भोपाल. जब छोटा सा खेत मुसीबत बन गया, तो भीटा के किसान हल्कू बर्मन ने उसे ही मुनाफे का तालाब बना दिया। जहां हार्वेस्टर नहीं पहुंच पाता था अब वहां पानी का पोखर है जिसमें सिंघाड़े की फसल लहलहा रही है। यहीं नहीं पोखर के पानी में मछली पालन भी हो रहा है जिससे किसान एक ही समय में डबल कमाई कर पा रहा है। यह सब हुआ है जबलपुर के भीटा गांव के किसान हल्कू बर्मन की समझदारी और कृषि एवं मछुआ कल्याण विभाग के सहयोग से। अब हल्कू आधे एकड़ से भी कम जमीन पर सिंघाड़े की खेती और मछली पालन से आर्थिक मजबूती की राह पर आगे बढ़ रहा है।
खरीफ सीजन में किसान धान की खेती को प्राथमिकता देते हैं। वहीं शहपुरा के भीटा गांव के किसान हल्कू बर्मन ने अलग राह चुनी। बर्मन ने अपने खेत की ऊबड़- खाबड़ जमीन को समझते हुए परिस्थितियों को समझकर नया प्रयोग किया है। उन्होंने छोटी सी जमीन में मछली पालन के साथ सिंघाड़े की खेती का नया मॉडल बनाया है।

छोटे रकबे की समस्या का खोजा समाधान
नहल्कू बर्मन के पास लगभग तीन एकड़ सिकमी कृषि भूमि है। इसमें से 0.25 एकड़ हिस्सा बेहद छोटा और असुविधाजनक था। वहां हार्वेस्टर जैसी बड़ी मशीनों का पहुंचना संभव नहीं हो पाता था। धान की कटाई के लिए उन्हें पूरी तरह मजदूरों पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे खेती की लागत बढ़ती थी और कटाई में भी देरी होती थी। इसी समस्या से परेशान होकर उन्होंने कृषि विभाग से संपर्क किया था। कृषि अधिकारियों की समझाइश पर उन्होंने धान छोड़कर नवाचार अपनाने का फैसला किया। उन्होंने खेत के पानी भरे हिस्से में सिंघाड़े के साथ मछली पालन शुरू किया।
एक ही पानी में दो फसलें, मुनाफा डबल
नवाचार की धुन सवार होने पर बर्मन ने कृषि अधिकारियों के साथ ही मत्स्य पालन विभाग से भी सुझाव लिए। जिसके बाद उन्होंने पानी भरे खेत में सिंघाड़े के साथ मछली पालन की जानकारी भी जुटाई। सिंघाड़ा पानी की सतह पर फलता है जबकि मछलियां पानी के अंदर होती हैं। सिंघाड़े की फसल से उन्हें तेजी से बढ़ने में भी मददगार बनती है। हल्कू बर्मन भी बायोडायवर्सिटी के सिद्धांत का लाभ ले रहे हैं।
नवाचार ने दिलाई आर्थिक तंगी से निजात
किसान हल्कू का कहना है कि यह मॉडल धान से ज्यादा फायदेमंद है। सिंघाड़े की खेती से उन्हें एक सीजन में 30 से 40 हजार रुपये मिलते हैं। वहीं मछली पालन से भी वे 25 से 30 हजार रुपये कमा लेते हैं। जिस जमीन के छोटे से टुकड़े से उन्हें पेट भरने लायक भी उपज नहीं मिलती थी अब उसी ने तंगी को दूर कर दिया है। कृषि और मछुआ पालन विभाग के अधिकारी भी इस छोटे से किसान के आदर्श खेती के मॉडल का मुआयना कर सराहना कर चुके हैं।
एकीकृत खेती से बन रहे आत्मनिर्भर
हल्कू बर्मन अब केवल सिंघाड़ा और मछली तक ही सीमित नहीं हैं। वे शेष रकबे में रबी सीजन में मटर और हरी सब्जियों की खेती करते हैं। गर्मी के मौसम में वे उसी खेत में उड़द की फसल लगाते हैं। वे पशुपालन भी करते हैं और गोबर, गौमूत्र का उपयोग जैविक खेती में कर रहे हैं। एकीकृत खेती के इस मॉडल ने उन्हें रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च से भी मुक्ति दिला दी है। साल भर में वे अब इसी जमीन से खर्च काटकर चार लाख कमा रहे हैं।
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