहते हैं, गांवों में बुजुर्ग पीढ़ी आज भी धोती-कुर्ता, कुर्ता-पायजामा, तहमत-बंडी जैसे पारंपरिक पहनावे को पसंद करती है। इसकी बड़ी वजह आराम भी है। खेत में काम करते समय यह पहनावा सहज लगता है, लेकिन 20 से 35 वर्ष की उम्र के युवा किसानों की पसंद तेजी से बदल रही है। खेत में काम करते समय भी जींस-टीशर्ट, ट्रैक पैंट, स्पोर्ट्स शूज और कैप आम होते जा रहे हैं।
इसके पीछे कई वजहें हैं। इस पर बात करते हुए राजस्थान बारां के किसान रघुवीर प्रसाद शर्मा कहते हैं, गांव के युवा अब पढ़ाई और काम के लिए शहर जाते हैं। शहर से लौटते वक्त वह सिर्फ नई जानकारी या नौकरी का अनुभव लेकर नहीं आते, वे पहनावे और जीवनशैली का नया अंदाज भी साथ लाते हैं।
मोबाइल और सोशल मीडिया ने इस बदलाव की रफ्तार और बढ़ा दी है। Instagram और YouTube पर दिखने वाला शहरी फैशन अब गांव तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लेता है। कृषि में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ने से भी पहनावे में बदलाव आया है। ट्रैक्टर, थ्रेशर और स्प्रे मशीनों ने खेती के काम करने का तरीका बदला है। ऐसे में कई युवा किसानों को जींस-टीशर्ट ज्यादा व्यावहारिक लगती है।
रिटायर्ड कृषि अधिकारी सुरेंद्र दांगी कहते हैं, पहनावे में बदलाव के पीछे आर्थिक बदलाव भी एक कारण है। नकदी फसलों, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और सरकारी योजनाओं से खेती से जुड़ी आय और खर्च करने की क्षमता में बदलाव आया है। इसका असर किसान की जीवनशैली पर भी दिखाई देता है।
धोती-कुर्ते की जगह जींस-टीशर्ट ने ली है तो पारंपरिक जैकेट का भी नया रूप सामने आया है। ‘मोदी जैकेट’, जिसे आधुनिक रूप में नेहरू जैकेट कहा जा सकता है, अब गांवों और कस्बों में आम दिखाई देती है। शादी-ब्याह से लेकर रोजमर्रा के पहनावे तक इसका इस्तेमाल बढ़ा है। यानी किसान की अलमारी में परंपरा पूरी तरह गायब नहीं हुई है, उसके साथ आधुनिकता ने भी अपनी जगह बना ली है।
यह बदलाव किसानों तक सीमित नहीं
ग्रामीण समाज में पहनावे का यह बदलाव सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं है। कई आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के युवाओं में भी पारंपरिक परिधानों से दूरी और आधुनिक पहनावे की ओर झुकाव दिखाई देता है।
महाराष्ट्र के कुछ आदिवासी समुदायों में पहने जाने वाले ‘नाटी’ या ‘पावड़ा’ जैसे पारंपरिक परिधानों को लेकर भी यही बदलाव देखने को मिलता है। बुजुर्ग पीढ़ी इन परिधानों से जुड़ी हुई है, जबकि युवा पीढ़ी आधुनिक कपड़ों को ज्यादा पसंद कर रही है। यानी कपड़े बदल रहे हैं और उनके साथ पीढ़ियों के बीच जीवनशैली का अंतर भी दिखाई दे रहा है।
खेत से फैक्ट्री पहुंचकर डेनिम बन रहा कपास
निमाड़ के किसान हेमंत जाट कहते हैं, किसान कपास उगाता है, अब वही कपास पहनता भी है। इस मरह इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू कपास है। भारत दुनिया के बड़े कपास उत्पादक देशों में शामिल है। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब में लाखों किसान परिवार कपास की खेती से जुड़े हैं। दुनिया भर में करीब 10 करोड़ परिवार किसी न किसी रूप में कपास उत्पादन पर निर्भर बताए जाते हैं।
यानी किसान जिस फसल को उगाता है, वही कपास दुनिया की टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल बनती है और आगे चलकर उसी से जींस और टी-शर्ट तैयार होती है। कभी किसान अपने देसी कपास को चरखे और हथकरघे के जरिए कपड़े में बदलता था। उसी से धोती-कुर्ता तैयार होता था। आज तस्वीर बदल गई है।
खेत में कपास उगा। कपास मिल तक पहुंचा। मिल से धागा और कपड़ा बना। कपड़ा डेनिम में बदला। फिर वही कपास जींस या टी-शर्ट बनकर बाजार पहुंची और किसान उसे बाजार से खरीदकर पहन रहा है। एक समय किसान कच्चा माल पैदा करके अपना पहनावा तैयार करता था। आज वही किसान वैश्विक टेक्सटाइल सिस्टम से तैयार होकर लौटे उत्पाद का उपभोक्ता है। यह बदलाव गांव की बदलती अर्थव्यवस्था और बाजार से किसान के बदलते रिश्ते की भी कहानी है।
खेत की ओर लौट रहे किसान
खेती को पिछड़ा समझने वाले युवा अब खेत में लौट रहे हैं। जी हां, एक दौर था, जब पढ़े-लिखे युवाओं के लिए खेती को पिछड़ेपन से जोड़ा जाता था। सरकारी नौकरी, बैंक, कॉरपोरेट या शहर की नौकरी को सफलता का पैमाना माना जाता था। अब तस्वीर में बदलाव दिखाई दे रहा है।
कई शिक्षित युवा खेती की ओर लौट रहे हैं। कोई एग्री-स्टार्टअप शुरू कर रहा है, कोई ऑर्गेनिक फार्मिंग अपना रहा है, कोई प्राकृतिक या जीरो-बजट खेती को कारोबार की तरह देख रहा है। ऐसे युवा भी हैं जिन्होंने लाखों के पैकेज वाली नौकरियां छोड़कर खेती को अपना रास्ता बनाया है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर के डॉ. राजाराम त्रिपाठी इसका उदाहरण हैं। उन्होंने बैंक की सुरक्षित नौकरी छोड़कर औषधीय फसलों की खेती को अपनाया है। खेती में उन्होंने नए प्रयोग किए। उनके नवाचारों ने उन्हें MFOI Award 2023 में ‘Richest Farmer of India’ का सम्मान दिलाया है। आज वे हजारों किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। यानी खेती अब सिर्फ पुश्तैनी काम के रूप में नहीं देखी जा रही। कुछ युवा इसे ज्ञान, तकनीक और उद्यम के साथ जोड़कर नए कारोबार के रूप में देख रहे हैं।
राजस्थान के प्रगतिशील किसान लेखराम यादव ने जैविक खेती और देशी डेयरी मॉडल को अपनाकर सफलता हासिल की है। पंजाब के सुरेंद्र पाल सिंह ने पारंपरिक देसी कपास को फिर से बढ़ावा देने की दिशा में काम किया और अपना ऑर्गेनिक कपड़ों का ब्रांड तैयार किया है। ये तीनों उदाहरण अलग हैं, लेकिन कहानी एक ही है कि किसान की अगली पीढ़ी खेती को नए नजरिए से देख रही है।
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